राजा ऐल ने 995 में कराया था मंदिर का नर्मिाण !

Published at :15 Nov 2015 6:59 PM (IST)
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राजा ऐल ने 995 में कराया था मंदिर का नर्मिाण !

राजा ऐल ने 995 में कराया था मंदिर का निर्माण !औरंगाबाद कार्यालयमध्य प्रदेश के कृष्ण गुण्टूर के कबीलों ने राजपूत काल में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए अपने आपको सूर्यवंशी घोषित कर दिया. ये कबीला मानते थे कि इक्ष्वाकु के वंशज विकुचि (शशांक)अयोध्या, निमी, मिथिला व दंडक दंडकारण्य गये थे. जिनके वंशज कृष्ण -गुण्टूर […]

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राजा ऐल ने 995 में कराया था मंदिर का निर्माण !औरंगाबाद कार्यालयमध्य प्रदेश के कृष्ण गुण्टूर के कबीलों ने राजपूत काल में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए अपने आपको सूर्यवंशी घोषित कर दिया. ये कबीला मानते थे कि इक्ष्वाकु के वंशज विकुचि (शशांक)अयोध्या, निमी, मिथिला व दंडक दंडकारण्य गये थे. जिनके वंशज कृष्ण -गुण्टूर क्षेत्र में फैले थे, जो बाद में उत्कल, विन्ध्य व पलामू क्षेत्र में चले गये. जब सौर संप्रदाय जोर पकड़ा तो चट्टानों पर सरथसूर्य व देवी देवताओं की चित्रकारी होने लगी, लेकिन छठ -सातवीं सदी से जब पत्थर के मंदिर निर्माण का दौर शुरू हुआ तो कश्मीर के ललितादित्य, कनौज के आदित्यर्द्धन, बंगाल के आदित्य सेन, उड़ीसा के नरसिंह देव आदि ने सूर्य मंदिरों का निर्माण कराया. बंगाल के आदित्य सेन देवारण्य में एक चटान पर सरथ सूर्य की स्थापना की, जहां देवपाल ने देव नामक नगर बसाया और बौद्ध मठ बनवाया. ईला पुत्र पलामू के निर्वासित राजा ऐल का जब कोढ़ देव पोखर के पानी से ठीक हो गया, तो ऐल ने 995 ई में सूर्य की पूजा-अर्चना की और बौद्ध मठ की जगह वर्तमान विशाल मंदिर का निर्माण कराया, जैसा कि महान इतिहासकार डाॅ केके दत्त ने पीढ़ियों के इतिहास में लिखा है और महान घुमक्कड़ राहुल सांस्कृत्यायन ने यहां बुद्ध मंदिर के अस्तित्व की पुष्टि की है. बाद में पूरी के शंकराचार्य के यहां आगमन के अवसर पर उनके निर्देशानुसार इस सूर्य मंदिर में सरथ सूर्य के ऊपर तख्ती पर त्रिदेवों ब्रम्हा, विष्णु, महेश की मूर्ति बैठायी गयीं. जब उमगा के राजा भैरवेंद्र ने उमगा के सूर्य मंदिर व देवकुंड के शिव मंदिर का निर्माण कराया, तो उसने देव सूर्य मंदिर के सभा मंडप का निर्माण कराया. इसलिए सभा मंडप के चटान व कलाकृति मूल मंदिर से भिन्न है और जोड़ भी स्पष्ट दिख पड़ता है. मूल मंदिर के चट्टान नक्काशीदार व काले है, जबकि सभा मंडप के चटान दूसरे रंग के बिना नक्काशी के सपटा और साधारण है. मुसलिम काल में जब ईंट व गारे का अविष्कार हुआ तो पत्थर के बजाय ईंट के मंदिर, मसजिद व महल बनने लगे. जब अकबर काल में शेख बिजली खां देव का छोटा नवाब हुआ तो उसने वर्तमान देव किला का निर्माण कराया. लेकिन जब भैरवेंद्र के दामाद उमगा के राणा भानु प्रताप ने नूरजहां से बागी शाहजाहं के सहयोग से शेख बिजली खां को 1620 ई हारा दिया तो देवराणा वंश्यिों की राजधानी बन गया, जहां राणा वंशियों ने सात पुश्तों तक राज किया. 1857 की क्रांति के बाद जब देव जमींदार घनश्याम सिंह को राजा की उपाधि मिली तो 1858 ई में उनके पुत्र प्रवील कुमार ने देव किला का नवीनीकरण किया तथा पुरोहित के निर्देशानुसार सूर्य मंदिर का जीर्णोद्धार कर वर्तमान संगमरमर प्लेट लगा दिया, जिसमें मंदिर का निर्माता 10वीं सदी के ऐल के बदल त्रेतायुगीन ऐल को बताया गया.

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