मधुश्रावणी में 14 दिनों में 14 कथा सुनने का है विधान

Edited by PRAPHULL BHARTI
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इस पर्व को माता-पिता के घर में ही मनाने की प्रथा है

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कुर्साकांटा. मधुश्रावणी व्रत बिहार के मिथिला क्षेत्र का एक प्रसिद्ध पर्व है. नवविवाहित महिलाएं पति के दीर्घायु के साथ सुखद दाम्पत्य जीवन की कामना को लेकर मधुश्रावणी व्रत करती है. मधुश्रावणी व्रत 14 दिनों तक विधि विधान पूर्वक पूरी निष्ठा से की जाती है. जिस नवविवाहिता के यहां यह पूजा होती है गांव भर की महिलाओं का वहां जमावड़ा होता है. महिलाएं गीत गाकर इष्ट देवता को अनुसरण करती हैं. वहीं बड़ी महिलाएं सभी दिन व्रती महिला को पूजन के समय कथा सुनाती है. सत्यवान सावित्री, सती अनसुइया जैसी धर्मपरायण महिला की प्रेरणादायक कथा सुनाकर उसे पति परायन होने की प्रेरणा देती है. यह पर्व सावन मास के कृष्ण पक्ष से शुरू होकर शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि को संपन्न होती है. नवविवाहिता इस पर्व को माता-पिता के घर में ही मनाने की प्रथा है. उनके ससुराल से व्रत को लेकर सामग्री जैसे वस्त्र, खाद्य सामग्री, पूजन सामग्री सहित आवश्यक सामग्री आता है. ससुराल से आये सामग्री को लेकर ही व्रती मधुश्रावणी व्रत करती हैं. व्रती महिला सखियों संग फूल तोड़ने जाती है व गीत गाती है. सखी फूल लोढ़े चलु फुलवड़िया, सीता के संग सहेलिया. यह दृश्य बड़ा ही मनमोहक होता है. जो जनक सुता जानकी की स्मृति को तरोताजा करती है. महिलाओं में इस पर्व को लेकर काफी उत्साह, उमंग व्याप्त रहता है. समापन के दिन ससुराल से भोज्य सामग्री आता है. गांव की महिलाएं हंसी ठिठोली करते भोजन ग्रहण करती हैं जिसे निस्तार कहा जाता है.

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