बस्ती में नहीं है एक भी पक्का आवास, नहीं मिल रहा राशन-केराेसिन

Updated at : 16 Apr 2019 8:05 AM (IST)
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बस्ती में नहीं है एक भी पक्का आवास, नहीं मिल रहा राशन-केराेसिन

पंकज झा, अररिया : फारबिसगंज विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत औराही पूरब पंचायत का हल्दिया गांव के वार्ड संख्या नौ में महादलित समुदाय की बड़ी आबादी बसी हुई है. टोला का हर घर केला, बांस, कदम व इसी तरह के अन्य पेड़ों से घिरा है. टोला पहुंचने के लिए लगभग 800 मीटर धूल भरी कच्ची सड़क पार […]

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पंकज झा, अररिया : फारबिसगंज विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत औराही पूरब पंचायत का हल्दिया गांव के वार्ड संख्या नौ में महादलित समुदाय की बड़ी आबादी बसी हुई है. टोला का हर घर केला, बांस, कदम व इसी तरह के अन्य पेड़ों से घिरा है. टोला पहुंचने के लिए लगभग 800 मीटर धूल भरी कच्ची सड़क पार करना होता है. कच्ची सड़क पर जगह-जगह गहरे गड्ढे हैं. चैत्र के महीने में तेज पछिया हवाओं के साथ उड़ने वाली धूल के कारण बस्ती जाने वाले राहगीर धूल से सने नजर आते हैं.

बस्ती के मुहाने पर लंगोट पहने 60 वर्षीय सुरेंद्र ततमा धूप में रखे दो-चार किलो गेहूं से मिट्टी व कंकड़ के टुकड़ों को छांट रहे हैं. गेहूं कोटा (पीडीएस) का है. बस इतनी सी बात पूछने पर सुरेंद्र तिलमिला उठते हैं. कहते हैं कि कोटा से तो पहले जो राशन-किरासन मिलता था. वह तो कबके बंद हो चुका है. कोटा वाले कार्ड खोजते हैं. बस्ती में किसी को कार्ड ही नहीं तो अनाज क्या खाक मिलेगा.
राशन कार्ड बनाने के नाम पर तो कई बार लोगों से पैसे ठगे गये हैं. इसके ठीक बगल में एक पेड़ के नीचे दो चार महिलाएं अपने छोटे-छोटे नग्न बच्चों के साथ सुस्ता रही हैं. महिलाएं अपने फटे-पुराने साड़ियों से चेहरा छुपा रही हैं. तो बच्चे दौड़ कर करीब पहुंचने लगे हैं. महिलाओं के चेहरे तो नहीं दिखते लेकिन उसकी बुदबुदाहट की आवाज हम तक जरूर पहुंचने लगी है. जो दबी जुबान सुरेंद्र के पक्ष में उठ रहे हैं.
राशन कार्ड बनावे के नाम पर काय बैर पांच सौ, हजार टेका लोग सब लै गेले. लागय ये इहो सब ठगे ले एलो ये. बस्ती में दूर-दूर तक पक्का आवास कहीं नहीं दिखता. महिलाओं से मुखातिब होते हुए यह सवाल पूछे जाने पर एक स्वर में महिलाएं कहती हैं कि पक्का मकान ते गांव के बड़का आदमी सब के मिलते गरीब के कोई पक्का मकान किये देते.
इस बीच हवा का एक तेज झोंका अपने साथ धूल का अंबार ले कर आता है. सभी खुद को धूल से बचाने का प्रयास करते हैं. तब तक बस्ती के मनोहर ततमा, बसमतिया देवी, झूलन देवी, सहित बस्ती के कई अन्य लोग वहां पहुंच जाते हैं. कच्ची सड़क से उठ रहे धूल को लेकर लोगों का आक्रोश भड़क उठता है. बस्ती की महिला-पुरुष सड़क की बदहाली पर मायूसी का इजहार करते हुए कहते हैं कि देखे झक सात साल पेहने रोड पर माटी भराल गेले रहै, आय तक ईटो नै बिछे सकले.
एक्खन ते ऐत्ते आब गेलअ कनैक पायन पैड़ जेथन ते बस्ती न आबे सकबअ. सड़क पर कमर भर पाइन लागल रहै छै. ओ समय में कोई बीमार पड़ल्हन ते मरला के बिना कोई चारा नै छे. जे रास्ता में बड़का जमींदार सब चले छे गांव के ओ सब रास्ता बन गेलै लेकिन इ रास्ता में अठबज्जर गिरल छै.
सरकार दावा करती है देती कुछ नहीं
टाट के घर से एक युवक दीनानाथ निकलते हैं. हमारी बातें पहले से वह सुन रहे थे. दिल्ली में मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करने वाले दीनानाथ कहते हैं. भैया अगर वोट होने से पहले बहुत लोग गांव आते हैं. इसके बाद उनका चेहरा नजर नहीं आता है. सरकार ये दिया वो देंगे का दावा करती है.
लेकिन देती कुछ नहीं. अगर देती तो मजदूरी के लिए परदेश नहीं जाना पड़ता. ऐसे टाट के घर में रहना नहीं पड़ता. देखिये न शौचालय बनाने को लेकर कैसा हव्वा मचा है. बस्ती की बहु-बेटी अब भी लोटा लेकर बाहर क्यों जाती.
फोटो काहे खींचते हैं फोटो और नाम लिखाने से अब मन ऊब गया है
सुरेंद्र ततमा को वृद्धा पेंशन नहीं मिलती है. तो अन्य सरकारी सुविधाएं नहीं मिलने से लोगों का मन मुखिया सहित अन्य जनप्रतिनिधियों से टूटा हुआ है. सामने एक चापाकल के पास प्यास बूझाने के लिए आगे बढ़ने हाथ में मोबाइल देखकर माटी के चुल्हे खाना बना रही बसमतिया घबरा जाती है. कहती है- बाबू फोटो न खिछिह बहुत लोग फोटो खीची के लए गेलै, हैय छै कुछ न.
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