Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति में केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, परंपरा और लोक आस्था का प्रतीक है. सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही यह पर्व नई ऊर्जा, सकारात्मकता और जीवन में आगे बढ़ने का संदेश देता है. देश के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन तिल, गुड़ और खिचड़ी इसका प्रमुख केंद्र होते हैं.
दान-पुण्य और स्नान का विशेष महत्व
शास्त्रों में मकर संक्रांति के दिन स्नान और दान को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है. इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र और खिचड़ी का दान किया जाता है. मान्यता है कि तिल का दान शनि दोष को शांत करता है, जबकि सूर्य को अर्घ्य देने से आरोग्य और यश की प्राप्ति होती है. यही कारण है कि संगम, गंगा और अन्य तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है.
खिचड़ी दान: समृद्धि और संतुलन का प्रतीक
मकर संक्रांति को कई क्षेत्रों में खिचड़ी पर्व के रूप में भी मनाया जाता है. खिचड़ी अन्न, दाल और घी का संतुलित रूप है, जो समृद्धि, संतोष और सामाजिक समानता का प्रतीक माना जाता है. इसे भगवान को भोग के रूप में अर्पित करने के बाद गरीबों और जरूरतमंदों में बांटना विशेष पुण्यकारी माना गया है. यह परंपरा समाज में सेवा और करुणा का भाव जागृत करती है.
23 वर्षों बाद बना दुर्लभ एकादशी संयोग
इस वर्ष मकर संक्रांति पर लगभग 23 वर्षों बाद एकादशी का विशेष संयोग बना है, जिससे पर्व का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है. ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन किया गया स्नान, दान और पूजा कई गुना फल प्रदान करता है. श्रद्धालु व्रत, जप और दान के माध्यम से पुण्य अर्जित करते हैं.
खरमास का अंत और शुभ कार्यों की शुरुआत
मकर संक्रांति के साथ ही खरमास समाप्त हो जाता है. इसके बाद विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है. इसी कारण इस दिन को शुभ और मांगलिक कार्यों के लिए अत्यंत अनुकूल माना गया है.
तिलकुट और लोक परंपराओं की मिठास
मकर संक्रांति पर तिलकुट, दही-चूड़ा, लाई और गुड़ से बने व्यंजन न केवल स्वाद बढ़ाते हैं, बल्कि आपसी रिश्तों में मिठास घोलते हैं. लोग एक-दूसरे के घर जाकर पर्व की शुभकामनाएं देते हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द और भाईचारे की भावना मजबूत होती है.

