कर्मियों की लापरवाही को लेकर सीओ के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को ले दिये आवेदन पर नहीं हुई कार्रवाई
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 06 Jun 2019 6:35 AM
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अररिया : अंचल कार्यालय अररिया में कार्यरत कर्मियों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए सीओ अशोक कुमार सिंह द्वारा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को लेकर डीएम को दिये आवेदन के मामले में अंचल प्रशासन के कार्य व्यवहार से असंतुष्ट लोगों को जिला प्रशासन से किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद थी. बीते 29 मई को सीओ अशोक सिंह […]
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अररिया : अंचल कार्यालय अररिया में कार्यरत कर्मियों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए सीओ अशोक कुमार सिंह द्वारा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को लेकर डीएम को दिये आवेदन के मामले में अंचल प्रशासन के कार्य व्यवहार से असंतुष्ट लोगों को जिला प्रशासन से किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद थी.
बीते 29 मई को सीओ अशोक सिंह ने कार्यालय में कार्यरत कर्मियों के कर्तव्यहीनता व गैर जिम्मेदाराना रवैया को कारण बताते हुए जिलाधिकारी को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को लेकर विभाग से अनुशंसा किये जाने से संबंधित आवेदन सौंपा था. सीओ का आवेदन प्राप्त होते ही जिला प्रशासन पूरी तरह हरकत में आ गया.
वरीय अधिकारियों का विशेष जांच दल एक से अधिक बार अंचल कार्यालय पहुंच कर संबंधित मामले की छानबीन में जुटे रहे. इससे अंचल वासियों में यह उम्मीद बंधी कि चलो इसी बहाने अगर मामले में प्रशासन सख्ती दिखाता है. तो अंचल से संबंधित कार्यों के निष्पादन में आम लोगों को होने वाली परेशानी पर थोड़ा बहुत अंकुश लगेगा. प्रशासनिक हलकों में भी छानबीन के आधार पर दोषी पाये गये कर्मियों पर प्रशासनिक कार्रवाई की गाद गिरने को लेकर कयास लगाये जाने लगे थे.
कम से कम कुछ कर्मियों के तबादले की उम्मीद तो लोगों में बंधी ही थी. लेकिन बीतते समय के साथ मामला ठंडे बस्ते में पड़ता दिख रहा है. सीओ के आवेदन दिये एक सप्ताह से अधिक का वक्त गुजर जाने के बावजूद मामले में अब तक जिला प्रशासन के स्तर पर किसी तरह की कोई ठोस कार्रवाई होता नहीं दिखा. बहरहाल अंचल कार्यालय में लिपिक के खाली एक पद पर कर्मी पदस्थापित कर मामले को यथावत छोड़ दिया गया.
सवाल है कि क्या लिपिक के रूप में शिवचंद्र ऋषिदेव के योगदान लेने से ही सारा मामला खत्म हो जायेगा. इससे कर्मियों के कार्य व्यवहार में बदलाव की उम्मीद की जा सकती है. अररिया ही नहीं जिले के सभी अंचलों में हर छोटे-बड़े कामों के लिए कर्मियों को नजराना चढ़ाने की मजबूरी से क्या लोगों को निजात मिल जायेगा.
अगर नहीं तो इस पूरे प्रकरण पर सीओ की भूमिका संदिग्ध मानी जायेगी. लोगों को यह कहने का मौका मिल जायेगा कि सीओ ने जानबूझ कर कार्यालय के कुछ कर्मियों पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का ढ़ोंग तो नहीं रचा.
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