किस्मत इस बार धौनी के साथ नहीं थी

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 01 Apr 2016 2:44 PM

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।। अनुज कुमार सिन्हा ।। सेमीफाइनल में भारत वेस्टइंडीज से हारा और टी-20 वर्ल्ड कप से बाहर हो गया. अब फाइनल इंग्लैंड जीते या वेस्टइंडीज, भारत को क्या फर्क पड़ता है. भारतीय दर्शकों में भी फाइनल के लिए बहुत रुचि नहीं रहेगी. सवाल है हारा क्यों? हारे इसलिए क्योंकि खराब खेले. किस्मत ने साथ नहीं […]

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।। अनुज कुमार सिन्हा ।।

सेमीफाइनल में भारत वेस्टइंडीज से हारा और टी-20 वर्ल्ड कप से बाहर हो गया. अब फाइनल इंग्लैंड जीते या वेस्टइंडीज, भारत को क्या फर्क पड़ता है. भारतीय दर्शकों में भी फाइनल के लिए बहुत रुचि नहीं रहेगी. सवाल है हारा क्यों? हारे इसलिए क्योंकि खराब खेले. किस्मत ने साथ नहीं दिया. गेंदबाज जब विकेट लेते, गेंद नो बॉल निकल जाती. सीमा पर उछल-उछल कर कैच भी पकड़ते तो पैर सीमा रेखा से सट जाता. विकेट तो गिरती नहीं, छक्का माना जाता. ऐसे में तो जीत की उम्मीद करना बेईमानी थी. अब अश्विन भी नो बॉल डालने लगे (जिस पर बुमरा ने कैच भी पकड़ लिया था) तो समझ लीजिए बुरे दिन आ गये.

किस्मत थी तो कोहली के साथ. भगवान भी बहादुरों का साथ देती है. कोहली जब बल्लेबाजी करने आये तो दो गेंद पर तीन बार रन आउट होने से बचे. एक गेंद पर दो बार निशाना नहीं लगा. कोहली के कैच भी छूटे. लग रहा था कि कोहली के नाम से वेस्टइंडीज को फोबिया हो गया था. डर कर रन आउट नहीं कर रहे थे, कैच छोड़ रहे थे. यह डर उस समय भी दिखा जब कोहली गेंदबाजी करने आ गये. पहली ही गेंद पर विकेट भी ले लिया. दिन कोहली का था, भारत का नहीं. जो बल्लेबाजी अब तक चल नहीं रही थी, वह चली और खासी चली. 192 का स्कोर कम नहीं होता. लेकिन इस स्कोर पर भी हार गये. गेंदबाजों ने साथ नहीं दिया. गेंदबाजी अच्छी नहीं की. अगर वेस्टइंडीज के स्कोर में गेल ने शतक बनाया होता और भारत हारता तो इतना नहीं अखरता. भारत की हार इसलिए ज्यादा अखर रही है क्योंकि गेल दूसरे ओवर की पहली गेंद में ही पैवेलियन लौट चुके थे. दूसरा विकेट भी 19 रन पर गिर चुका था. इसके बाद चार्ल्स, सिमंस और रसेल ने भारतीय गेंदबाजों को धुन दिया.

वेस्टइंडीज के कप्तान समी किस्मत के धनी हैं. इस वर्ल्ड कप में अब तक पांच मैच खेले हैं. पांचों में टॉस जीता. भारत के खिलाफ टॉस जीता. यहां टॉस महत्वपूर्ण था क्योंकि मुंबई में ओस काफी पड़ता है. भारत की हार का बड़ा कारण ओस भी रहा. जो अश्विन और जड़ेजा स्पिन से विपक्षी को तबाह करते रहे हैं, ओस के कारण गेंद पकड़ ही नहीं पा रहे थे. गेंद घूम ही नहीं रही थी. जम कर धुलाई हुई. यह सही है कि टॉस पर किसी का वश नहीं होता. धौनी इसमें कुछ नहीं कर सकते थे. अगर समी ने उन्हें पहले बल्लेबाजी के लिए बुलाया तो टीम इंडिया को आना ही था. धवन को हटा कर रहाणे को टीम में लाया गया था. अगर देखा जाये तो यह बदलाव भी बुरा नहीं था. रोहित शर्मा फार्म में थे और दोनों ने 7.2 ओवर में 61 रन की साझेदारी कर दी. यह अच्छी साझेदारी थी. इसे कम भी नहीं कहा जा सकता. रहाणे भले ही थोड़े सुस्त निकले (35 गेंद पर 40रन) पर रोहित ने इस कमी को दूर किया. बाद में तो कोहली छा गये. 47 गेंदों पर 89 रन. जहां मन किया, वहां मारा. पहली ही गेंद से तेज खेलने के मूड में थे और गलतियां पर गलतियां कर रहे थे. लेकिन आउट नहीं हुए. अब यह सवाल उठ सकता है कि धौनी या रहाणे और तेज खेले होते (क्योंकि भारत के सिर्फ दो ही विकेट गिरे थे, रैना, मनीष पांडेय, पांडया को मौका ही नहीं मिला) तो शायद भारत जीत जाता.

परेशानी बल्लेबाजी से नहीं हुई. 192 को स्कोर अच्छा स्कोर था. जैसे ही गेल आउट हुए, यह स्कोर और बड़ा हो गया. टीम इंडिया मान गयी कि मैच भारत की पकड़ में है और भारत को फाइनल में खेलने से कोई रोक नहीं सकता. भारतीय खिलाड़ी यह मान बैठे कि गेल के बगैर मैच जीतना वेस्टइंडीज की कूबत से बाहर की बात है. इधर वेस्टइंडीज की ओर से चार्ल्स-सिमंस शॉट खेलते जा रहे थे. भारतीय खिलाड़ी यही मान रहे थे कि मारते जाओ, कितना मारोगे, बहुत रन है. यही सोचते-सोचते मैच भारत के हाथ से निकलता गया. सिमंस को तीन बार आउट किया गया. दो बार तो गेंद को अंपायर ने नो बॉल करार दिया. किस्मत अगर भारतीय पारी के समय कोहली के साथ थी तो दूसरी पारी में सिमंस के साथ.

कहीं न कहीं गेंदबाजों के चयन के दौरान भी गलती हुई है. सिर्फ नेहरा अच्छी गेंदबाजी कर सके. जब गेंद गीली थी. स्पिनर चल नहीं पा रहे थे. इसलिए रणनीति के तहत गेल के तुरंत आउट होने के बाद नेहरा-बुमरा का ओवर अंत के लिए बचाना चाहिए था. जब अश्विन-जड़ेजा नहीं चले और धीमी गेंद पर कोहली विकेट ले चुके थे, रन भी सिर्फ चार दिया था तो कोहली को एक-दो ओवर और ट्राइ करना चाहिए था. ऐसा करने से भारत के पास अंतिम ओवरों लिए नेहरा-बुमरा होते. 19वां और 20वां ओवर जड़ेजा-कोहली से फेंकवाया गया क्योंकि उस समय तक नेहरा-बुमरा के ओवर खत्म हो गये थे. अंतिम दो ओवर में 20 रन बनाना था. वहां भी अगर मेन गेंदबाज होते तो कुछ भी हो सकता था. अब हार पर आलोचना होती रहेगा, हार का गम भी रहेगा लेकिन इस सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि भारत ने कम से कम सेमीफाइनल तो खेला. यह मौका पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका या ऑस्ट्रेलिया को नहीं मिला. अगर बांग्लादेश के खिलाफ अंतिम ओवर में चमत्कार नहीं होता, या पाकिस्तान-ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ कोहली ने शानदार और ऐतिहासिक पारी नहीं खेली होती तो भारत की कहानी पहले ही खत्म हो जाती. वेस्टइंडीज की तारीफ करनी ही चाहिए. खास कर आरंभिक खेल के लिए चाल्स की. सिमंस 51 गेंद पर 82 रन और रसेल 29 गेंदों पर 43 रन की. इन तीनों ने खेल का रूख ही बदल दिया. गेल के जल्द आउट होने के बाद हिम्मत नहीं हारी. इसी के लिए वेस्टइंडीज को जाना जाता है. 1975 और 1979 के वर्ल्ड कप के दौरान इंडीज के पास ऐसे ही दिग्गज खिलाड़ी थे (हेंस, ग्रीनिज, विवियन रिचर्ड्स,लॉयड, रोहन कन्हाई, एंडी राबट् र्स, होल्डिंग, गार्नर), जो कभी हार नहीं मानते थे. इंडीज की इस टीम ने पुराने दिन की याद ताजा कर दी. यह खेल है, हार-जीत इसका हिस्सा है. इसे स्वीकारना चाहिए.

लेखक ‘प्रभात खबर’ के वरिष्ठ संपादक (झारखंड) हैं.

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