जीवन जीने की अनूठी कला

Published at :03 Jun 2016 2:15 PM (IST)
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जीवन जीने की अनूठी कला

गुजरात-महाराष्ट्र से लौट कर हरिवंश सोम भाई की दस्तक से नींद खुलती हैं. वह चाय लेकर खड़े हैं. संकोच होता है. पर उनके अतिथि सत्कार से ‘स्वाध्याय’ की झलक मिलती है.स्वाध्यायों से हुई बातचीत से समझ पाया हूं कि यह कोई पंथ नहीं, दर्शन नहीं, शास्त्र नहीं, विचारधारा नहीं, जीवन जीने का व्याकरण है. संस्कारों […]

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गुजरात-महाराष्ट्र से लौट कर हरिवंश

सोम भाई की दस्तक से नींद खुलती हैं. वह चाय लेकर खड़े हैं. संकोच होता है. पर उनके अतिथि सत्कार से ‘स्वाध्याय’ की झलक मिलती है.स्वाध्यायों से हुई बातचीत से समझ पाया हूं कि यह कोई पंथ नहीं, दर्शन नहीं, शास्त्र नहीं, विचारधारा नहीं, जीवन जीने का व्याकरण है. संस्कारों को मांजने की पद्धति है. बड़ा, छोटा, अहं, ऊंच-नीच को तराशने का औजार है. विनम्रता, सादगी और प्रभु की दुनिया में सबके समान होने का भाव पैदा करनेवाला है. यह हर इंसान को अंदर (आत्मा-मन जो भी कहें) से दरस-परस कराने का मंच है.

जीवन कला है. समाज के सबसे तजे हुए या परित्यक्त लोगों के अंदर आशा और आत्मविश्वास जगानेवाला है. स्वाध्यायी होने से मन बदलता है. अंदरूनी ताकत यानी आत्मबल बढ़ता है. यह बदलाव बाहरी तत्वों या आर्थिक-सामाजिक कारणों से घटित नहीं होता. यह सरकारी या स्वैच्छिक संस्थाओं के अनुदान-राहत का प्रतिफल नहीं है. यह सोच बदलने का मंच है. अपनी ताकत और क्षमता को एहसास कराने की कला. अपने को कमजोर, असहाय और अकेला मानने के बोध से निकलने की विधा. ‘प्रेरित करनेवाला’.

बाद में विनम्रता की प्रतिमूर्ति, वरिष्ठ समाज वैज्ञानिक तथा इतिहासविद् एवं आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक प्रो गोपाल कृष्ण कहते हैं. स्वाध्याय, प्रवाह है, आत्मशक्ति है. ‘सेंटर फार द स्टडी आफॅ डेवलपिंग सोसायटीज’ के संस्थापक व जयप्रकाश जी के घनिष्ठ सहयोगी रहे प्रो गोपाल कृष्ण एक उद्धरण सुनाते हैं, दादा का,

हम धनवानों और निर्धनों के बीच की खाई को पाटने का प्रयत्न कर रहे हैं, हम स्त्रियों को उनकी शक्ति के प्रति सजग बना रहे हैं. उनमें आत्मचेतना भर रहे हैं, किंतु हम स्त्री उद्धारक नहीं हैं. हम शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परिवर्तन लाना चाहते हैं. और इस उद्देश्य से पाठशालाएं चला रहे हैं. किंतु हम शिक्षाविद् नहीं हैं. हम धार्मिक रूढि़वाद को प्रोत्साहन नहीं देते. सक्रिय राजनीति में हमारी रूचि नहीं है. हम दलितों को ईश्वर की संतान मानते हैं. और उनके कल्याण के निमित्त कार्य करते हैं. किंतु हम सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं. स्वाध्याय परिवार प्राचीन मनीषियों की दैवीय शिक्षाओं के अनुसार कार्य करता है.

फिर भी साथी कहते हैं कि ‘स्वयं पूछ परछ’ (सेल्फ कंफ्रटेशन) के आधार पर स्वाध्याय को परखें. ‘चिले चालू’ (परंपरा) से नहीं अपनी बुद्धि प्रामाणिक मान कर. इसी के तहत स्वाध्याय का एक काम ‘श्री दर्शनम’ देखने हम जाते हैं. स्वाध्याय के विभिन्न प्रकल्प-प्रयोग हैं. मसलन, योगेश्वर कृषि, श्री दर्शनम, वृक्ष मंदिर, घर मंदिर, लोकनाथ अमृतालयम, मत्स्यगंधा, माधव वृंद, पतंजलि चिकित्सालय, भूगर्भ जल संचय, निर्मल नीर, हीरा मंदिर, गोरस वगैरह.

काम करने की रीति है. इनके बड़े चुनिंदे और सारगर्भित नाम हैं. हर नाम में एक परंपरा बोध और भाव निहित है. भावफेरी, तीर्थयात्रा, एकादशी, भक्तिफेरी, कृतज्ञता जैसे नाम खींचते हैं. ऐसे स्वाध्याय के प्रवाह को दूर-दूर तक फैलाव के उपकरण हैं. कार्यक्रम हैं. कृतज्ञता बोध, वह भी इस उपभोक्तावादी दौर में! एक देहाती स्वाध्याय से पूछ बैठता हूं. उसका उत्तर जड़ बना देता है. वह कहता है. ‘इस संसार’ में हम दूसरों की कृतज्ञता से ठहरे हैं. मां-बाप का उपकार है. मां-बाप से आगे जो हमारा खून बना रहा हैं, स्मृति दे रहा है, उस भगवान के प्रति. कुछ भी खायें, एक ही लाल रंग का खून कैसे बनता है? यह खून बनानेवाला कौन है? क्या इसके प्रति हमारी कृतज्ञता नहीं है?

एक मामूली देहाती स्वाध्यायी की यह असाधारण बात, मेरे शहरी मानस (जो कृतघ्न है) पर चोट थी. आज कहां हम किसी के प्रति कृतज्ञ या वफादार रह गये हैं? व्यापक संदर्भों में ॠण चुकाने का प्रतिदान कहां है? धरती, प्रकृति, मानवीय रिश्तों और समाज से सिर्फ लेने, नोचने और लूटनेवाला शहरी मानस, ‘स्वाध्याय’ का यह मर्म शायद ही समझे. यह भारतीय परंपरा, मनीषा और ॠषियों के उदात्त सोच का प्रतिफल है. ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के मानस की देन है.

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