भारत व नेपाल के बीच सांस्कृतिक विरासत का केंद्र रंगेली झेल रहा उपेक्षा का दंश

Updated at : 28 Oct 2024 6:54 PM (IST)
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भारत व नेपाल के बीच सांस्कृतिक विरासत का केंद्र रंगेली झेल रहा उपेक्षा का दंश

लोगाें ने की इसे विकसित करने की मांग

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अररिया जिले की खुली सीमा रंगेली को भारत से जोड़ने के छोटे भंसार की मांग पकड़ रही जोर वर्ष 2015 के बाद नेपाल में लोकतंत्र की बहाली के बाद भी नहीं सुधरे रंगेली के हालात फोटो:31-पत्रकारों को संबोधित करते नेपाली कांग्रेस के सचिव मोदराज धिमिरे, लीला राज खरैल सहित अन्य. मृगेंद्र मणि सिंह, अररिया भारत के सीमावर्ती जिले अररिया का 104 किलोमीटर क्षेत्र नेपाल से जुड़ा हुआ है, लेकिन व्यापारिक, सांस्कृतिक विरासत का केंद्र रहा नेपाल राष्ट्र का रंगेली अपनी पहचान को लेकर उपेक्षा का दंश झेल रहा है. एक समय में रंगेली की पहचान बड़े व्यवसायिक मंडी के रूप में होती थी, अररिया जिले के पूर्वी हिस्से व किशनगंज जिले के पश्चिमी हिस्से के लोग अपने अनाज, पाट बेचेन के लिए रंगेली बाजार के टेलटिया या गोलछा तो घरेलू जरूरतों की सामग्री की खरीद को लेकर रंगेली आते थे. लेकिन बीतों दिनों में नेपाल की व्यवस्था में तो सुधार हुआ लेकिन एक मात्र भंसार व कस्टम सेवा वाला केंद्र बन कर जोगबनी रह गया, जिससे व्यवसायिक दृष्टिकोण से विराटनगर को बहुत ज्यादा फायदा हुआ वहीं रंगेली पूरी तरह उपेक्षित रह गया. इन सभी बिंदुओं पर प्रभात खबर से विशेष बातचीत में नेपाली कांग्रेस के सचिव रंगेली निवासी मोदराज धिमिरे, व्यवसायर लीला राज खरैल ने भी अपनी बातों को रखा, उनकी बातों में सरकार के द्वारा हो रही उपेक्षा भी साफ झलक रही थी. मोदराल धिमिरे नेपाल के गृह मंत्री के काफी नजदीकी माने जाते हैं, उन्होंने बताया कि वर्ष 2015 में नेपाल में लोकतंत्र स्थापित हुआ बड़ी उम्मीद थी कि रंगेली का विकास होगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, बल्कि मात्र भारत सरकार के सहयोग के द्वारा हुलाकी राजमार्ग झापा से विराटनगर, चोपराहा से कानीपोखरी द्वारा सड़क बनाया गया. अगर देखें तो नेपाल के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने तो रंगेली के लिये कुछ किया हीं नहीं. यहां तक रंगेली में पर्यटन क्षेत्र के रूप में काफी संभावनाएं हैं, रंगेली का संसारी मंदिर की ख्याति दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, रंगेली में नेपाल सरकार व भारत सरकार सिर्फ भंसार कार्यालय की व्यवस्था कर दें तो न केवल भारत व नेपाल के लिये एक वैकल्पिक मार्ग साबित होगा बल्कि रंगेली का तेजी से विकास होगा. रंगेली से लटांग, कन्यम, झापा, कानीपोखरी, श्री हंतु, इलाम, तापलेजुंग आदि में पर्यटन की असीम संभावनाओं का तेजी से विकास होगा, वहीं नेपाल में अपनी पहचान खो रहा रंगेली एक व्यवसायिक बाजार के रूप में नेपाल को अधिक से अधिक राजस्व प्रदान करेगा. आज नेपाल आने वाले भारतीय मूल के लोगों को परेशान किया जाता है, जिसको लेकर भी नेपाल सरकार को सोचने की जरूरत है. नेपाल का संसारी माता का मंदिर हो या काली मंदिर यहां आने वाले भक्तों के लिये छूट की व्यवस्था होनी चाहिये.

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