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रोगों का शमन एवं अशुभताओं का निवारण करता है रक्षाबंधन

Updated at : 10 Aug 2019 3:13 AM (IST)
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रोगों का शमन एवं अशुभताओं का निवारण करता है रक्षाबंधन

मार्कण्डेय शारदेय ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ markandeyshardey@gmail.com संपर्क – 8709896614 जी यह जीवन पग-पग पर असुरक्षित है. कब क्या हो जाये, क्या पता! इसलिए रक्षा-सुरक्षा सबको जरूरी है. दैहिक कष्टों से बचने के लिए संयम तथा रोग उत्पन्न होने पर समय से दवा लेते ही हैं, पर भौतिक व दैवी आपदाओं पर किसका नियंत्रण है? […]

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मार्कण्डेय शारदेय

ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ
markandeyshardey@gmail.com
संपर्क – 8709896614
जी यह जीवन पग-पग पर असुरक्षित है. कब क्या हो जाये, क्या पता! इसलिए रक्षा-सुरक्षा सबको जरूरी है. दैहिक कष्टों से बचने के लिए संयम तथा रोग उत्पन्न होने पर समय से दवा लेते ही हैं, पर भौतिक व दैवी आपदाओं पर किसका नियंत्रण है? बिजली गिरे मर जायें, बाढ़ में डूब जायें, लू ले बीते, ठंड ठंडा कर दे क्या पता? हम बचते आ रहे हैं, यह कृपा, आशीर्वाद एवं शुभकामनाओं की भी देन है.
इसमें बड़े-बुजुर्गों से मिले आशीष तथा मित्रों व छोटों से भी मिलनेवाली शुभकामनाओं का बड़ा बल है. रक्षाबंधन का भी यही उद्देश्य है – ‘सर्व-रोगोपशमनं सर्वाशुभ-विनाशनम्’, अर्थात् सभी रोगों का शमन एवं अशुभताओं का निवारण.
वेद में आया है-‘पुमाँ पुमांसं परिपातु विश्वतः’, अर्थात पुरुष, पुरुषों की हर तरह से रक्षा करे. यहां पुरुष का तात्पर्य मर्द, मर्द की रक्षा करे नहीं, बल्कि एक व्यक्ति अनेक व्यक्तियों के रक्षार्थ सदैव तत्पर रहे, यही परिधीय अर्थ है. वस्तुतः मुख्य है रक्षण.
इसके वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, शासकीय, नैतिक एवं धार्मिक-विविध रूप हैं. उन्हीं में से रक्षाबंधन भी है. भाई की कलाई में राखी के धागे बांध जहां बहन उसके दीर्घायुष्य, स्वास्थ्य, सुख, सौमनस्य की कामना करती है, वहीं भाई भी बहन के सम्यक् रक्षणार्थ प्रतिबद्ध होता है.
ऐसे में बहन कहीं दूर भी ब्याही गयी है, तो भी इस एक दिन के लिए ही सही, दोनों अपने बचपन में आ जाते हैं और बाल्यकाल के सारे भूले-बिसरे चित्र धीरे-धीरे अंखुआने लगते हैं. राखी की यह पतली-सी डोरी पारस्परिक प्रेम को सुदृढ़ करने लगती है. हमारे समाज-निर्माताओं की यह बड़ी देन है.
रक्षाबंधन उपाकर्म का अंग रहा है. आषाढ़ में देवशयन एवं चातुर्मास्य आने पर बरसात के कारण भी यज्ञ-यागादि का कार्य बंद रहता था और ऋषि-मुनि, साधु-संत गांवों के निकट ही अपना व्रत-पालन करते थे.
ज्ञान वृद्धि के लिए श्रावणी पूर्णिमा को अध्ययनार्थ वेदभाग का निर्धारण तथा प्रतिज्ञाबद्ध होते थे. इसी क्रम में लोक-कल्याण की भावना से रक्षा-पोटलिका का निर्माण करते थे. भविष्योत्तर पुराण के अनुसार पुरोहित अपराह्न में अक्षत, पीली सरसों, स्वर्ण-खंड आदि को रंग-बिरंगे सूती या रेशमी कपड़े में बांधकर धागे में गूंथ लेते.
फिर कलाई में बांधने योग्य छोटी-सी पोटली की विधिवत कलश पर रखकर पूजा होती. तब किसी को बांधी जाती. यह रक्षणाचार जाति-बंधन से परे था. समाज के सभी अंगों को पुरोहित रक्षणीय मानकर रक्षाबंधन करते. शास्त्रीय मान्यता के अनुसार विधिवत किये गये रक्षाविधान से सालभर तक व्यक्ति पर कुप्रभाव नहीं आते –
अनेन विधिना यस्तु रक्षिका-बन्धमाचरेत्।
स सर्वदोष-रहितःसुखं संवत्सरं वसेत्।।
सावन पूर्णिमा को ही क्यों?
बरसात में विविध जीव-जंतुओं तथा रोगों से जीवन को अधिक खतरा रहता है. ऐसे में मांत्रिक उपचार के रूप में रक्षाबंधन यह विश्वास दिलाता रहा कि मुझे कुछ होनेवाला नहीं, मैं सुरक्षित हो गया हूं. हम सभी सुख-शांति से रह सकेंगे, जबकि आर्ष वचन के अनुसार श्रावण शुक्ल चतुर्दशी को मधु-कैटभ नामक असुर उत्पन्न हुए और वे ब्रह्माजी से वेद छीन कर पाताल ले भागे.
श्रीहरि उन्हें ढूंढ़ कर और वेद लाकर श्रावण पूर्णिमा को पुनः ब्रह्माजी को सौंप दिये. चूंकि चतुर्दशी को वेदों का हरण हुआ था, इसलिए यह अपवित्र एवं पूर्णिमा को वेद प्राप्ति हुई, इसलिए पवित्र मानी गयी. इसी कारण चतुर्दशी-युक्त को उपाकर्म एवं रक्षाबंधन विहित नहीं और वेदों की प्राप्ति के दिन (पूर्णिमा को) शुभ माना गया. –
अतो भूतयुते तस्मिन् नोपाकरणमिष्यते।
आसुरं वर्जयेत् कालं वेदाहरण-शंकया।।
वैदिक मंत्र
यदा बध्नन् दाक्षायणा हिरण्यं शतानीकाय सुमनस्यमानाः।
तन्मsआबध्नामि शत-शारदायुष्मान् जरदष्टिर्यथासम्।।
पौराणिक मंत्र
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
शुभ मुहूर्त : इस बार रक्षाबंधन 15 अगस्त (गुरुवार) को मनाया जायेगा. इस दिन पूर्णिमा अपराह्न 04:23 बजे तक है और भद्रा नहीं है. इसलिए प्रात: काल से अपराह्न 04:23 बजे तक राखी बांधना-बंधाना उत्तम रहेगा. परिबा (प्रतिपदा) में यह अच्छा नहीं माना गया.
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