घर का अर्थ है सहजता
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :05 May 2016 6:17 AM (IST)
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अगर हम किसी जगह को घर कहते हैं, तो उसके पीछे का भाव एक ऐसी जगह से होता है, जहां आप अपने मूल रूप में रह सकें, जहां आप निश्चिंत होकर सहज रूप से रह सकें, जहां आप वह सब कर सकें, जो आपके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रिय हो. मैं अक्सर लोगों को […]
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अगर हम किसी जगह को घर कहते हैं, तो उसके पीछे का भाव एक ऐसी जगह से होता है, जहां आप अपने मूल रूप में रह सकें, जहां आप निश्चिंत होकर सहज रूप से रह सकें, जहां आप वह सब कर सकें, जो आपके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रिय हो. मैं अक्सर लोगों को शिकायत करते सुनता हूं कि, ‘मेरे जीवन में जो मेरे लिए सबसे ज्यादा अहम होता है, मैं जब घर आता हूं, तो सब खत्म हो जाता है.’
मुझे लगता है कि हमें अपना घर थोड़े अलग तरीके से तैयार करने के बारे में सोचना चाहिए. हमारा घर कैसा हो, इस बारे में हमारी सोच हमारे पड़ोसियों के घर को देख कर तय होती है. यही वजह है कि घर हमारे लिए एक चुनौती बन चुका है.
मुझे समझ में नहीं आता कि घर किसी के लिए बाधा क्यों होगा? घर तो सर्वश्रेष्ठ जगह होनी चाहिए. ज्ञान प्राप्ति को घर वापसी भी कहा गया है. ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि आपका घर हमेशा सत्य के साथ जुड़ा रहे? लेकिन अब आपका घर चिंता का एक विषय हो गया है, क्योंकि घर की कुछ महत्वाकांक्षाएं हो गयी हैं.
लेकिन घर में ऐसा होना नहीं चाहिए. आपके ऑफिस में लक्ष्य होने चाहिए, सड़क पर हमारे लक्ष्य हो सकते हैं, हमें रेस दौड़नी पड़ सकती है. लेकिन एक बार जब घर आप जायें, तो फिर आपके सामने ऐसा कोई लक्ष्य नहीं होना चाहिए. अगर घर में आपका निहित स्वार्थ होगा, तब आप घर की सोच को ही नष्ट कर देंगे. तब ‘घर क्यों चाहिए’ का मकसद ही कहीं खो जायेगा, क्योंकि वहां भी अगर आप अपने लक्ष्य से संचालित हो रहे हैं, तो वह वास्तव में घर नहीं होगा. तो अगर इन सारी चिंताओं और सरोकारों को हम परे रख सकेंगे, तभी आप घर पर रह सकेंगे. जब हम कहते हैं कि ‘आप घर पर हैं’, तो ऐसा कहने का मतलब क्या है? आप आरामदायक स्थिति में हैं, आप अपने स्वाभाविक रूप में हैं.
तो सच के साथ रहने का यही तरीका है. दरअसल, हमारा शरीर किस तरह का है, इसकी वजह से समाज में हमारी एक पहचान बन गयी है. लेकिन आपके भीतर जो यह जीवन है, उसके लिए ये सारी चीजें कोई मायने नहीं रखतीं. अगर हमारा यह जीवन सत्य के साथ लयबद्ध हो गया, तो यह बहुत सहज हो उठेगा.
-सद्गुरु जग्गी वासुदेव
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