हजारीबाग में 1918 से शुरू रामनवमी जुलूस की ऐतिहासिक परंपरा

हजारीबाग रामनवमी जुलूस का इतिहास है काफी दिलचस्प
Hazaribagh Ram Navami Julus: हजारीबाग में रामनवमी जुलूस की शुरुआत 1918 में गुरु सहाय ठाकुर ने की थी. पांच मित्रों के साथ निकला पहला महावीरी झंडा जुलूस आज झारखंड की बड़ी धार्मिक परंपरा बन चुका है.
गुरु सहाय ठाकुर ने निकाला था पहला जुलूस
Hazaribagh Ram Navami Julus: हजारीबाग में रामनवमी जुलूस का इतिहास वर्ष 1918 से जुड़ा हुआ है. उस समय जेपीएम मार्ग निवासी गुरु सहाय ठाकुर ने अपने पांच मित्रों के साथ मिलकर भगवान राम के जन्मदिन चैत्र नवमी के अवसर पर पहला महावीरी जुलूस निकाला था.
गुरु सहाय ठाकुर ने हाथ में महावीरी झंडा लेकर बाजे-गाजे के साथ नगर के विभिन्न मंदिरों की परिक्रमा की और इस जुलूस का समापन किया. उस समय यह एक छोटा धार्मिक आयोजन था, लेकिन धीरे-धीरे यह परंपरा बढ़ती गई और आगे चलकर भव्य रामनवमी जुलूस का रूप ले लिया.
धीरे-धीरे बढ़ती गई परंपरा
समय के साथ इस जुलूस में लोगों की भागीदारी लगातार बढ़ती गई. शुरुआत में जहां कुछ लोग ही शामिल होते थे, वहीं बाद में सैकड़ों महावीरी झंडे इस जुलूस का हिस्सा बनने लगे.
बाद के वर्षों में राधा कृष्ण मंदिर का महावीरी झंडा भी इस जुलूस में शामिल किया गया. इससे जुलूस की भव्यता और लोकप्रियता दोनों बढ़ती गईं. धीरे-धीरे यह आयोजन पूरे शहर की धार्मिक पहचान बन गया.
समाज में जागरूकता लाना था उद्देश्य
गुरु सहाय ठाकुर का उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन करना नहीं था, बल्कि वे समाज में एकता और जागरूकता लाना चाहते थे.
ब्रिटिश शासन काल के दौरान ईसाई धर्म प्रचार के कारण कई हिंदू परिवारों के धर्म परिवर्तन की घटनाएं सामने आ रही थीं. ऐसे समय में गुरु सहाय ठाकुर ने महावीरी झंडा जुलूस के माध्यम से भगवान राम की भक्ति का संदेश फैलाने और हिंदू समाज को संगठित करने का प्रयास किया. उन्होंने लोगों से घर-घर में रामचरितमानस रखने और धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने की भी अपील की थी.
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मंगला जुलूस की शुरुआत
रामनवमी जुलूस की बढ़ती लोकप्रियता के बाद लगभग 37 साल बाद मंगला जुलूस की परंपरा शुरू हुई. इसका मुख्य उद्देश्य रामनवमी के भव्य जुलूस की तैयारी करना था.
रामनवमी से पहले हर मंगलवार को निकलने वाले इन जुलूसों में अखाड़े शस्त्र संचालन का अभ्यास करते हैं और विभिन्न मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं. यह परंपरा आज भी हजारीबाग के साथ-साथ झारखंड के कई शहरों में उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है.
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By Shaurya Punj
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