श्वसन-प्रक्रिया का महत्व

Published at :22 Aug 2016 6:35 AM (IST)
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श्वसन-प्रक्रिया का महत्व

कोई भी प्राणायाम सीखने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि हमारी श्वसन क्रिया कैसे कार्य करती है. हम जो श्वसन करते हैं, यानी सांस लेते हैं, वह हम तीन तरह से कर सकते हैं. एक है उदर श्वसन. गहरी श्वास जो पेट तक जाती है, इससे हमारे फेफड़ों में अधिक-से-अधिक वायु भर जाती है, […]

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कोई भी प्राणायाम सीखने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि हमारी श्वसन क्रिया कैसे कार्य करती है. हम जो श्वसन करते हैं, यानी सांस लेते हैं, वह हम तीन तरह से कर सकते हैं.

एक है उदर श्वसन. गहरी श्वास जो पेट तक जाती है, इससे हमारे फेफड़ों में अधिक-से-अधिक वायु भर जाती है, जिसके परिणामस्वरूप हमारे शरीर में अधिक मात्रा में प्राणवायु ली जाती है. हमारे फेफड़ों के नीचे फेफड़ों और पेट को एक-दूसरे से अलग करनेवाली एक चपटी मांसपेशी होती है, इसे डायफ्राम कहते हैं. साधारण श्वसन में यह डायफ्राम छाती की तरफ एक डोम का आकार लिये हुए है. विशेष रूप से गहरी श्वास लेने पर इस पर दबाव पड़ता है और यह सीधा होकर नीचे खिसक जाता है. इसके कारण पेट के अंगों पर दबाव पड़ता है और पेट बाहर की तरफ फैल जाता है. इसी को हम उदर श्वसन कह सकते हैं.

श्वसन का दूसरा प्रकार है मध्यम श्वसन. जो हमारी साधारण श्वास होती है, वह असल में पेट तक जानी चाहिए. लेकिन आम मनुष्य की जो जीवन शैली आज बन गयी है, उसके अनुसार उसकी श्वास सिर्फ छाती तक ही जाती है. ऐसे श्वसन में मनुष्य केवल आधा लीटर वायु फेफड़ों में लेता है, जो कि फेफड़ों की क्षमता का केवल आठवां हिस्सा ही है.

हमारे फेफड़े चार लीटर वायु अपने में भर लेने की क्षमता रखते हैं. मध्यम श्वसन के कारण जितनी प्राणवायु शरीर को मिलनी चाहिए, उससे बहुत ही कम प्राणवायु हम अपने शरीर को दे पाते हैं. श्वसन का तीसरा प्रकार है सिर्फ गले तक ही श्वास लेना. जिनके फेफड़े बहुत ही कमजोर होते हैं, उनकी श्वास बहुत ही छिछली हो जाती है.

उनके फेफड़े आधा लीटर वायु भी भीतर नहीं ले पाते. श्वसन के इन तीनों प्रकारों को हम अभ्यास के रूप में एक-साथ भी कर सकते हैं. इसी को संपूर्ण श्वसन या यौगिक श्वसन कहा जाता है. इस श्वसन को वास्तव में हमें अपनी स्वाभाविक श्वसन-प्रक्रिया में रूपांतरित करना चाहिए. उसके लिए रोज नियमित रूप से थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुछ मिनटों के लिए इसका अभ्यास करना हमारे लिए अनिवार्य है. प्राणायाम के लिए हमें गहरी और धीमी श्वास लेनी होती है.

-आनंदमूर्ति गुरु मां

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