पुस्तक समीक्षा : दो हृदयों को शब्दों से टटोलकर भाषा में कहने की कोशिश है ‘यारेख’

रूह को कागज पर उतारते वक़्त स्मृतियां रोशनाई और प्रिय की अनुपस्थिति ताकत बन जाती है. प्रेम मनुष्य को विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी टूटने नहीं देता है . प्रेमपत्र दो हृदयों को जोड़ने का सबसे सुंदर और प्रभावी औजार है.
-सौरभ प्रकाश-
प्रेमपत्र दो हृदयों को शब्दों से टटोलकर भाषा में प्रेम कहने की खूबसूरत क़वायद है. पेंगुइन रैंडम हाउस और हिंद पॉकेट बुक्स ने इस बार इस कवायद में छत्तीस सितारें जोड़ दिए हैं. हालांकि किताब का नाम ‘यारेख’ है जिसका मतलब होता है चांद .मगर इस यारेख में छत्तीस ज़हीन सितारें हैं जिन्होंने इश्क लिखा है. जब-जब कागज पर प्रेम लिखा गया है तब-तब शब्दों को नई ताकत और भाषा को नया वैभव प्राप्त हुआ है. रूह को कागज पर उतारते वक़्त स्मृतियां रोशनाई और प्रिय की अनुपस्थिति ताकत बन जाती है. प्रेम मनुष्य को विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी टूटने नहीं देता है . प्रेमपत्र दो हृदयों को जोड़ने का सबसे सुंदर और प्रभावी औजार है. प्रेमपत्र में एक साथ दो हृदय धड़कते हैं जबकि उसे लिखता कोई एक है.
इन प्रेमपत्रों में स्मृतियों का पुलिंदा, वैचारिक आग्रह , भावात्मक उतार-चढ़ाव ,नेह-स्पंदन के अलावा छोटी-बड़ी आकांक्षाओं का निर्मल आकाश भी है. कुछ पत्र मिलन की आस में लिखे गये हैं तो कुछ पत्र विरह के गहरे दुःख में लिखे गये हैं.हर पत्र में प्रिय के लिए अलग-अलग संबोधन और इश्क के अलग-अलग रंग हैं. छत्तीस रचनाकारों ने बड़ी शिद्दत से कागज पर इश्क लिखा है. प्रभावशाली संपादकीय से होकर गुज़रने के बाद एक-एक पत्रों से होकर गुजरना कई तरह की जानी-पहचानी गलियों से होकर गुज़रने जैसा है.हर गली में अलग तरह की आवाज़, अलग तरह के दृश्य ,अलग तरह की रौशनी,अलग तरह की गंध, अलग तरह के रास्ते और कई तरह के लोग मिलते हैं . इस तरह यह संकलन प्रेम को कहने के कई तरीकों से हमारी पहचान करवाता है.
समय से भिड़ते, थकते आदमी के जेहन में कैसे प्रेम उभरता-उमड़ता है.पति से जुड़ी स्मृतियाँ प्रेम के हिस्से में कैसे बूंद-बूंद टपकती हैं. छूट गये प्रेमी-प्रेमिकाओं की सघन स्मृतियां कैसे मन में वसंत राग की तरह फैल जाती हैं. कैसे मृत प्रेमी के साथ वैचारिक जिरह में भी कोमल करूणा के भाव खिल उठते हैं. कैसे मीठे व्यस्त कवि के मन में प्रेम करवट लेता है.कैसे प्रेम के गहरे ठौर पर यह बात दर्ज हो जाती है कि आखिर में मैत्री भाव ही बचता है. संघर्ष और इंकलाब के समय में स्ट्रीट लाइट के बीच मद्धम होते तारे की रौशनी में प्रेम कैसे सुघड़ता से प्रवेश करता है. कैसे समानता और स्वतंत्रता के आंदोलन के बीच कोई कोमलता से हाथ थामता है और उम्रभर सखा बने रहने का वादा करता है. कैसे प्रेम में नहाये व्यक्ति के लिए प्रेम से निवृत्ति का हर मार्ग दुर्लभ हो जाता है. कैसे बरसों बाद प्रेमी को देखकर अतीत के दृश्यों की पुनरावृत्ति होती है. कैसे बाल सखियों से सही और सुरक्षित दिशा मिलती है. कैसे कोई रंग गुलाबी छोड़कर चला जाता है. कैसे धर्म की परिधि लांघकर प्रेम प्रस्फुटित और परिवर्धित होता है. कैसे संशय से उबरकर प्रेम प्रकाश की तरह जीवन में फैल जाता है .कैसे प्रिय के कण-कण और कविता की हर पंक्ति में प्रेम उतर आता है.कैसे पहाड़ों पर से उतरकर प्रेम मन में सिमटकर बैठ जाता है.कैसे नन्हें -नन्हें आग्रहों में प्रेम भरा होता है.ऐसी कई खूबसूरत चीज़ों से यह किताब भरी पड़ी है.
इस संकलन में अनिता भारती,वंदना टेटे, त्रिभुवन ,अनुज लुगुन जैसे चिंतनशील ,संघर्षरत ,सामाजिक चेतना से ओत प्रोत कवियों के पत्र हैं जिनमें इनके कोमल मन थाप को आसानी से सुना-समझा जा सकता है.अपने पत्र में त्रिभुवन कहते हैं:
हम ऐसी दुनिया में हैं, जहां किसी को किसी की उदासी से कुछ नहीं. तुम नाराज़ हो जाती हो. अपनी नाराज़ियों की कलमें अपने दिल में बोती रहती हो. इन पर गुस्से की कोंपलें खिल जाती हैं. तो मुझे लगता है, मैं अपनी हर सांस तुम पर बिखेर दूं.
अचानक लगता है, मैंने चांद को अपने भीतर भर लिया है. एक लंबी सांस के साथ. मेरे भीतर सन्नाटा है या सन्नाटे का शोर? लेकिन क्या कोई सुन सकता है, जो मेरे और तुम्हारे बीच बात होती है. तुम्हीं को तो मेरी हर बात पता रहती है. मेरी उदासी को तुम्हारे अलावा कोई पढ़ पाया भला?
तुम्हारी अनुपस्थिति भी उपस्थिति है. मौन भी मुखरता. तुम्हारी चुप्पी से टूटकर गिरा एक लम्हा भी मेरी उदासियों को कम कर देता है.
इस संकलन के कुछ बेहद खूबसूरत पत्रों में एक पत्र मनीषा कुलश्रेष्ठ का है ,वह कहती हैं:
ब्रह्म मुहूर्त में एक ललक और संभावित अलगाव के पीड़क पलों में तुमने कान में जो विदा का श्लोक फुसफुसा कर फूंका था, एन् उसी पल कविता में उपस्थित हो उठी थी, तुम्हारी संभावित स्थायी अनुपस्थिति. हम मिल रहे थे, उसकी आगत अनुपस्थिति के भुरभुरे मुहाने पर. तुम क्रमश: अनुपस्थित हो रहे थे मेरे परोक्ष अस्तित्व से, मगर उपस्थित होते जा रहे थे मेरे होने की तमाम अपरोक्ष वजहों के मूल में. बाहर मेरी देह और परछाई जितनी जगह घेरती है, तुम उतनी जगह मेरे भीतर घेर रहे थे, मेरी ही परछाई के मूल स्त्रोत को बेदखल करते हुए. बाहर कोहरा था, भीतर और भी घना, लेकिन दोनों कोहरों में गहरा फर्क था. ये अलगाव की आगत के क्षेपक क्षण थे, असंगत – से, कि उपस्थित थे तुम, अनुपस्थित होने के बहुरूपात्मक प्रत्यक्षीकरण में. मेरी पीठ पर दर्ज हैं, आज भी तुम्हारी कौड़ियाली आंखें, रेतघड़ी सी झरती हुईं. जो चाहती थीं स्थान, काल, पात्र की सभी सीमाएं ध्वस्त हो जाएं, समय – रथ के पहिए की धुरी ही टूट जाए.
कहीं अपने मायावी होने की कोमल सूचना देते वक़्त सूर्यबाला जी कहती हैं:
कुछ कम मायावी नहीं थी मैं. आज बताती हूं, तुम्हारी तरफ से जरा भी ‘सुराग’ लेने की जिज्ञासा कुतूहल न पाकर मेरा मन थोड़ा’ ढीठ भी हो आया था.
प्रतीक्षा विगलित हृदय की वेदना को व्यक्त करते हुए उषाकिरण खान कहती है :
मैं तुम्हारे बिना बिल्कुल अकेली हूं. दोनों बच्चे अच्छी नौकरी में लग गये, मैं रिटायर कर गई हूं. गाना तुम्हारे साथ चला गया. अब तो ‘सा’ का सुर भी नहीं लगता. तुम हो कहीं, ऐसा आभास होता है प्रिय, आओ मैं अब भी तुम्हारी शरणार्थी हूं
अपने पत्र में प्रेमिका से मनोहार करते हुए असगर वजाहत कहते हैं:
अब तुम यह पूछ सकती हो कि मैं कबूतर का सहारा क्यों नहीं लेता था, तो मैं बताना चाहता हूं कि उस जमाने में कबूतर का शिकार बहुत प्रचलित था. मुझे डर था कि मेरा संदेश वाहक कबूतर मार दिया जाएगा. मैं नहीं चाहता था कि मेरे प्रेम के लिए मेरे अलावा और कोई किसी तरह की कुर्बानी दे. तुम यह भी कह सकती हो कि मैंने बादलों का सहारा क्यों नहीं लिया? मेघ दूत बन जाते हैं. उसकी वजह यह है कि वह अकाल का ज़माना था. बारिश बहुत कम होती थी. मेघ बहुत कम आते थे और मेघ दूत बनने से तो बिल्कुल ही इनकार कर देते थे.
चिंतक और समाज सुधारक कवि अनिता भारती अपने पत्र में कहती हैं:
तुम्हारे साथ अपने और तुम्हारे तीन दशकों से ज्यादा सदाबहार प्यार में जीते हुए मुझे अपना जीवन हमेशा ऐसे लगता रहा है जैसे मैं कही दूर ऊंची पहाड़ की चोटी पर बैठकर, उस ऊंचाई को महसूस करते हुए आस-पास के सुंदर स्निग्ध शांत हरियाली और उसमें बसी निस्तब्ध सुगंध व ठंडी बयार को महसूस कर रही हूं.
छोटी-छोटी चीज़ों में बड़ी-बड़ी खुशियां रोपती वंदना टेटे अपने पत्र में कहती हैं:
तुम्हारा भेजा बर्थ डे कार्ड और कविता मिली.कविता के लिए ढेर सारा उम्मा.हर बर्थ डे पर एक कविता मेरे नाम से होगी तो मैं तो धनवान हो जाऊंगी. इन्हें अपनी सिल्वर /गोल्डेन /प्लैटिनम जुबली पर छपवाएंगे.ठीक है ?मेरे लिए बड़ा उपहार होगा ,ठीक है न?
मन के उल्लास और बलिदान की चाह को अपने पत्र के माध्यम से व्यक्त करते हुए युवा कवि अनुज लुगुन कहते हैं:
मातृभूमि के लिए धरती आबा का बलिदान. ‘अबआु दिसुम रे अबआु राइज’ की ज़िद. उलगुलान का उद्घोष! सच कहूं बलिदान की लहरें मेरे अंदर भी हिलोरें मारने लगती हैं. तुम्हारे साथ जीते हुए यह भावना और भी मजबूत होने लगती है.
कर्फ़्यू के दौरान हुज़ैफा पंडित ने अपनी दिनचर्या में किताबों के आने और स्मृतियों के पसर जाने को बड़े ही मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है.
दंगे-फ़साद और घृणा के समय में भी प्रेम कहने का साहस लेखक- लेखिकाओं ने सदैव ही दिखाया है.जिस तरह आज चारों तरफ़ घृणा की राजनीति चरम पर है ऐसे समय में यह संकलन इस बात की तस्दीक़ करता है कि प्रेम लिखना रचनाकारों के लिए कठिन से कठिन समय में भी मुमकिन रहा है.
वंदना टेटे,अनिता भारती,आलोक धन्वा,हुज़ैफा पंडित,उमर तिमोल,के.सच्चिदानंदन,असग़र वजाहत, मैत्रेयी पुष्पा,अनामिका,त्रिभुवन,पंकज सिंह,सविता सिंह,नंद भारद्वाज,अनिल कार्की,तेजी ग्रोवर,यतीश कुमार, गोपीकृष्णन कुट्टूर,उषाकिरण खान, सूर्यबाला,शेफालिका वर्मा,मनीषा कुलश्रेष्ठ, गीताश्री,सुदीप सोहनी,संजय शेफर्ड,नीलेश रघुवंशी,जमुना बीनी, हरविंदर कौर,रोसेल पोतकर,शैलजा पाठक, अनुराधा सिंह,जयंती रंगनाथन,तसनीम खान,आकांक्षा पारे,विभा रानी,अनुज लुगुन और अनामिका अनु. इस किताब को कवि अनामिका अनु ने संपादित किया है.इस किताब की कीमत 299 रुपये है.
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