Chaurchan Vrat 2024: चित्रा नक्षत्र व शुक्ल योग के सुयोग में आज है चौठचंद्र व्रत

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Chaurchan Vrat 2024: चित्रा नक्षत्र व शुक्ल योग के सुयोग में आज है चौठचंद्र व्रत

Chaurchan Vrat 2024: चौरचन पूजा आज 06 सितंबर दिन शुक्रवार को मनाई जा रही है. इस दिन भगवान गणेश और चंद्र देव की पूजा होती है.

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Chaurchan Vrat 2024: बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में चौठचंद्र की पूजा विशेष रूप से धूमधाम से मनाई जाती है. इस पर्व पर श्रद्धालु चंद्रदेव की पूजा कर उन्हें नाना प्रकार के पकवानों का भोग अर्पित करते हैं और जीवन में शीतलता व आरोग्यता का वरदान मांगते हैं. इस अवसर पर चंद्रदेव को अर्पित किए जाने वाले प्रसाद को मिथिलावासियों द्वारा पूरी निष्ठा और पवित्रता के साथ तैयार किया जाता है. सूर्यास्त के बाद, चंद्रमा के दर्शन के साथ घरों के आंगन या छतों पर कच्चे चावल से बने अरिपन (अल्पना) बनाकर पूजा की जाती है. अरिपन पर केले के पत्ते रखकर पूजा सामग्री सजाई जाती है और गणेश जी तथा चंद्रदेव की विधिपूर्वक पूजा की जाती है.

इस दिन चंद्रमा की पूजा और अर्घ्य देने से मनोविकारों से मुक्ति, आरोग्यता, ऐश्वर्य, और संतान की दीर्घायु का वरदान प्राप्त होता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, चौठचंद्र के दिन चंद्रमा के दर्शन से अपयश और कलंक का दोष लगता है, जिसे गणेश भगवान ने श्रापमुक्त कर शीतलता और सौंदर्य का वरदान दिया था.

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रवियोग के सुयोग में आज मनाया जा रहा चौठचंद्र व्रत

मिथिलांचल का प्रसिद्ध पर्व चौठचंद्र (चौरचन) व्रत इस वर्ष आज 6 सितंबर को भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन मनाया जा रहा है. यह व्रत चित्रा नक्षत्र, शुक्ल योग और रवियोग के विशेष संयोग में संपन्न होगा. इस दिन शुक्रवार होने और तुला लग्न के कारण इसकी महत्ता और अधिक बढ़ गई है. ऐसे उत्तम संयोग में चंद्रदेव की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जा रही है. श्रद्धालु संध्या बेला में संतान की दीर्घायु, आरोग्यता और निष्कलंकता की कामना करते हुए ऋतुफल, दही और पकवान हाथ में लेकर चंद्रमा का दर्शन करेंगे.

पंचौरचन पर्व: पारंपरिक पकवान और पूजा विधि

चौठचंद्र पर्व पर कई प्रकार के पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है, जिनमें खीर, पूड़ी, गुझिया, खाजा-लड्डू के साथ केला, सेब, खीरा, शरीफा, संतरा जैसे फल शामिल होते हैं. इसके अलावा, मिट्टी के नए बर्तन में जमाया गया दही भी विशेष रूप से अर्पित किया जाता है. इस अवसर पर घर की बुजुर्ग स्त्रियां या व्रती महिलाएं पूरे दिन उपवास रखती हैं. संध्या काल में चंद्रोदय के बाद वे पुनः स्नान कर नूतन वस्त्र धारण करती हैं और बांस के डाले में सभी पूजन सामग्री रखकर शिवपुत्र गणेश और चंद्रदेव की पूजा करती हैं. इसके बाद परिवार के अन्य सदस्य भी चंद्रमा का दर्शन कर उन्हें प्रणाम निवेदित करते हैं.

यह पर्व मनुष्य और प्रकृति के बीच प्रेमभाव और सामंजस्य का प्रतीक माना जाता है, जो परिवार और समाज में आपसी सौहार्द्र को बढ़ावा देता है.

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ज्योतिषाचार्य संजीत कुमार मिश्रा
ज्योतिष वास्तु एवं रत्न विशेषज्ञ
8080426594/9545290847

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शौर्य पुंज

लेखक के बारे में

By शौर्य पुंज

मैं धर्म, ज्योतिष और आध्यात्मिक विषयों पर लेखन में विशेषज्ञता रखता हूं. हस्तरेखा शास्त्र, राशिफल, ग्रह-नक्षत्र, धार्मिक परंपराओं और पौराणिक कथाओं से जुड़े विषयों पर मेरी विशेष रुचि और गहरी समझ है. रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया और कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव हासिल किया है. धर्म और ज्योतिष के अलावा एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और शिक्षा जैसे विषयों पर भी लगातार लेखन करता रहा हूं. मेरी कोशिश रहती है कि जटिल विषयों को आसान, रोचक और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाया जाए.

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