व्यवहारपटुता का अर्थ

Published at :13 May 2016 6:05 AM (IST)
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व्यवहारपटुता का अर्थ

हिल-मिल कर रहने की कला को समुन्नत करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के स्वभाव में कोमलता का आना अनिवार्य है. जिस तरह रबर लचीला होता है, उसी तरह व्यक्ति का स्वभाव भी लचीला होना चाहिए, ताकि आवश्यकतानुसार जैसे चाहें वैसे उसे मोड़ा जा सके. व्यवहारपटुता के लिए अधिक ज्ञान का अर्जन करना आवश्यक नहीं. यदि […]

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हिल-मिल कर रहने की कला को समुन्नत करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के स्वभाव में कोमलता का आना अनिवार्य है. जिस तरह रबर लचीला होता है, उसी तरह व्यक्ति का स्वभाव भी लचीला होना चाहिए, ताकि आवश्यकतानुसार जैसे चाहें वैसे उसे मोड़ा जा सके. व्यवहारपटुता के लिए अधिक ज्ञान का अर्जन करना आवश्यक नहीं.
यदि कार्यालय का कर्मचारी अपने अधिकारी की मनोवृत्ति का अध्ययन कर, तदनुकूल व्यवहार कर पाता है, तो अधिकारी की उसके प्रति सहानुभूति रहती है. इसके लिए उसे उचित शब्दों का चुनाव करना होगा. धीरे बोल कर, मृदु भाषण का उपयोग कर, अधिकारी की आज्ञा का पालन कर, उसकी बातों की उपेक्षा या विरोध न कर वह अपने अधिकारी को प्रसन्न कर सकता है.
यह कठिन अभ्यास नहीं है. हां, इतना जरूर है कि कर्मचारी को अपने स्वभाव में पूर्वोक्त लचक लानी होगी. मृदु वचनों का उपयोग करने से यह संसार अपने वश में किया जा सकता है. ऐसा करने में आपकी फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं होती और न ही कुछ नुकसान होता है, बल्कि आपका अध्यक्ष, आपका पति, आपकी पत्नी, आपका ग्राहक और आपके मित्र आपके दास बन जाते हैं. उनके दिलों में अापके प्रति एक हार्दिक भावना बनी रहती है.
आप उनके अपने हो सकते हैं. आपके लिए वे सब कुछ करने को तैयार हो जाते हैं. यदि आपसे कुछ गलती भी हो जाये, तो वे उसको अनदेखा कर देते हैं. हिल-मिल कर रहने के लिए नम्रता और आज्ञाकारिता आवश्यक गुण हैं. अहंकार और गर्व से उन्मत्त व्यक्ति हिल-मिल कर रह भी कैसे सकता है? परिणाम यह होता है कि वह अपने को सदा संकट से घिरा हुआ पाता है.
प्रत्येक कार्य में उसे सफलता ही मिलती है. व्यवहारपटुता के मार्ग में अहंकार और गर्व दो बड़े अवरोध हैं. एक ही कमरे में रहनेवाले दो विद्यार्थी एक-दूसरे से हिल-मिल कर रहना नहीं जानते और आपसी कलह का सूत्रपात करते हैं. फल यह होता है कि मित्रता टूट जाती है. यदि हिल-मिल कर रहा जाये, तो मित्रता को लंबे समय तक निभाया जा सकता है. छोटी-छोटी बातों पर लड़ना-झगड़ना व्यवहारपटु व्यक्ति के लक्षण नहीं हैं.
– स्वामी शिवानंद सरस्वती
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