ओंकारेश्वर : नर्मदा तट पर शिव दर्शन

By Prabhat Khabar Digital Desk
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सुमन बाजपेयी
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में ओंकारेश्वर मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में एक है और यहां पर मां नर्मदा स्वयं ॐ के आकार में बहती हैं. कहा जाता है कि इसी मंदिर में कुबेर ने शिवलिंग बनाकर तपस्या की थी. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें धनपति बनाया था. शिव जी ने फिर अपने बालों से कावेरी नदी उत्पन्न की, जिससे कुबेर ने स्नान किया था. यही कावेरी नदी ओंकार पर्वत की परिक्रमा करते हुए नर्मदा नदी में मिलती है. वहां नर्मदा-कावेरी के संगम पर आकर लोग स्नान और पूजन करते हैं.
मंदिर के निर्माण के विषय में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है. यह छोटा मंदिर ऊंचाई पर, नदी के खड़े गहरे किनारे के काफी पास दक्षिण की ओर बना है. उत्तर की ओर का बड़ा विस्तृत हिस्सा नयी शैली में बना लगता है. मंदिर तक पहुंचने के लिए एक झूला पुल को पार करना पड़ता है.
मंदिर के सभामंडप में 15 फुट ऊंचे 60 बड़े स्तंभ हैं, जिनकी नक्काशी देखते ही बनती है. दिलचस्प बात यह है कि यह मंदिर अपनी शयन आरती के लिए प्रसिद्ध है, क्योंकि माना जाता है कि केवल यहीं शिवजी देवी पार्वती के साथ विश्राम करते हैं, उनके साथ चौपड़ खेलते हैं. वह रात भर आराम कर भोर में तीन बजे महाकालेश्वर जाते हैं और वहां स्नान करते हैं, इसलिए वहां की भस्म आरती प्रसिद्ध है.
यहां आकर ओंकार पर्वत की परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए. यह पथ लगभग 7 किलोमीटर लंबा है, और नौका द्वारा भी इसे किया जा सकता है. नीचे बहती नर्मदा का साफ व शीतल जल, पूरे रास्ते दिखनेवाले मनोरम दृश्य और अनगिनत मंदिर और सुंदर संगम स्थल मन को बांध लेते हैं. नर्मदा अमरकंटक से निकलकर ओंकारेश्वर होते हुए भरूच के निकट अरब महासागर में मिल जाती है.
नर्मदा की इस यात्रा के बीचोबीच स्थित ओंकारेश्वर को नर्मदा का नाभिस्थल भी कहा जाता है, इसीलिए नर्मदा परिक्रमा करने का अत्यंत महत्व है. ऐसी मान्यता है कि इक्ष्वाकु राजा मान्धाता की भक्ति शिवलिंग को यहां खींच लायी थी. इसलिए इसे ओंकार मान्धाता मंदिर भी कहा जाता है. इक्ष्वाकु राजा मान्धाता की गद्दी अब भी मंदिर परिसर में देखी जा सकती है. मुख्य मंदिर को चारों ओर से घिरे कई छोटे मंदिर हैं. कैसे पहुंचें : इंदौर से दूरी लगभग 80 किमी है. खंडवा रोड पर बड़वाह, मोरटक्का होते हुए दो-ढाई घंटे में ओंकारेश्वर पहुंचा जा सकता है.
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