पुस्तक समीक्षा: नदी के तल से समेटी गयी अनोखी कहानियों का संग्रह है ‘नदी सिंदूरी’
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 14 Jun 2023 5:26 PM
यह किताब किसी उपन्यास की तरह लगता है जिसमें सिंदूरी नदी के माध्यम से अलग-अलग कहानियां जुड़ती चली गयी हैं. देखा जाये तो समूचे उपन्यास में कहानियां स्वतंत्र भी हैं और एक-दूसरे से बंधी हुई भी हैं.
-अमिता शिरीन-
मध्य-भारत में एक छोटी-सी नदी है सिंदूरी, जो आगे जाकर एक बड़ी नदी नर्मदा में गुम हो जाती है. उस सामान्य नदी के किनारे बसा एक सामान्य-सा गांव है मदनपुर. लेकिन, उस छोटी-सी नदी के किनारे और उस सामान्य गांव के आसपास बिखरी रहती हैं कई सारी अनगिनत सुनी और अनसुनी कहानियां, सुनी-सी कहानियां जो सदियों रहती हैं लोगों के जेहन में, गांव में, बीते बचपन में, जवानी में, बुढ़ापे में. कहीं भी रहें वे कहानियां तह लगा कर दिमाग में जमा रहती हैं. कुछ लोगों में ये कुव्वत होती है कि उन कहानियों के फूल नदी के प्रवाह में कूद कर चुन लाते हैं. बहुत-सी कहानियां बेशक धारा के साथ बह जाती होंगी. लेकिन, धारा में कूदकर उन कहानियों को पकड़ने का काम किया है लेखक और पत्रकार शिरीष खरे ने अपनी नयी किताब ‘नदी सिंदूरी’ में.
वे कई बार अपनी प्यारी सिंदूरी नदी की धारा में काल्पनिक डुबकी लगाते हैं (जैसा वह स्वयं किताब में बताते हैं कि उन्हें गहरे पानी से डर लगता था) और नदी की तली से उठा कर पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं सिंदूरी नदी के आसपास बिखरी कहानियों में से तेरह चुनिंदा कहानियां. ये सारी की सारी कहानियां इतनी अपनी और सच्ची लगती हैं कि आप अचानक सिंदूरी नदी में धारा की तरह बहने लगते हैं. भोपाल में मेरा एक दोस्त है विजय जो अक्सर कहा करता कि ‘कंपनी आपका शुक्रिया अदा करती है’ जाहिर है ‘नदी सिंदूरी’ में यह गांव की रामलीला कंपनी की एक पंक्ति है, ऐसा विजय भी अक्सर दोहराता था और मजा लेता था. नदी सिंदूरी पहली कहानी ‘हम अवधेश का शुक्रिया अदा करते हैं’ पढ़ने के बाद मुझे पहली बात यही याद आयी काश इस कहानी का शीर्षक होता ‘कंपनी अवधेश का शुक्रिया अदा करती है’.
पहली कहानी से ही नदी सिंदूरी और मदनपुर से जो नाता बनता है वह प्रेम आखिरी कहानी ‘वे दो पत्थर’ में नदी की तली में स्थिर हो जाता है. फिर धीरे-धीरे नदी और गांव दोनों बेहद अपने लगने लगते हैं. यह किताब किसी उपन्यास की तरह लगता है जिसमें सिंदूरी नदी के माध्यम से अलग-अलग कहानियां जुड़ती चली गयी हैं. देखा जाये तो समूचे उपन्यास में कहानियां स्वतंत्र भी हैं और एक-दूसरे से बंधी हुई भी हैं. बुन्देलखंडी की मिठास इस किताब में न होती तो शायद यह किताब इतनी सरस-सहज न होती. बेहद प्यारी और संप्रेषणीय बोली शुरू से आखिर तक मन मोह लेती है.
वहीं, किताब की कहानियां बहुत जटिल संबंधों को बेहद सरलता से बयान करती हैं. चाहे भूरा और अवधेश का समलैंगिक संबंध हो या दलित बसंत द्वारा कृपाल सिंह की पिटाई. कुछ जगह लेखक की एक पक्षधर दृष्टि है, जो अंत तक स्पष्ट दिखती है. जैसे कि दलित मुग्घा द्वारा अन्य जमात से आने वाले उसी के सहपाठी उदय की यह पंक्ति ‘कूद मत जइयो उद्दू भैया, तुमाओ धरम भ्रष्ट हो जैहे हमार तन को पानी छू के’, किशोर होते लेखक के संवेदनशील मन पर छाप छोड़ जाती है और उसी बात को संवाद के जरिये कहानी में बखूबी उकेरते हैं लेखक. गांव में दबंग जाति से आने वालों की लम्पटई के किस्से और उनके खिलाफ दलित युवक के बागी होने के किस्से बहुतायत में मिलते हैं. सिंदूरी नदी ने भी ऐसे किस्से कभी अपने किनारे तो कभी अपनी धार पर बहुतेरे देखे हैं. नदी की कही कहानी को शिरीष ने अच्छी ज़बान दी है.
गांव में बहने वाली नदी अक्सर गवाह होती है अनेक असफल प्रेम कहानियों की भी. खूंटा के प्रेम और उसके बाद प्रेम-वियोग में पागल हो गयी उसकी पत्नी एक रोज नदी की धारा में ही समा जाती है. कहानी पढ़ते हुए सिंदूरी का पानी अपनी आंखों से बहने लगता है और आंखों से आंसुओं की यह धारा देर तक बहती रहती है. यही संवेदनशीलता इन कहानियों की सार्थकता है. अंत में अनकहे प्रेम के ‘दो पत्थर’ नदी सिंदूरी’ की तली में जाकर बैठ जाते हैं अपनी जगह तलाश कर लेते हैं…और यहां किताब तो ख़त्म हो जाती है, लेकिन कहानियां जेहन में चलती रहती हैं…
इस किताब की कहानियों में कहीं-कहीं पर पत्रकार शिरीष खरे की भाषा हावी होने लगती है और कहानीकार की भाषा पीछे छूट जाती है. लेकिन, जल्दी ही नदी सिंदूरी और उसकी अनुभूतियां उसे संभाल लेती है. नदी से मेरा लगाव बहुत ज्यादा है. लेकिन, मेरी नदी है- गंगा. नदी सिंदूरी से परिचित होने के बाद मुझे लगा कि इस महानदी गंगा में भी तो सिंदूरी जैसी कितनी नदियां और उसके किनारे बसी हुई कहानियां आकर मिल जाती होंगी. मतलब रोज़-रोज़ मेरी आंखों के सामने से कितनी कहानियां बह जाती होंगी सरेआम….
फिर याद आता है नदी सिंदूरी तो नर्मदा में मिलती है जो अरब सागर में चली जाती है. मतलब गंगा और नर्मदा का कोई मेल कहीं नहीं होता है. लेकिन, ‘नदी सिंदूरी’ में किनारे पर बिखरे इन कहानियों के फूल उसे जोड़ते हैं. ‘नदी सिंदूरी’ जैसी कहानियों और किताबों की आज सख्त जरूरत है, इसलिए लेखक शिरीष का शुक्रिया इन कहानियों को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए. शायद मैं ये कहानियां गंगा को सुनाऊंगी कभी या फिर गंगा के किनारे की कहानियां बटोरुंगी किसी समय से.
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