कजाकिस्तान में झारखंड की बेटी ने जीता स्वर्ण, माड़ पीकर करती थी अभ्यास

अंतरराष्ट्रीय आमंत्रण एथलेटिक्स मीटरांची : झारखंड की फ्लोरेंस बारला ने अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स मीटर में स्वर्ण पदक अपने नाम किया है. अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहले ही प्रयास में इस खिलाड़ी ने खुद को साबित किया है. कजाकिस्तान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय आमंत्रण एथलेटिक्स मीट में फ्लोरेंस ने 400 मीटर दौड़ में 54.73 का समय निकालकर स्वर्ण पदक […]
अंतरराष्ट्रीय आमंत्रण एथलेटिक्स मीट
रांची : झारखंड की फ्लोरेंस बारला ने अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स मीटर में स्वर्ण पदक अपने नाम किया है. अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहले ही प्रयास में इस खिलाड़ी ने खुद को साबित किया है. कजाकिस्तान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय आमंत्रण एथलेटिक्स मीट में फ्लोरेंस ने 400 मीटर दौड़ में 54.73 का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता. खेल मंत्री अमर बाउरी, सचिव राहुल शर्मा, निदेशक अनिल कुमार सिंह, रणेंद्र कुमार, झारखंड एथलेटिक्स संघ के अध्यक्ष मधुकांत पाठक सहित अन्य ने फ्लोरेंस को बधाई दी है.
दो साल से शानदार प्रदर्शन कर रही है फ्लोरेंस बारला
पिछले दो सालों से फ्लोरेंस बारला राष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन कर रही है. खेलों इंडिया में इस खिलाड़ी ने रजत पदक जीता था. इसके पहले रांची में आयोजित 34वें जूनियर नेशनल एथलेटिक्स प्रतियोगिता के 400 मीटर में स्वर्ण पदक, 400 मीटर ओपन नेशनल एथलेटिक्स प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी प्रतिभा को साबित कर दिया था.
बाल समागम से सामने आयी प्रतिभा, देश के लिए जीता सोना
फ्लोरेंस बारला सबसे पहले रांची में हुए बाल समागम में भाग लेने आयी थी. उस दौरान बेहतर प्रदर्शन देखते हुए नवाडीह स्थित डे बोर्डिंग सेंटर में कोच ब्रदर क्लेप की देखरेख में एथलेटिक्स का प्रशिक्षण लेने लगी. धीरे-धीरे फ्लोरेंस के खेल में निखार आने लगा और कई प्रतियोगिता में पदक अपने नाम किया. इस खिलाड़ी की बहन आशा किरण बारला भी राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता था. वहीं अब फ्लोरेंस ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में देश के लिए स्वर्ण पदक जीता है.
माड़ पीकर करती थी अभ्यास
नवाडीह की रहने वाली फ्लोरेंस के सिर से पिता विलियम बारला का साया बचपन में उठ गया था. मां रोजिला नवाडीह के खेतों में काम करके घर चलाती है. मां के साथ खेतों में दौड़ने वाली फ्लोरेंस अभ्यास करने के लिए कभी खाली पेट तो कभी माड़ पीकर पहुंच जाती थी और कई घंटों तक कोच ब्रदर सालेप टोप्पनो की देखरेख में अभ्यास करती थीं. ये कभी दोपहर का खाना खाती थी तो कभी नहीं भी. लेकिन जुनून में कहीं कोई कमी नजर नहीं आती थी.
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