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Janmashtami 2020 Puja Vidhi: अष्टमी तिथि को ही व्रत और पूजन है उत्तम फलदायी, जानिए जन्माष्टमी को लेकर शास्त्रों में क्या है विभेद

Updated at : 11 Aug 2020 3:09 PM (IST)
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Janmashtami 2020 Puja Vidhi: अष्टमी तिथि को ही व्रत और पूजन है उत्तम फलदायी, जानिए जन्माष्टमी को लेकर शास्त्रों में क्या है विभेद

Janmashtami 2020 Puja vidhi: इस बार स्मार्तों के लिए जन्माष्टमी का व्रत 11 अगस्त, मंगलवार को है. इस दिन सुबह 7 बजकर 20 मिनट से अष्टमी प्रारंभ हो रही है और अगले दिन (12 अगस्त, बुधवार को) सुबह 8:00 बजे तक रहेगी. कुछ वैष्णव संप्रदाय के लोग उदय-व्यापिनी अष्टमी (सूर्योदय के समय अष्टमी होना) मुख्य मानते हैं, तो कुछ मध्य रात्रि में रोहिणी नक्षत्र को. पुनः कुछ सूर्योदय में रोहिणी नक्षत्र के होने को.

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Janmashtami 2020 Puja vidhi: इस बार स्मार्तों के लिए जन्माष्टमी का व्रत 11 अगस्त, मंगलवार को है. इस दिन सुबह 7 बजकर 20 मिनट से अष्टमी प्रारंभ हो रही है और अगले दिन (12 अगस्त, बुधवार को) सुबह 8:00 बजे तक रहेगी. कुछ वैष्णव संप्रदाय के लोग उदय-व्यापिनी अष्टमी (सूर्योदय के समय अष्टमी होना) मुख्य मानते हैं, तो कुछ मध्य रात्रि में रोहिणी नक्षत्र को. पुनः कुछ सूर्योदय में रोहिणी नक्षत्र के होने को. ऐसे में एक ही जन्माष्टमी व्रत को कुछ 11 को, तो कुछ 12 को भी मनायेंगे. जानिए जन्माष्टमी तिथि को लेकर शास्त्रों में क्या है विभेद पेश है ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ मार्कण्डेय शारदेय की इस मामले पर विवेचना…

निबंधकारों ने विद्धा, शुद्धा, रोहिणीयुता, रोहिणीरहिता एवं केवलाष्टमी नामोल्लेख किया है. हां, मध्यरात्रि में अष्टमी का होना सर्वोपरि है. वस्तुतः जया, यानी अष्टमी का व्रत होने से ही यह जयंतीव्रत है, लेकिन ‘विष्णुरहस्य’ आदि में रोहिणी-युक्त अष्टमी कही गयी है, जो रोहिणी इस बार बुधवार (12/13 अगस्त) को रात्रि 1:28 से प्रारंभ हो रही है और गुरुवार (13/14 अगस्त) को रात्रि 3:15 तक है.

शास्त्रमत से कोई योग न हो तो अष्टमी को ही व्रत करना उचित है. ‘निर्णयसिन्धु’ में कहा गया है. दिवा वा यदि रात्रौ वा नास्ति चेद् रोहिणी-कला।रात्रियुक्तां प्रकुर्वीत विशेषेणेन्दु- संयुताम्’।। अर्थात्, दिन या रात कभी भी रोहिणी नहीं हो, तो केवल मध्यरात्रि में चंद्रोदय-व्यापिनी अष्टमी को ही व्रत करें. दरअसल, श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को मध्यरात्रि में हुआ था. उस समय रोहिणी नक्षत्र का चंद्रमा था. इन्हीं तिथि-नक्षत्रों को लेकर मान्यताएं-मतांतरों में बदलती गयीं. गुरुपरंपरा से रूढ़ियां पनपती गयीं, आम जन चक्की में पिसते गये. आज भी कोई उदार हो, समन्विति को तैयार नहीं. यही कारण है मथुरा में सूर्योदय-व्यापिनी अष्टमी को यह व्रतोत्सव मनता है, तो हम गृहस्थों के यहां केवल इतना ही देखा जाता है कि मध्यरात्रि में अष्टमी हो.

हां, एक कारण यह भी है कि हम जन्मव्रत मनाते हैं, तो संप्रदाय-विशेष के लोग उत्सवव्रत. जैसा कि देवीभागवत (4.24.1) कहता है- ‘प्रातः नन्दगृहे जातः पुत्रजन्म- महोत्सव। अर्थात् श्रीकृष्ण के जन्म लेने की अगली सुबह नंदजी के यहां जन्मोत्सव मना. संभव है, यहीं से यह परंपरा विकसित हुई हो.

जन्माष्टमी से संबंधित कथा एवं विधि

लोग पारंपरिक रूप से मंदिरों व अपने-अपने घरों में यह जन्मोत्सव मनाते ही हैं, भविष्य पुराण में जन्माष्टमी से संबंधित कथा एवं विधि आयी है. युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण इस व्रत की महिमा बताते कहते हैं कि इस एक ही व्रत के कर लेने से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं. यहां दिया गया विधान तो अतिसंपन्नता के साथ-साथ अतिश्रद्धा से ही संभव है, तो भी सहज साध्य के रूप में प्रातः स्नानादि दैनिक कृत्य कर उपवास रखते हुए वस्तु-संचय में लग जाएं.

दोपहर होते पुनः स्नान कर श्रीकृष्ण-भक्ति में विशेष तत्पर हो जाएं. पहले माता देवकी का, उपरांत माता यशोदा का यथासाध्य रंगोली से ही सही, सूतिकागृह निर्माण कर उन दोनों को विविध प्रकार के फूलों से, रत्नों के बदले अनेक रंगों के अबीर, हल्दीचूर्ण, चौरठ, रोली से सजाएं. सूतिकागृहों के आस-पास व दीवारों पर गोप, गोपी, घंटा, मृदंग, शंख, कलश, स्वस्तिक, कमल, देवगण, ग्रह, अप्सराएं, गायें, हाथी, कालिय नाग, यमुना के साथ-साथ खड्ग, मूसल से सुशोभित एवं चित्रित करें. सूतिकागृह के मध्य पलंग पर अर्धसुप्त देवकी और स्तनपान करते शिशु कृष्ण की प्रतिमा व चित्र रखें.

इसी तरह दूसरे सूतिकागृह में कन्या (योगमाया) के साथ यशोदा को भी स्थापित करें. पहले द्वार पर तलवार-ढाल लिये वसुदेवजी और दूसरे पर नंदजी हों. इसके बाद पूजा-सामग्री में जलपूर्ण पात्र, रोली-चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप तथा प्रसाद के लिए खीरा-ककड़ी, अनार, नारियल, कटहल, नारंगी, पान-सुपारी वगैरह एकत्र कर लें.

इस मंत्र से चंद्रमा को दें अर्घ्य

चूंकि श्रीकृष्ण-जन्म मध्य रात्रि (अभिजित् मुहूर्त) में हुआ था, इस दिन रात्रि 11:21 में चंद्रोदय हो रहा है, अतः इसके पूर्व आसन पर बैठ हाथ में जल ले संकल्प करें- ‘ऊँ विष्णुः विष्णुः विष्णुः नमः परमात्मने अद्य गोत्रे उत्पन्नः/ उत्पन्ना अहं नामाहं/ नाम्नी अहं श्रुति- स्मृति- पुराणोक्त- फलप्राप्तये यथाशक्ति- व्रताचार-पूर्वकं श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव- पूजनं कर्तुं संकल्पं करिष्ये’। इसके बाद ‘ऊँ चन्द्रदेवाय नमः’ कहकर चंद्रमा को अर्घ्य दें. फिर ‘ऊँ षष्ठीदेव्यै नमः’ मंत्र से अक्षतपुंज पर रोली, अक्षत, पुष्प आदि से षष्ठीदेवी की पूजा करें.

अक्षतपुंजो पर ही ‘ऊँ लक्ष्म्यै नमः’ से लक्ष्मीजी की, ‘ऊँ देवक्यै नमः’ से देवकी माता की, ऊँ यशोदायै नमः’ से यशोदा माता की ‘ऊँ वसुदेवाय नमः’ से वसुदेव की, ‘ऊँ श्रीकृष्णाय नमः’ से श्रीकृष्ण भगवान की पूजा करें.

वैदिक विधि

समय के अभाव में यथाशक्ति आप चाहें तो वैदिक विधि से भी विशेषतः जन्म के बाद जल से एवं पंचामृत से श्रीकृष्ण प्रतिमा को स्नान कराकर वस्त्र, अलंकार, चंदन, माल्य, धूप, दीप, नैवेद्य, आदि अर्पित कर पुष्पांजलि अर्पित कर सकते हैं. अंत में गुड़-मिश्रित घी से वसोर्धारा हवन विहित है. पश्चात् सुबह में भगवान सहित पूर्वपूजितों का संक्षिप्त पूजन कर प्रार्थना करें –

यं देवं देवकी देवी वसुदेवात् अजीजनत्।

भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै तस्मै ब्रह्मात्मने नमः।।

श्रीकृष्ण को पालने में सुप्रतिष्ठित कर अन्य आवाहितों को ‘स्वस्थानं गच्छ’ कह अक्षत छींटकर विदा करें. ब्राह्मण-भोजन कराएं व अन्नदान करें. पारण करें. श्रीकृष्ण के कथनानुसार, इस विधि से जन्मोत्सव मनाने से आरोग्य, आयुष्य, संतनसुख, राजसुख, अभिलषित सिद्धि एवं अकाल मृत्यु का निवारण होता है.

News posted by : Radheshyam kushwaha

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