हर काम में रुकावट, पितृदोष तो नहीं!
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :20 Jul 2019 2:16 AM (IST)
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मार्कण्डेय शारदेय, ज्योतिषाचार्य जी वन में उतार-चढ़ाव तो सामान्य बात है, परंतु पारिवारिक सुख-शांति छिन जाना, उन्नति अवरुद्ध होना, आपसी मन-मुटाव बढ़ जाना आदि बाधाओं के लिए ज्योतिष में अनेक स्थितियां बतायी गयी हैं. इनमें पितृदोष व ग्रहण योग भी हैं. किसी कारण वश पितरों की नाराजगी हमारे लिए आफत बन आती है. तब ये […]
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मार्कण्डेय शारदेय, ज्योतिषाचार्य
जी वन में उतार-चढ़ाव तो सामान्य बात है, परंतु पारिवारिक सुख-शांति छिन जाना, उन्नति अवरुद्ध होना, आपसी मन-मुटाव बढ़ जाना आदि बाधाओं के लिए ज्योतिष में अनेक स्थितियां बतायी गयी हैं. इनमें पितृदोष व ग्रहण योग भी हैं. किसी कारण वश पितरों की नाराजगी हमारे लिए आफत बन आती है. तब ये सारी चीजें घटित होती हैं. वहीं प्रतियोगिताओं में सुयोग्यताएं जब मार खा जाएं, काम बन-बन कर बिगड़ जाए, तो यह ग्रहण है!
ज्योतिष में राहु और केतु छाया ग्रह (तमः स्वरूपौ शिखि-सिंहिकासुतौ) हैं, इसलिए प्रेतत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं. राहु को दादा ग्रह तथा केतु को नाना ग्रह मानने का आशय भी पितृकुल एवं मातृकुल के पूर्वजों से ही है.
शनिपुत्र गुलिक भी ऐसा ही कार्य करता है, इसलिए चाहे प्रेतबाधा हो, ग्रहण योग हो व पितृदोष; सबका मुखिया राहु है. नवम भाव में बैठा राहु खास कर मकर का हो और यदि सूर्य या चंद्र के साथ हो, पुनः छह अंश से कम दूरी हो, तो विशेष तबाही मचा सकता है.
दृष्टि संयोग भी अंशतः अशुभ ही होता है. इसके अतिरिक्त कुंडली के अष्टम भाव में शनि के साथ निर्बल चंद्र (रन्ध्रे समन्देsबले पिशाच-पीडा) अथवा शनियुत राहु का लग्न में होना (तमोsर्कजो लग्ने पिशाचपीडा) प्रेतबाधा का परिचायक है. दूसरी ओर सप्तम भाव में मंगल या शनि के साथ राहु या केतु की युति हो, तो पति या पत्नी का प्रेत-ग्रसित होना संभव है.
राहु का सूर्य या चंद्र के साथ संयोग बना रह हो या षडष्टक योग हो और दशाकाल भी चल रहा हो, तो शारीरिक, मानसिक, आर्थिक परेशानियां कूद-कूद कर आयेंगी. संक्षेप में यह कि कुंडली हो या न हो, तो भी उक्त लक्षणों को देख समझ जाना चाहिए कि किसी न किसी रूप में अवश्य पितृदोष व ग्रहण योग है. पुनः यथोचित उपचार करना चाहिए.
उक्त बाधाओं के निवारण का मुख्य उपचार त्रिपिंडी श्राद्ध है, जिसमें विष्णु, ब्रह्मा एवं रुद्र को प्रेत मान कर पूजा व पिंडदान का विधान है. चूंकि इन्हीं तीनों को क्रमशः जौ, चावल तथा तिल के आटे का पिंड दिया जाता है, इसलिए इसे त्रिपिंडी कहते हैं.
कुछ लोग सोचते हैं कि पिता आदि के जीवित रहते संतानें श्राद्ध कैसे करें, तो यह जानें कि यहां किसी मानव-विशेष के श्राद्ध की बात न होकर सृष्टि के आदि नियामक त्रिदेवों के तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) की ही आराधना है, जिससे कोई हानि नहीं.
करें ये सरल उपाय
सहज उपचारों में नित्य तर्पण, स्वधा-स्तोत्र, पितृस्तोत्र का पाठ एवं अमावस्या को अन्नदान है. एक और सरल विधि है कि किसी सोमवती अमावस्या को सुबह पीपल के वृक्ष की ‘ऊं नमो भगवते वासुदेवाय’ इस मंत्र से जल, रोली, तिल, फूल, धूप, दीप एवं प्रसाद चढ़ा कर पूजा कर लें. इसके बाद यही मंत्र जपते हुए 108 बार परिक्रमा कर लें. जो एकदम अशक्त हैं, वे 28, 8 या 4 बार ही फेरा लगाएं. इसके बाद एक सुपारी के साथ जनेऊ चढ़ा कर दोष की शांति की प्रार्थना करें. हो सके तो हर सोमवती अमावस्या को यह उपचार करें.
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