चैत्र नवरात्रि में मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा क्यों की जाती है? जानें हर दिन का विशेष महत्व

Updated at : 14 Mar 2026 10:58 AM (IST)
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Chaitra Navratri 2026

मां दुर्गा के नौ रूप

Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि में माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है. माता के हर रूप का अलग महत्व, शक्ति और प्रतीक है. कहा जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से माता के इन नौ स्वरूपों की नौ दिनों तक आराधना करते हैं, उनके जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली आती है.

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Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि को माता दुर्गा की उपासना का सर्वोत्तम समय माना जाता है. नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान भक्त मां दुर्गा के अलग-अलग नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि सिर्फ एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह आत्मिक ऊर्जा और साधना का समय भी होता है. शास्त्रों में बताया गया है कि देवी दुर्गा ने सृष्टि की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए अलग-अलग समय पर विभिन्न रूप धारण किए. यही कारण है कि नवरात्रि के हर दिन देवी के एक विशेष स्वरूप की पूजा की जाती है. मान्यता है कि इन नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की श्रद्धा से आराधना करने से जीवन में शक्ति, ज्ञान, साहस और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है.

नवदुर्गा की पूजा का शास्त्रों में महत्व

धार्मिक ग्रंथों जैसे मार्कंडेय पुराण और दुर्गा सप्तशती में देवी के इन नौ स्वरूपों का उल्लेख मिलता है. इन ग्रंथों के अनुसार देवी शक्ति ही सृष्टि की मूल ऊर्जा हैं और उनके ये नौ रूप जीवन के अलग-अलग गुणों और शक्तियों का प्रतीक माने जाते हैं. नवरात्रि के नौ दिन एक आध्यात्मिक यात्रा की तरह माने जाते हैं, जिसमें साधक धीरे-धीरे अपने भीतर की नकारात्मकता को दूर कर आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा को जागृत करता है.

पहले दिन – मां शैलपुत्री की पूजा से नवरात्रि की शुरुआत


नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है. ‘शैल’ का अर्थ पर्वत होता है और शैलपुत्री का मतलब है पर्वतराज हिमालय की पुत्री. देवी का यह स्वरूप माता पार्वती का पहला रूप माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां पार्वती पहले जन्म में देवी सती थीं. एक बार माता सती के पिता ने भगवान शिव का अपमान किया, जिसे माता सहन न कर सकीं और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए. अगले जन्म में उन्होंने हिमालय के घर शैलपुत्री के रूप में जन्म लिया. मां शैलपुत्री को शक्ति और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है. उनके हाथ में त्रिशूल और कमल होता है और वे वृषभ (बैल) पर सवार रहती हैं. मान्यता है कि उनकी पूजा से जीवन में स्थिरता, साहस और आत्मविश्वास प्राप्त होता है. इसी दिन कलश स्थापना के साथ नवरात्रि की शुरुआत होती है.

दूसरे दिन – मां ब्रह्मचारिणी की आराधना का महत्व

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है. यह देवी का तपस्या और संयम का स्वरूप माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक कठोर तप किया था. इस तपस्विनी रूप को ही ब्रह्मचारिणी कहा जाता है. मां ब्रह्मचारिणी के हाथों में जपमाला और कमंडल होता है, जो साधना और तपस्या का प्रतीक हैं. उनकी पूजा से व्यक्ति को धैर्य, संयम और कठिन परिस्थितियों में दृढ़ रहने की शक्ति मिलती है.

तीसरे दिन – मां चंद्रघंटा का रूप देता है साहस

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होती है. उनके मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार की घंटी होती है, इसलिए उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है. देवी का यह रूप अत्यंत वीर और शक्तिशाली माना जाता है. कहा जाता है कि जब दुष्ट शक्तियां पृथ्वी पर अत्याचार करने लगीं, तो देवी ने इसी रूप में उनका संहार किया. मां चंद्रघंटा सिंह पर सवार रहती हैं और उनके दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र होते हैं. उनकी आराधना से भय, संकट और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है और जीवन में साहस बढ़ता है.

चौथे दिन – मां कूष्मांडा को माना जाता है सृष्टि की रचयिता

नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है. धार्मिक मान्यता है कि जब सृष्टि में चारों ओर अंधकार था, तब देवी ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी. इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति माना जाता है. मां कूष्मांडा को सूर्य के समान तेजस्वी बताया गया है और माना जाता है कि वे सूर्य मंडल में निवास करती हैं. उनकी पूजा से शरीर में ऊर्जा, स्वास्थ्य और सकारात्मक शक्ति का संचार होता है.

पांचवें दिन – मां स्कंदमाता की पूजा का महत्व

नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है. वे भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं. देवी का यह स्वरूप मातृत्व, करुणा और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है. मां स्कंदमाता सिंह पर सवार रहती हैं और अपनी गोद में बाल रूप में स्कंद को धारण करती हैं. मान्यता है कि उनकी पूजा से संतान सुख, परिवार में सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त होती है.

छठे दिन – मां कात्यायनी का स्वरूप देता है शक्ति और विजय

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है. पौराणिक मान्यता के अनुसार महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था, इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा. देवी कात्यायनी ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था, इसलिए उन्हें साहस और विजय की देवी माना जाता है. उनकी पूजा से जीवन में साहस, शक्ति और कठिन परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है.

सातवें दिन – मां कालरात्रि का उग्र स्वरूप दूर करता है भय

नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है. यह देवी का सबसे उग्र और शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार जब राक्षसों का आतंक बढ़ गया था, तब देवी ने कालरात्रि रूप धारण कर उनका विनाश किया. उनका वर्ण काला, केश बिखरे हुए और आंखों से अग्नि निकलती हुई बताया गया है. हालांकि उनका स्वरूप भयानक दिखता है, लेकिन वे अपने भक्तों को हमेशा भय और संकट से बचाती हैं. इसलिए उन्हें शुभ फल देने वाली देवी भी कहा जाता है.

आठवें दिन – मां महागौरी का शांत स्वरूप देता है सुख और सौभाग्य

नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है. यह देवी का बेहद शांत और सौम्य रूप माना जाता है. कथाओं के अनुसार कठोर तपस्या के कारण देवी पार्वती का शरीर काला पड़ गया था, लेकिन भगवान शिव ने गंगाजल से उनका अभिषेक किया, जिससे उनका रंग अत्यंत गौर हो गया. इसी कारण उन्हें महागौरी कहा गया. उनकी पूजा से जीवन में सुख, शांति, सौभाग्य और समृद्धि आती है.

नौवें दिन – मां सिद्धिदात्री की पूजा से पूरी होती है साधना

नवरात्रि का अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री को समर्पित होता है. देवी का यह स्वरूप सभी प्रकार की सिद्धियों और शक्तियों को देने वाला माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव ने भी देवी सिद्धिदात्री की आराधना करके कई दिव्य शक्तियां प्राप्त की थीं. मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से ज्ञान, सफलता और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद मिलता है. नवरात्रि की साधना इसी दिन पूर्ण मानी जाती है.

चैत्र नवरात्रि के नौ दिन देवी शक्ति की आराधना के साथ-साथ आत्मिक विकास की यात्रा भी माने जाते हैं. मां दुर्गा के नौ स्वरूप जीवन के अलग-अलग गुणों- शक्ति, तपस्या, साहस, ज्ञान, करुणा और सिद्धि का प्रतीक हैं. इसी वजह से नवरात्रि में हर दिन देवी के अलग स्वरूप की पूजा की जाती है, ताकि भक्त देवी की संपूर्ण कृपा प्राप्त कर सकें और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो.

ज्योतिषाचार्य संजीत कुमार मिश्रा
ज्योतिष, वास्तु एवं रत्न विशेषज्ञ
8080426594 / 9545290847

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Neha Kumari

लेखक के बारे में

By Neha Kumari

प्रभात खबर डिजिटल के जरिए मैंने पत्रकारिता की दुनिया में अपना पहला कदम रखा है. यहां मैं धर्म और राशिफल बीट पर बतौर जूनियर कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रही हूं. इसके अलावा मुझे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विषयों पर लिखने में रुचि है.

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