अररिया : अररिया नगर परिषद की स्थापना अधिसूचित क्षेत्र के रूप में कई वर्ष पहले ही हो चुकी है. बहुत जल्द ही अररिया नगर परिषद के 2019-20 का बजट भी स्वीकृत होने वाला है. इसको लेकर लगभग तैयारी पूरी हो चुकी है. लेकिन हर वर्ष करोड़ों रुपये का बजट व खर्च होने के नाम वसूली जाने वाले होल्डिंग टैक्स धारियों से रुपये के अनुपात में उन्हें कितनी सुविधा मिल पा रही है. यह सवाल अब भी नगरवासियों के जुबान पर कौंध रहा है. दिलचस्प बात तो यह है कि हर वर्ष ताम-झाम के साथ बजट का प्रारूप तो पेश होता है. उसे नप बोर्ड की स्वीकृति भी मिल जाती है. लेकिन उसका कितना अनुपालन शहरवासियों के हित में हो पाती है.
यह दिलचस्प है. पिछले वित्तीय वर्ष 2018-19 का बजट लगभग 110 करोड़ रुपये का था. जाहिर सी बात है कि इस बार का बजट उसके अनुपात में ज्यादा होगा. सूत्रों की मानें तो इस बार का बजट लगभग 141 करोड़ के आस-पास का होगा. जिसका खुलासा 08 जून को होने वाले बोर्ड की बैठक में ही हो पायेगा. सूत्रों की मानें तो 2018-19 का बजट आकार भी कम नहीं बड़ा था. लेकिन इसके अनुपात में लगभग 25 से 30 करोड़ रुपये ही खर्च हो पाये हैं.
कही न कही नप का विकास में राशि खर्च नहीं हो पाना भी बड़ी समस्या है. हालांकि इसके पीछे एक कारण यह भी रहा है कि नप के पास आंतरिक संसाधन मद के अलावा राज्य योजना मद से मिलने वाली राशि की आपूर्ति भी ताजा वित्तीय वर्ष में न के बराबर ही हो पाया है. सूत्रों की मानें तो पूर्व कार्यपालक पदाधिकारी भवेश कुमार के बाद नप को जो भी ईओ मिले वे नगर विकास विभाग से नहीं थे. इस कारण भी तकनिकी जानकारी के अभाव में बहुत सारे संसाधनों से आने वाली राशि का डिमांड व उपयोगिता भी जमा नहीं हो पाने के कारण नप खर्च की सीमा नहीं बढ़ा पाया.
लाइटिंग की व्यवस्था भी नहीं है मुकम्मल
एलइडी लाइट लगाने पर नगर परिषद के द्वारा पिछले बोर्ड से अब तक करोड़ों रुपये खर्च की गयी है. लेकिन राशि खर्च होने के बाद भी मुख्य सड़कों व चौराहों को छोड़ दिया जाये तो स्थिति सामने है. अब भी शहर में रौशनी की व्यवस्था ठीक-ठाक नहीं मानी जा सकती है. यही नहीं हर बार पर्व त्योहार के अवसर पर लाखों रुपये लाइट लगाने के नाम पर खर्च किये जाते हैं. लेकिन रख-रखाव के अभाव में वे बेकार हो जाते हैं. या फिर बेकार कर दिये जाते हैं. ऐसे में रुपये खर्च तो हो रहे हैं लेकिन वार्डों में रौशनी दिखाई नहीं दे रहे हैं. जबावदेह नप बोर्ड के पार्षदों को इन बातों पर भी विचार करना होगा.
नप सरकार, जरा इन पर भी करें विचार
शहर में पानी के नाम पर 25 करोड़ से अधिक खर्च, चार जल मिनार, लेकिन जल की आपूर्ति महज 40 प्रतिशत परिवारों तक ही सीमित
जरूरत है आठ ड्रैनेज की लेकिन तीन वर्षों मे महज दो ड्रैनेज का ही हो पाया है निर्माण पूरा
एडीबी आश्रम रोड़ का निर्माण आज भी नहीं हो पायी पूरी
महादेव चौक एपीएस स्कूल जाने वाली सड़क पचड़ों में है फंसा
एलइडी लाइट लगे, लेकिन कहां-कहां जल रहे देखने वाला नहीं
सीटी लाइवहुड सेंटर आज भी नहीं आ पाया अस्तित्व में
शहर में पार्क नहीं
शहर में बस स्टैंड नहीं
शहर में वैडिंग जोन नहीं
शहरवासियों को एक अदद पार्क तक मय्यसर नहीं
यह बड़ी बात है कि आखिर नपवासियों के सेहत की फिक्र कौन करेगा. सरकार के अधिकारियों के पास अपना जिम है. खेलने के लिए अधिकारियों के पास इंडोर स्टेडियम है. लेकिन जवाबदेह अधिकारियों के पास इस बात का समय कहां कि वे शहरवासियों के हित के लिए भी एक पार्क निर्माण की सौंचे. लेकिन इस पर पहल तक होता नहीं दिख रहा है. दिलचस्प बात तो यह है कि पिछले बोर्ड से ही बस स्टैंड के निर्माण की बात चल रही है.
लेकिन अब तक बस स्टैंड का निर्माण नहीं हो पाया है. वैंडिंग जोन के लिए जगह भी नहीं मिल पाया है. शहर को जाम की समस्या से मुक्त करने के लिए भी कोई ऐसी योजना नहीं बन पायी है. ऐसे में 08 मार्च को पारित होने वाले बजट में क्या शहरवासियों के इन उम्मीदों को पर मिलेंगे देखना लाजिमी होगा.
योजनाएं पारित तो हुई, लेकिन नहीं हो पाया काम
मुख्यमंत्री नल का जल, गली-नाली योजना के तहत शहर के विभिन्न वार्डों में लगभग 10 से 12 करोड़ रुपये खर्च हुए. अभी भी ड्रैनेज निर्माण की दो योजनाओं समेत लगभग 3.79 करोड़ की सात योजनाएं लटकी हुई हैं. यह विभागीय लेटलतीफी का परिणाम है. ऐसे में यह कहना वाजिब होगा कि नप में विकास की रफ्तार खरगोश की नहीं बल्कि कच्छप की रफ्तार में चल रही है.
विकास को आयाना दिखाने के लिए नप के अधिकांश वार्ड काफी हैं जो जल जमाव व नाले की समस्या से ग्रस्त हैं. शहर में डोर-टू-डोर कचरा उठाव की प्रक्रिया थम सी गयी है. फुटकर विक्रेता अतिक्रमण के नाम पर हटाये तो जा रहे हैं. लेकिन उन्हें व्यवस्थित करने की कोई भी योजना प्रभावी नहीं. आज तक वैडिंग जोन निर्धारित नहीं हो पाया है. देखा जाए तो शहर से जल निकासी को मुकम्मल व्यवस्था इस बार भी बाढ़ से पूर्व तैयार नहीं हो पायी है.
सभी परिवारों को शुद्ध पेयजल के लिए 2023-24 तक का करना होगा इंतजार
सभी परिवारों को शुद्ध पेयजल के लिए 2023-24 तक का करना होगा इंतजार
मजे की बात तो यह है कि पिछले नप बोर्ड में ही शुद्ध पेयजल आपूर्ति के नाम पर 25 करोड़ से अधिक की राशि खर्च कर दी गयी है. लेकिन नतीजों पर गौर करें तो नप के आंकड़ों के अनुसार अब तक शहर के 40 प्रतिशत परिवारों को ही शुद्ध पेयजल मिल पाया है. बताना दिलचस्प होगा कि शहरवासियों को अब भी वर्ष 2023-24 का इंतजार करना पड़ेगा जब उन्हें शुद्ध पेयजल की आपूर्ति हो पायेगी.
एचएफए योजना के लाभुक वर्षों से कर रह हैं राशि इंतजार : पिछले बोर्ड में प्रथम व द्वितीय फेज का जबकि वर्तमान बोर्ड में तृतीय फेज के लाभुकों को हाउस फॉर ऑल योजना का कार्यादेश दिया गया है. अब तक लगभग 4519 लाभुकों को नप के द्वारा एपएफए योजना की स्वीकृति मिली. इन्हें धड़ा-धड़ कार्यादेश दिया गया. लाभुकों ने गड्ढे भी खोद लिये. लेकिन इन्हें आज भी खाते में राशि का इंतजार है. हालांकि हाल में कुछ लाभुकों के खाते में राशि गयी. लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. अब इन लाभुकों के सामने बारिश का मौसम मूंह बाये खड़ा है.
राशि खर्च होने में विलंब हुई है, इस बार किया जायेगा सुधार
यह सही है कि वित्तीय वर्ष 2018-19 का बजट आकार जितना बड़ा था, उतनी राशि ही खर्च नहीं हो पायी. ऐसा इसलिए हुआ कि इस वित्तीय वर्ष में तीन-तीन बार आचार संहिता लगी. पहली बार लोकसभा उप चुनाव, दूसरी बार विधानसभा उप चुनाव व वार्ड संख्या 04 के पार्षद के निधन के बाद खाली हुए वार्ड के लिए हुए चुनाव के कारण लगी आचार संहिता.
इस कारण अधिकांश काम पटल पर नहीं उतर पाये. कार्यकाल के दौरान जिन ईओ को प्रभार मिला उनके पास तकनिकी जानकारी का आभाव था. अब पदास्थापित ईओ विभागीय हैं. इन्हें जानकारी भी है. इसलिए विभागीय राशि का आवंटन प्राप्त कर नये बजट में शहर की मूलभूत समस्याओं पर फोकस करते हुए राशि का खर्च किया जायेगा. इस बार राशि खर्च करने में विलंब हुआ है. जिसमें सुधार किया जायेगा.
रीतेश कुमार राय, मुख्य पार्षद