वासंतिक नवरात्र तीसरा दिन : चंद्रघंटा दुर्गा का ध्यान

Published at :10 Apr 2016 6:27 AM (IST)
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वासंतिक नवरात्र तीसरा दिन : चंद्रघंटा दुर्गा का ध्यान

अंडज प्रवरारूढा, चंडकोपार्भटीयुता । प्रसादं तनुतां महां चंडखंडेति विश्रुता ।। जो पक्षिप्रवर गरुड़ पर आरूढ़ होती हैं, उग्र कोप और रौद्रता से युक्त रहती हैं तथा चंद्रघंटा नाम से विख्यात हैं, वह दुर्गा देवी मेरे लिए कृपा का विस्तार करें. त्रिशक्ति के स्वरूप-3 भगवान श्री विष्णु को पालनरूपी काम करना है़ उसे करनेवाली महालक्ष्मीरूपी विष्णु-शक्ति […]

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अंडज प्रवरारूढा, चंडकोपार्भटीयुता ।

प्रसादं तनुतां महां चंडखंडेति विश्रुता ।।

जो पक्षिप्रवर गरुड़ पर आरूढ़ होती हैं, उग्र कोप और रौद्रता से युक्त रहती हैं तथा चंद्रघंटा नाम से विख्यात हैं, वह दुर्गा देवी मेरे लिए कृपा का विस्तार करें.

त्रिशक्ति के स्वरूप-3

भगवान श्री विष्णु को पालनरूपी काम करना है़ उसे करनेवाली महालक्ष्मीरूपी विष्णु-शक्ति अपने पालनात्मक कार्य के अनुरूप स्वर्णवर्ण की होती हैं,परंतु वह पालन का काम केवल पालन करके छोड़ देने के लिए नहीं, इसके साथ-साथ पोषण और वर्धन करने के उद्देश्य से किया जाता है. इसलिए महालक्ष्मी पालन का काम करके पोषण और वर्धन अर्थात् नयी वस्तुओं को उत्पन्न करने का काम ब्रह्माजी के हाथ में सौंपते हैं.

ब्रह्मा को जो नयी वस्तुओं का आविष्कार या सृष्टिरूपी काम करना है, उसे करानेवाली महासरस्वतीरूपी ब्रह्मशक्ति अपने सृष्टात्मक कार्य के अनुरूप श्वेतरंग की होती हैं.

अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरूषात्मकं जगत्। शून्यं चाशून्यं च ।

इस वचन के अनुसार भगवती को निखिल विश्वोत्पादक ब्रह्म ही स्वीकार किया गया है. दूसरी बात यह है कि दार्शनिक दृष्टि से प्रणव का जो अर्थ है, वही ह्लीं का अर्थ है. स्थूल विश्वप्रपंच के अभिमानी चैतन्य को वैश्र्वानर कहते हैं, अर्थात् समस्त प्राणियों के स्थूल विषयों का जो उपभोग करता है. इसी जाग्रत-स्थान वैश्र्वानर को प्रणव की प्रथम मात्रा अकार समझना चाहिए. अर्थात् समस्त वाड्मय, चार वेद, अठारह पुराण, सत्ताईस स्मृति, छः दर्शन आदि प्रणव की एकमात्रा अकार का अर्थ है -अकारो वै सर्वा वाक् (श्रुति) अर्थात समस्त वाणी अकार ही है. स्वप्नप्रपंच का अभिमानी चैतन्य को तैजस कहलाता है. अर्थात् वासनामात्रा का स्वप्न में उपभोग करता है. यह तैजस ही प्रणव की द्वितीया मात्रा उकार है.अर्थात् अकार-मात्रा की अपेक्षा उकार-मात्रा श्रेष्ठ है.

सुषुप्ति-प्रपंच के अभिमानी चैतन्य को प्राज्ञ कहते हैं अर्थात् वह सौषुप्तिक सुख के आनंद का अनुभव करता है. यही प्राज्ञ प्रणव की तीसरी मात्रा मकार है, जो अदृश्य-अव्यत्रहार्य-अग्राह्य-अलक्षण-अचिन्त्य तत्व इन मात्राओं से परे हैं अर्थात् अद्वैत शिव ही प्रणव हैं. वही आत्मा हैं.

अब ह्लीं कार का विचार करें. जो शास्त्र में प्रणव की व्याख्या है, वही ह्लींकार की व्याख्या है. ह्लींकार में जो हकार है, वही स्थूल देह है, रकार सूक्ष्मदेह और ईकार कारण-शरीर है. हकार ही विश्व है, रकार तैजस और ईकार प्राज्ञ है.जैसा कि कहा है-

नमः प्रणवरूपायै नमः नमो ह्लींकारमूर्तये।

हकारः स्थूलदेहः स्याद्रकारः सूक्ष्मदेहकः।

ईकारः कारणात्मासौ ह्लींकारश्र्च तुरीयकम्।।

कुछ लोग भगवती दुर्गा का स्वरूप कयिक, जड़ या अनिर्वचनीय स्वीकार करते हैं, लेकिन यह भ्रांत धारणा है़ भगवती ब्रह्म ही है. अतः भगवती का शरीर अप्राकृतिक, अभौतिक, अलौकिक सच्चिदानन्दस्वरूप ही है.

(क्रमशः) प्रस्तुतिः डॉ एनके बेरा

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