अगर हो पैसे की कमी और इग्नोरेंस, सुसाइड नहीं है रास्ता

Edited by Rajneesh Anand
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मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने से पहले दें ध्यान

Mental health in Jharkhand : झारखंड में पिछले कुछ दिनों में 4 ऐसी घटनाएं सामने आयीं हैं, जिसने सभ्य समाज को असभ्य की श्रेणी में खड़ा कर दिया है. खुद को ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ रचना मानने वाला इंसान, आखिर क्यों इस तरह की हरकत कर बैठता है कि इंसानियत कलंकित हो जाती है? जवाब मिलता है मानसिक स्थिति खराब होने की वजह से फलां व्यक्ति ने इतना घृणित कार्य कर दिया. आखिर मानसिक स्थिति खराब कैसे होती है और इसके परिणाम क्या हैं?

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घटना 1 : झारखंड के पलामू जिले में मां ने पैसे के लालच में अपनी नाबालिग बेटी की शादी एक बुजुर्ग से कराई. पिता को जानकारी मिलने पर बेटी को मुक्त कराया.

घटना 2 : झारखंड की राजधानी रांची में 28 साल से रिनपास (मानसिक रोगियों का अस्पताल) में भर्ती महिला की हुई मौत, परिजनों ने शव लेने से इनकार किया. अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ बेटा, कोरे कागज पर कई साइन ले, दिया धोखा.

घटना 3 : रांची के रिनपास अस्पताल के बाहर एक 10 साल की बच्ची को उसके माता–पिता छोड़कर भागे. संस्था ने डरी–सहमी बच्ची को दिया संरक्षण.

घटना 4 : रांची के कडरू इलाके में एक ही परिवार के तीन लोगों ने आत्महत्या की कोशिश की. आत्महत्या की कोशिश करने वालों में बेटे की मौत हो गई है और मां और बेटी अस्पताल में भर्ती हैं.

ये चार घटनाएं झारखंड में पिछले एक सप्ताह के दौरान घटी हैं. इस तरह की घटनाएं समाज के सामने कई तरह के सवाल खड़े करती हैं और समाज से यह पूछती है कि आखिर जिंदगी की आपाधापी में तथाकथित सभ्य समाज किस ओर जा रहा है? इस आलेख में उन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की जा रही है.

क्या आर्थिक परेशानी बढ़ा रही मनोरोगियों की संख्या?

झारखंड में पिछले दिनों जिस तरह की घटनाएं सामने आई हैं, उनमें आर्थिक कारण एक अहम फैक्टर रहा है. पैसे के लिए मां द्वारा नाबालिग बेटी की शादी बुजुर्ग से कराना, आर्थिक तंगी में परिवार द्वारा सुसाइड की कोशिश या फिर 10 साल की बच्ची को मां–बाप द्वारा त्यागने की बात की जाए. रिनपास के डायरेक्टर रहे प्रो (डॉ) अमोल रंजन सिंह ने प्रभात खबर के साथ खास बातचीत में बताया कि मानसिक समस्याओं के लिए तीन कारण जिम्मेदार हैं फिजिकल, सोशल और साइको–सोशल. फिजिकल वैसी समस्याएं हैं, जो किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से परेशान करती है.

मसलन कोई बीमारी हो या किसी तरह की अन्य समस्या हो. सोशल वजहों में सामाजिक और आर्थिक दोनों कारण शामिल होते हैं. जैसे कि अगर कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से परेशान है, तो वह सामाजिक रूप से भी पिछड़ा या उपेक्षित होगा. इस वजह से मानसिक समस्याएं बहुत ज्यादा होती हैं. हमारे समाज में आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को सम्मान मिलता है, जबकि कमजोर लोगों को काफी इग्नोर किया जाता है और अपमान भी सहना पड़ता है. इस वजह से कई बार आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा व्यक्ति परेशानी में आ जाता है और मानसिक रोगों का शिकार भी बना रहा है.

इस बारे में मनोवैज्ञानिक भूमिका सच्चर बताती हैं कि जब भी किसी मानसिक रूप से परेशान व्यक्ति की काउंसिलिंग की जाती है, तो आर्थिक पक्ष पर बहुत ध्यान दिया जाता है. आर्थिक स्थिति की वजह से कोई भी व्यक्ति बहुत परेशान रहता है और कई बार आत्महत्या और सबकुछ त्यागने जैसी कोशिशें करता है. आजकल वर्कप्लेस पर इतना स्ट्रेस बढ़ गया है. कंपनियां ले ऑफ करती हैं, नौकरियों की सुरक्षा नहीं है, जिससे एक असुरक्षा की भावना लोगों के मन में घर कर जाती है. अगर कोई व्यक्ति परिवार का इकलौता कमाने वाला हो, तो दिक्कत और होती है. प्रतियोगी युग है, लोगों की महत्वाकांक्षा काफी बढ़ चुकी है और इसी वजह से आर्थिक पक्ष मेंटल हेल्थ के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है.

समाज के दबाव और आर्थिक कारणों से बच्चों को छोड़ने और बेचने की समस्याएं आ रही सामने

आखिर वो क्या कारण और परिस्थितियां हैं, जिनकी वजह से कोई मां– बाप ऐसी हरकत कर देते हैं, जिससे मानवता शर्मसार होती है और समाज चौंक जाता है. इन सवालों का जवाब देते हुए डाॅ अमोल रंजन सिंह बताते हैं कि सामाजिक दबाव और पैसे की वजह से ही कोई इंसान अपने बच्चे को बेचने या छोड़ने का काम करता है. जैसे कि अगर किसी बच्चे को जन्म से कोई बीमारी है, तो आस–पड़ोस के लोग टीका टिप्पणी करते हैं. बच्चे के अभिभावकों को कहते हैं कि इसका भविष्य कैसा होगा, यह कभी ठीक नहीं होगा. इन बातों से पीड़ित लोगों पर सामाजिक दबाव बनता है और वे इस तरह की हरकत करते हैं. वे अपने बच्चे को स्टिग्मा  यानी कलंक समझने लगते हैं, जिसकी वजह से इस तरह की परेशानी होती है. रिनपास में भर्ती महिला के साथ जो कुछ हुआ, वह एक धोखा है. वह बीमार थी, उसकी सुध परिजनों ने नहीं ली, बाद में बेटे ने प्यार दिखाया, लेकिन उसने भी उसे धोखा दिया. ऐसे में कोई भी व्यक्ति टूट जाएगा.

अपने परिजनों के साथ दुर्व्यवहार क्या मानसिक बीमारी है या नैतिकता का क्षरण? 

जिस बच्चे को मां अपनी कोख में 9 महीने पालती है, उसे कुछ रुपयों के लिए मां कैसे गलत हाथों में सौंप देती हैं?  उसकी मानसिक अवस्था पर बात करते हुए डाॅ अमोल रंजन सिंह कहते हैं कि यह कोई मानसिक बीमारी नहीं है. यह परिस्थितियों के अनुसार लिया गया गलत फैसला है. जब इंसान अपनी बातों को शेयर नहीं करता है और खुद में ही निर्णय कर लेता है, तो कई बार वह अपनी समस्याओं का सही समाधान नहीं ढूंढ़ पाता है, इन परिस्थितियों में वह कई बार गलत फैसले लेता है. 

डाॅ भूमिका कहती हैं कि इन परिस्थितियों में इंसान को सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है. यह मार्गदर्शन वही दे सकता है, जो सही–गलत का फर्क समझे. मानसिक रूप से परेशान व्यक्ति को काउंसलर की जरूरत होती है, उसकी समस्याओं का निदान एक मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक के पास होता है. परेशान लोगों को उनसे बात करनी चाहिए, तभी समाज में इस तरह की घटनाएं रूक सकती है.  अन्यथा एक व्यक्ति की परेशानी कभी–कभी पूरे समाज की समस्या बन जाती है और उन्हीं परिस्थितियों में कई घटनाएं ऐसी घटती हैं, जिनमें पूरा का पूरा परिवार आत्महत्या कर लेता है.

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मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाने की सख्त जरूरत

आज भी हमारे समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बहुत कम है. इसी वजह से मानसिक समस्याओं को लोग पागलपन से जोड़ते हैं. यही वजह है कि जो मरीज मनोचिकित्सक के पास जाता है, वो शर्मिंदगी महसूस करता है. डाॅ अमोल रंजन सिंह बताते हैं कि परिस्थितियां काफी बदली हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. मानसिक रूप से परेशान लोगों को सपोर्ट की जरूरत है ना कि उनपर टीका–टिप्पणी करने की जरूरत है. अगर किसी बच्चे को जन्मजात कोई परेशानी है, तो सरकार को वैसे बच्चों के लिए स्कूल और केयरिंग सेंटर बनाने की जरूरत है, ताकि उनका जीवन संवर सके. मानसिक रोग समाज की देन है, इसलिए यह जरूरी है कि उससे निपटने के लिए समाज आगे आए और परेशान लोगों को जादू की झप्पी दे, ताकि उसका मानसिक स्तर सुधरे. पहले रिनपास में ओपीडी में 10–12 हजार मरीज प्रतिवर्ष आते थे, लेकिन अब यह संख्या एक लाख तक पहुंच गई है. जो मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों की जागरूकता को दर्शाता है.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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