चुनाव-दर-चुनाव के बाद भी नहीं बदल रही स्वास्थ्य विभाग की स्थिति

Updated at : 26 Mar 2019 8:04 AM (IST)
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चुनाव-दर-चुनाव के बाद भी नहीं बदल रही स्वास्थ्य विभाग की स्थिति

अररिया : चुनाव दर चुनाव के बाद भी जिला स्वास्थ्य विभाग की स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है. डाॅक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों के पदस्थापन की स्थिति तो अरसे से चिंताजनक है. इस मायने में सदर अस्पताल सबसे अधिक उपेक्षित है. एक तरफ जहां अस्पताल में प्रति दिन ओपीडी रोगियों की सात सौ से पार […]

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अररिया : चुनाव दर चुनाव के बाद भी जिला स्वास्थ्य विभाग की स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है. डाॅक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों के पदस्थापन की स्थिति तो अरसे से चिंताजनक है.
इस मायने में सदर अस्पताल सबसे अधिक उपेक्षित है. एक तरफ जहां अस्पताल में प्रति दिन ओपीडी रोगियों की सात सौ से पार होने का दावा विभागीय अधिकारी करते हैं. वहीं दूसरी तरफ पदस्थापित एमबीबीएस डाॅक्टरों की संख्या दर्जन भर भी नहीं है. जबकि सदर अस्पताल में विशेषज्ञ सहित डाॅक्टरों के लगभग चार दर्जन पद स्वीकृत हैं.
जिला स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक जिले में सदर अस्पताल, फारबिसगंज अनुमंडल अस्पताल के अलावा दो रेफरल व सात प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. सभी अस्पतालों को मिला कर डाॅक्टरों के कुल करीब 200 पद स्वीकृत हैं. पर सदर अस्पताल सहित जिले भर में केवल चार दर्जन के करीब डाॅक्टर ही पदस्थापित व कार्यरत हैं.
एएनएम व जीएनएम का भी टोटा
जिला स्वास्थ्य विभाग में केवल डाॅक्टरों की ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य कर्मियों की भी भारी कमी है. मिली जानकारी के अनुसार जिले में जीएनएम के 125 पद स्वीकृत हैं, पर पदस्थापित केवल दो दर्जन के करीब हैं. यही हाल एएनएम का भी है. डीपीएम ने बताया कि जिले भर में एएनएम के नौ सौ से अधिक पद स्वीकृत हैं. पर पोस्टिंग केवल 285 की ही है.
नहीं है कोई स्त्री रोग विशेषज्ञ
हैरत में डालने वाली बात ये है कि 100 बिस्तरों वाले सदर अस्पताल में भी कोई स्त्री रोग विशेषज्ञ की पोस्टिंग नहीं हुई है. जबकि जिला स्वास्थ्य समिति के प्रबंधक रेहान अशरफ खुद स्वीकारते हैं कि सदर अस्पताल में औसतन प्रति दिन 70 से 80 प्रसव के मामने आते हैं. वे कहते हैं कि फिलहाल दो महिला एमबीबीएस डाॅक्टरों से काम चलाया जा रहा है. वैसे जानकार कहते हैं कि प्रसव के सारे माले नर्सों पर भी निर्भर रहते हैं.
आयुष चिकित्सक भी केवल 25 प्रतिशत
एमबीबीएस ही नहीं बल्कि जिले के सरकारी अस्पतालों में आयुष चिकित्सकों का टोटा है. आलम ये है कि जहां जरूरत 73 की है, वहां केवल 26 आयुष चिकित्सक की पदस्थापित हैं. इसकी पुष्टि डीपीएम भी करते हैं.
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