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धनबाद : बिनाका गीतमाला में अमीन सयानी ने पूरी की थी फरमाइश, पत्र लिख कहा था.......

Updated at : 22 Feb 2024 5:01 AM (IST)
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अमीन सयानी स्मृति शेष

अमीन सयानी और झारखंड से जुड़ी यादें

25 वर्षीय ग्रेज्युट असलम नवाब (अब दिवंगत) ने कहा था कि रेडियो पर नाम प्रसारित होना ही अपने आप में एक सुखद अनुभूति है. कितने लोग मेरे नाम से परिचित होंगे, ऐसी कुछ भावना मन को सुख देते हैं.

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‘जी हां बहनों और भाइयों, मैं हूं आपका दोस्त अमीन सयानी और आप सुन रहे हैं बिनाका गीतमाला.’ 42 साल तक अपने इस शानदार अंदाज और खनकती आवाज से लोगों को रेडियो का दीवाना बनाने वाले अमीन सयानी के 80 के दशक में बेरमो में कई दीवाने थे. एक समय था जब रेडियो सुनते वक्त आपने ध्यान दिया होगा कि किसी एक स्थान से अनेकों फरमाइश करनेवालों के नामों की उद्घोषणा गीतों के साथ की जाती थी. उस वक्त रेडियो श्रोता संघों के नाम से भी लोग अपरिचित नहीं होंगे. ऐसी ही जगहों में एकीकृत बिहार (अब झारखंड) के कोयला क्षेत्र में पड़नेवाले कस्बाई शहर बेरमो का नाम तब सुर्खियों में था. संडे बाजार निवासी रामदेव मुंडा (बेहतरीन फुटबॉलर), मनजीत छाबड़ा, सुबोध सिंह पवार, असलम नवाब, दीपक अकेला, इसरार परवाना, अमरीक सिंह दीवाना, इंद्रजीत चंचल, उमेश सकूजा प्यासा आदि अनेक नाम काफी चर्चित थे. चर्चित होने के कारण था फिल्मी गीतों के प्रति इनकी दीवानगी. ये लोग फिल्मी पत्रिका माधुरी के आवरण पृष्ठ के किरदार में शामिल रहे. तब के स्टेज पर अभिनय के शौकीन 25 वर्षीय दीपक सिंह अकेला ने दिये इंटरव्यू में कहा था कि गीतों के प्रति लगाव है, इसलिए फरमाइशें भेजते हैं. पंसदीदा गाने तो रिकाॅर्डो, कैसेटों आदि से सुने ही जा सकते हैं. फरमाइशें भेजना तो एक हॉबी है. इस हॉबी के चलते वह एक माह में करीब 85 फरमाइशी कार्ड भेजते थे.

सुखद अनुभूति था रेडियो पर नाम प्रसारित होना

बीएससी के छात्र 20 वर्षीय सुबोध सिंह पवार ने इंटरव्यू में कहा था कि सिर्फ नाम प्रसारण की भावना रहती है. सभी प्रसारित नाम सुन पाना न तो संभव है, न ही व्यावहारिक. लोगों के कानों तक नाम पहुंच जाता है, बहुत है. 25 वर्षीय ग्रेज्युट असलम नवाब (अब दिवंगत) ने कहा था कि रेडियो पर नाम प्रसारित होना ही अपने आप में एक सुखद अनुभूति है. कितने लोग मेरे नाम से परिचित होंगे, ऐसी कुछ भावना मन को सुख देते हैं. 28 वर्षीय आदिवासी युवक रामदेव मुंडा ने दिये इंटरव्यू में कहा था कि लाउडस्पीकर पर प्यारा दुश्मन का हरि ओम हरि… बज रहा था. यह गीत हमें बेहद पंसद है, पर दिन में चार-पांच या इससे अधिक दफे भी इसे बिना रेडियो के सुन लेता हूं. काफी पहले एक मित्र ने आदिवासी होने के नाते हीनभावना से कहा था कि आदिवासियों के नाम रेडियो पर नहीं आते. इस चैलेंज से वशीभूत होकर रेडियो पर फरमाइशें भेजनी शुरू की. जो भी हो, रेडियो पर नाम आना काफी सुखकर लगता है. कई बार ऐसा हुआ कि जिस गीत की फरमाइश की ही नहीं थी, वह भी मेरे नाम से बजा. इंद्रजीत सिंह चंचल, साइनिंग स्टार ऑर्केस्ट्रा के संचालक रहे अमरीक सिंह दीवाना ने कहा था कि हमलोग वैसे ही गीतों की फरमाइश भेजते हैं, जो आसानी से तथा धुंआधार बजता हो. उस वक्त संडे बाजार निवासी निर्मल नाग, हरिवंश सिंह, फुसरो के मंजीत कुमार छाबड़ा, विजय कुमार छाबड़ा, रामाधार विश्वकर्मा, कुमारी वीणा छाबड़ा, कुमारी पीमी छाबड़ा, कुमारी रीना छाबड़ा, सुनीता गुप्ता, मो नौशाद परवाना, महेंद्र प्रसाद गुप्ता के इंटरव्यू भी माधुरी पत्रिका के किरदार के रूप में छपे थे. 30 अक्टूबर 1981 को यह इंटरव्यू प्रकाशित हुआ था.

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