मन को अभ्यास व वैराग्य से साधा जा सकता है: स्वामी विमलानंद जी महाराज

अविद्या,अल्पज्ञता आदि से गुरु जगाते हैं. सूर्य की भांति गुरु अपनी कृपा बरसाते है.
मन को अभ्यास व वैराग्य से साधा जा सकता है: स्वामी विमलानंद जी महाराज भरगामा . जीवात्मा परमात्मा का अंश है.चौरासी लाख योनियों से मुक्ति के लिए मानव तन मिला है. कर्म का कर्ता मन है. मन ही बंधन व मोक्ष का मार्ग है. मन संकल्प व विकल्प करता रहता है. संकल्प व विकल्प की शक्ति को मन कहते हैं. मन को साधने का अभ्यास करना चाहिए. मन को अभ्यास व वैराग्य से साधा जा सकता है. उक्त बाते श्री राधाकृष्ण गीता मंदिर सिंहेश्वर के संस्थापक स्वामी विमलानंद जी महाराज ने कुशमौल में आयोजित महात्मा उचित लाल दास के स्मृति समारोह के दौरान दो दिवसीय सत्संग में कही. उन्होंने कहा कि गुरु का कोई रूप नहीं होता है. गुरु तत्व है. गुरु के उस रूप को जानना होगा. गुरु का दर्जा सबसे ऊपर है. गुरु ईश्वर की भक्ति का मार्ग बताते हैं. आदिगुरु संसार का भला करते आते हैं. सगुण रूप में गुरु जागते हैं. मन के विषमता, अविद्या,अल्पज्ञता आदि से गुरु जगाते हैं. सूर्य की भांति गुरु अपनी कृपा बरसाते है.आत्म सुख के लिए गुरु को असीम श्रद्धा, प्रेम देना होगा.संसार अंधकार से आच्छादित है. उन्होंने कहा कि ईश्वर ने आस्था प्रकृति के माध्यम से मानव शरीर का निर्माण किया है.
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