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300वें वर्ष में प्रवेश करेगा खाटू का वर्तमान मंदिर

Updated at : 22 Feb 2020 9:03 AM (IST)
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300वें वर्ष में प्रवेश करेगा खाटू का वर्तमान मंदिर

सुरेश चंद्र पोद्दार कलयुग अवतारी श्री श्याम प्रभु का पावन खाटू धाम राजस्थान के सीकर जिले में है. राजस्थान की भूमि मरुधरा या मरुभूमि के नाम से प्रसिद्ध है. वाल्मीकि रामायण के युद्ध-कांड के इक्कीसवें एवं बाइसवें सर्ग में वर्णित कथानुसार, श्रीराम लंका विजय हेतु मार्ग देने के आग्रह के लिए महासागर के पास पहुंचे […]

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सुरेश चंद्र पोद्दार

कलयुग अवतारी श्री श्याम प्रभु का पावन खाटू धाम राजस्थान के सीकर जिले में है. राजस्थान की भूमि मरुधरा या मरुभूमि के नाम से प्रसिद्ध है. वाल्मीकि रामायण के युद्ध-कांड के इक्कीसवें एवं बाइसवें सर्ग में वर्णित कथानुसार, श्रीराम लंका विजय हेतु मार्ग देने के आग्रह के लिए महासागर के पास पहुंचे और अपने विनय का कोई प्रभाव नहीं होते देख क्रोधित हो उठे.

उन्होंने बाण को ब्रह्मास्त्र से अभिमंत्रित कर धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा ली. तब सागर ने सशरीर प्रकट हो श्रीराम को सागर पार करने की विधि बतायी, लेकिन प्रत्यंचा पर चढ़ा बाण वापस नहीं किया जा सकता था. इसलिए श्रीराम ने जो बाण अंतरिक्ष में छोड़ दिया, वह जिस दुर्गम स्थल पर गिरा, वह ‘मरुकांतर’ कहलाया. बाद में इसे मरुभूमि के नाम से जाना जाने लगा. श्रीराम ने मरुभूमि को वरदान दिया कि यह भूमि लोक-कल्याण के अभीष्ट होगी. यहां की मिट्टी का रंग स्वर्णिम होगा. यह भूमि दुग्ध स्थल के रूप में विख्यात होगी. वीर-रत्नगर्भा इस भूमि पर देवता वास करेंगे और कलयुग के देव अवतारी भूमि होगी.

इसी मरुभूमि पर श्री श्याम प्रभु का पावन खाटू धाम है, जो जयपुर शहर से लगभग 70 किमी की दूरी पर स्थित है. 342 वर्ष पुरानी हस्तलिखित ‘श्याम पचीसी’, और ‘औरंगजेबनामा’ जैसे ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि प्राचीन काल में खटवांग नाम के राजा ने अपने शासनकाल में यह गांव बसाया, जो आज खाटू के नाम से प्रसिद्ध है.

बाद में इस पर खंडेला के राजा का आधिपत्य हुआ तब यह खंडेला खाटू के नाम से जाना जाने लगा. खंडेला राजा ने इसे अपनी कन्या के दहेज में जोधपुर महाराज दे दिया और जोधपुर महाराज ने इसे दहेज में जयपुर महाराज को दिया. जयपुर महाराज ने इसे खाटू के ठाकुर रामबक्स जी-हरि सिंह जी को बकसीस दे दिया. स्वाधीनता के पश्चात राजा का गढ़ धर्मशाला में बदल गया, जिसे अब गढ़वाली धर्मशाला के नाम से जाना जाता है.

शीश के दानी का प्रमाण ‘भारत सार’ के उद्योग पर्व के 58वें अध्याय में वर्णित है. भारत सार महाभारत का ही सार है. स्कंद पुराण में बर्बरीक-आख्यान को प्रमुखता से दिया गया है.

पौराणिक कथाओं से यह स्पष्ट है कि श्री श्याम देव का शीश शुभ नक्षत्र में खाटू धाम के जहां आज श्यामकुंड है प्रगट हुआ और तत्कालीन राजा ने खाटू में मंदिर बनवा कर शीश को विराजमान किया. सत्रहवीं सदी में श्याम देवरे को लेकर खंडेले के राजा बहादुर सिंह और औरंगजेब की सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसका उल्लेख विख्यात यात्री कर्नल टाड ने अपने यात्रा साहित्य में किया है. इस युद्ध में अनेक राजपूत सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए और अंतत: श्याम देवरा ध्वस्त हो गया. यह घटना 8 मार्च 1679 की है.

इसका पूर्ण विवरण औरंगजेबनामा में है. अभी जो मंदिर है, उसके निर्माण की नींव ज्येष्ठ सुदी 3 संवत् 1777, रविवार को रखी गयी. फाल्गुन शुक्ल 3 संवत 1777, शुक्रवार को मंदिर पर कलश चढ़ाया गया एवं फाल्गुन शुक्ल 7 संवत् 1777 को श्री श्याम प्रभु के दिव्य शीश को शुभ मुहूर्त में सिंहासन पर विराजमान किया गया. इसका पूरो ब्योरा मंदिर के शिलालेख में दर्ज है.

अभी संवत् 2076 चल रहा है. इसी फाल्गुन शुक्ल 7 को मंदिर 299 वर्ष पूरे कर 300वें वर्ष में प्रवेश करेगा. धवल संगमरमर से निर्मित खाटू धाम करोड़ों भक्तों की श्रद्धा का केंद्र है. खाटू धाम के श्यामकुंड में स्नान कर न जाने कितनों की काया निरोगी हुई है. आज खाटू धाम के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों में श्री श्यामदेव के मंदिर बन चुके हैं. रांची में भी श्री श्याम मंडल ने अग्रसेन पथ पर श्री श्याम देव के प्रथम भव्य मंदिर का निर्माण किया. फाल्गुन शुक्ला एकादशी के मंगलमय अवसर पर यहां तीन दिवसीय विराट फाल्गुन सतरंगी उत्सव आयोजित किया जायेगा.

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