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ब्रज से बनारस तक, देश के हर भाग में दिखती है अनोखी होली

Updated at : 02 Mar 2026 2:03 PM (IST)
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Holi 2026, Festival of Colors in India

भारत की अनोखी होली

Holi 2026: ब्रज की लट्ठमार होली, बनारस की होली और पंजाब का होला मोहल्ला—देशभर में होली के अलग रंग और परंपराएं इस पर्व को बनाती हैं यादगार.

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Holi 2026: फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली का त्योहार मनाया जाता है. इस दिन होलिका दहन होता है और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है. साल 2026 में होलिका दहन 2 मार्च को मनाया जाएगा और 4 मार्च को रंगों वाली होली खेली जाएगी. होली से आठ दिन पहले होलाष्टक शुरू हो जाते हैं. इस दौरान शुभ कार्य नहीं किए जाते. इस वर्ष होलाष्टक 24 फरवरी से शुरू होकर होलिका दहन के दिन समाप्त होंगे.

होली रंगों, खुशियों और मेल-मिलाप का त्योहार है. पूरे भारत में इसे बड़े उत्साह से मनाया जाता है. हालांकि हर राज्य और शहर में इसे मनाने का तरीका थोड़ा अलग होता है. कहीं गुलाल उड़ता है, कहीं फूलों से होली खेली जाती है, तो कहीं पानी और रंगों की बौछार होती है. आइए आसान शब्दों में जानें कि देश के अलग-अलग हिस्सों में होली कैसे मनाई जाती है.

ब्रज की लट्ठमार होली

उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र की होली दुनिया भर में प्रसिद्ध है. इसमें बरसाना और नंदगांव की लट्ठमार होली खास मानी जाती है. मान्यता है कि यह परंपरा भगवान कृष्ण और राधा से जुड़ी है. बरसाना में महिलाएं लाठियों से पुरुषों को प्रतीकात्मक रूप से मारती हैं और पुरुष ढाल से बचाव करते हैं. अगर कोई पुरुष पकड़ लिया जाता है तो उसे महिलाओं की तरह सजाकर नचाया जाता है. चारों ओर होली के गीत गूंजते रहते हैं. यह उत्सव कई दिनों तक चलता है और देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं.

पटना का फगुआ

बिहार की राजधानी पटना में होली को ‘फगुआ’ कहा जाता है. यहां भोजपुरी गीतों की धूम रहती है. लोग रंगों के साथ-साथ कीचड़ से भी होली खेलते हैं. भांग पीकर लोकगीतों और फिल्मी गानों पर नाचते हैं. यहां भी कपड़ा फाड़ होली का चलन देखने को मिलता है.

कोलकाता का डोल जत्रा

पश्चिम बंगाल में होली को ‘डोल पूर्णिमा’ या ‘डोल जत्रा’ कहा जाता है. कोलकाता में इस दिन राधा-कृष्ण की शोभायात्रा निकाली जाती है. भगवान की मूर्ति को झूले पर बैठाकर रंग लगाया जाता है. इसे डोलोत्सव भी कहा जाता है. रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन में होली खास अंदाज़ में मनाई जाती है. यहां छात्र केसरिया कपड़े पहनते हैं, नृत्य और संगीत प्रस्तुत करते हैं और फिर अबीर-गुलाल से होली खेलते हैं. इसे ‘बसंत उत्सव’ भी कहा जाता है.

आनंदपुर साहिब का होला मोहल्ला

पंजाब में होली के अगले दिन आनंदपुर साहिब में ‘होला मोहल्ला’ मनाया जाता है. यह एक खास उत्सव है जिसकी शुरुआत बहादुरी और शौर्य दिखाने के लिए हुई थी. इसमें तलवारबाजी, घुड़सवारी और युद्ध कला के प्रदर्शन होते हैं. यह उत्सव तीन दिनों तक चलता है. पहले इसमें केवल पुरुष भाग लेते थे, लेकिन अब महिलाएं भी शामिल होती हैं. पंजाब में होली को गिले-शिकवे भूलकर मेल-मिलाप का पर्व माना जाता है.

दक्षिण भारत की होली

दक्षिण भारत में होली उत्तर भारत जितनी बड़ी नहीं होती, लेकिन वहां भी इसे अलग तरीके से मनाया जाता है. कई जगह इसे कामदेव की कथा से जोड़ा जाता है. तमिलनाडु में इसे ‘कामदहनम’ कहा जाता है. केरल में मलयाली लोग होली कम मनाते हैं, लेकिन वहां रहने वाले तमिल समुदाय के लोग इसे ‘मंगलकुली’ नाम से मनाते हैं. हैदराबाद में भी दो दिन तक होली का उत्सव चलता है.

नंदूरबार की राजवाड़ी होली

महाराष्ट्र के नंदूरबार जिले के काठी गांव में आदिवासी समाज ‘राजवाड़ी होली’ मनाता है. इस परंपरा की शुरुआत 1246 में राजा उमेद सिंह के समय से मानी जाती है. महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी लोग यहां इकट्ठा होते हैं. सभी पारंपरिक कपड़े पहनकर लोक संगीत पर नाचते-गाते हैं. यह परंपरा लगभग 770 साल पुरानी है.

इंदौर और मध्य प्रदेश की होली

मध्य प्रदेश के इंदौर में ‘गेर’ निकालने की परंपरा है. गेर एक बड़ी सामूहिक शोभायात्रा होती है, जिसमें लोग ट्रकों और बड़े वाहनों में बैठकर रंग खेलते हुए निकलते हैं. पूरा शहर रंगों में डूब जाता है. पश्चिम निमाड़ क्षेत्र में आदिवासी समाज ‘भगोरिया’ नाम का उत्सव मनाता है. इसमें युवक-युवतियां सज-धजकर बाजार में आते हैं और अपना जीवनसाथी चुनते हैं.

जबलपुर के पास कटनी में होलिका दहन के बाद सूतक माना जाता है. कुछ लोग इस दिन बाल कटवाते हैं और घर की साफ-सफाई करते हैं, फिर होली खेलते हैं. मालवा क्षेत्र में कहीं-कहीं लोग अंगारों के साथ भी होली खेलते हैं, जो एक अनोखी परंपरा है. यहां होली पर लड्डू, गुलाबजामुन, जलेबी, सेव और बेसन की मिठाइयां खूब बनती हैं. कुछ इलाकों में शक्कर से गहने बनाए जाते हैं, जैसे माला, कड़े और बालियां. इन्हें पहनकर ही होलिका की पूजा की जाती है.

अल्मोड़ा की संगीतमय होली

उत्तराखंड के अल्मोड़ा में होली संगीत के साथ मनाई जाती है. यहां दो प्रकार की होली होती है— बैठकी होली और खड़ी होली. बैठकी होली में लोग बैठकर शास्त्रीय और लोकगीत गाते हैं. खड़ी होली में लोग खड़े होकर नाचते-गाते हुए गुलाल लगाते हैं. यहां होली एक-दो दिन नहीं बल्कि कई दिनों तक चलती है. महिलाएं बारी-बारी से अपने घरों में कार्यक्रम रखती हैं. आलू के गुटके और भांग की चटनी यहां के खास पकवान हैं.

उदयपुर की शाही होली

राजस्थान के उदयपुर में होली शाही अंदाज में मनाई जाती है. राजमहल में होलिका दहन होता है. सजे हुए घोड़े और रथों की शोभायात्रा निकाली जाती है. लोकनृत्य और संगीत कार्यक्रम होते हैं. दूर-दूर से पर्यटक इसे देखने आते हैं. जयपुर में भी हाथियों को सजाकर उत्सव मनाया जाता है, जिसे आज ‘एलिफेंट फेस्टिवल’ के नाम से जाना जाता है.

ये भी पढ़ें: ग्रहण की उलझन के बीच झारखंड में होलिका दहन और होली की अनोखी परंपराएं

इस तरह होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भारत की विविधता का उत्सव है. हर राज्य और शहर की अपनी खास परंपरा है, जो इस पर्व को और भी खास बनाती है. कहीं शौर्य दिखाया जाता है, कहीं संगीत गूंजता है, तो कहीं प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया जाता है. अलग-अलग तरीकों के बावजूद एक बात सबमें समान है—खुशी, अपनापन और एक-दूसरे के साथ जश्न मनाने का उत्साह. यही होली की असली पहचान है.

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Shaurya Punj

लेखक के बारे में

By Shaurya Punj

मैंने डिजिटल मीडिया में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव हासिल किया है. पिछले 6 वर्षों से मैं विशेष रूप से धर्म और ज्योतिष विषयों पर सक्रिय रूप से लेखन कर रहा हूं. ये मेरे प्रमुख विषय हैं और इन्हीं पर किया गया काम मेरी पहचान बन चुका है. हस्तरेखा शास्त्र, राशियों के स्वभाव और उनके गुणों से जुड़ी सामग्री तैयार करने में मेरी निरंतर भागीदारी रही है. रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद. इसके साथ साथ कंटेंट राइटिंग और मीडिया से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए मेरी मजबूत पकड़ बनी. इसके अलावा, एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और शिक्षा जैसे विषयों पर भी मैंने गहराई से लेखन किया है, जिससे मेरी लेखन शैली संतुलित, भरोसेमंद और पाठक-केंद्रित बनी है.

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