काश पटेल ने डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन में बेचा टीशर्ट इनाम में मिला FBI डायरेक्टर का पद

Donald Trump and Kash Patel
Kash Patel : काश पटेल डोनाल्ड ट्रंप के धुर समर्थक. समर्पण इतना की उनके लिए टी-शर्ट भी बेचा और वफादारी इतनी कि भ्रष्टाचार मिटाने का ब्लूप्रिंट तैयार किया. प्रभाव इतना कि डोनाल्ड ट्रंप ने बनाया फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन का डायरेक्टर. योग्यता पर सवाल भी उठ रहे हैं, लेकिन अमेरिकी जनता अपने नव निवार्चित राष्ट्रपति के कामकाज के तरीकों से वाकिफ है. उन्हें पता है कि ट्रंप कैबिनेट में नियुक्ति वफादारी के बल पर ही मिल रही है ना कि योग्यता और अनुभव पर.
Kash Patel : भारतवंशी कश्यप काश पटेल को डोनाल्ड ट्रंप ने अपने मंत्रिमंडल में फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन(FBI) का डायरेक्टर नियुक्त किया है. काश पटेल डोनाल्ड ट्रंप के चहेते हैं और अपने आक्रामक अंदाज के कारण जाने जाते हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर इस बारे में घोषणा की. अपने पोस्ट में डोनाल्ड ट्रंप ने लिखा है- मुझे यह घोषणा करते हुए गर्व हो रहा है कि कश्यप ‘काश’ एफबीआई के अगले निदेशक के रूप में काम करेंगे. काश एक शानदार वकील, जांचकर्ता और ‘अमेरिका फर्स्ट’ के योद्धा हैं. ट्रंप का मानना है कि काश FBI में निष्ठा, बहादुरी और ईमानदारी वापस लाने के लिए अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी के अधीन काम करेंगे.
काश पटेल दूसरे भारतीय अमेरिकी हैं, जिन्हें डोनाल्ड ट्रंप ने अपने मंत्रिमंडल में जगह दी है. काश पटेल की छवि काफी विवादास्पद है और उन्हें जिस पद पर नियुक्त किया गया है, उसका उन्हें अनुभव भी नहीं है. 44 वर्षीय काश पटेल एक वकील हैं और उनके माता-पिता का संबंध गुजरात से रहा है. उनकी नियुक्ति से अमेरिकी चौंके हैं, लेकिन अबतक ट्रंप कैबिनेट में जिस तरह से नियुक्तियां हुईं हैं, उसके बाद काश पटेल की नियुक्ति हैरत में डालने वाली तो नहीं है. पटेल ने अपनी किताब ‘गवर्नमेंट गैंगस्टर्स’ में लिखा है कि एफबीआई में सुधार के लिए कठोर कदम उठाने की जरूरत है. इस किताब को ट्रंप ने अपने अगले कार्यकाल के लिए ब्लूप्रिंट बताया है जो अमेरिका से भ्रष्टाचार का अंत करेगा.
काश पटेल की योग्यता पर सवाल

काश पटेल को डोनाल्ड ट्रंप ने फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के डायरेक्टर की पद तो दे दी है, लेकिन उनके साथ काम चुके लोगों का कहना है कि वे इस पद के योग्य नहीं हैं और उन्हें सिर्फ इसलिए यह पद मिल रहा है क्योंकि वे ट्रंप के प्रति वफादार और उनके चहेते हैं. न्यूयार्क टाइम्स में छपी खबर के अनुसार फ्लोरिडा में एंट्री-लेवल पब्लिक डिफेंडर के रूप में पटेल के सहकर्मी उन्हें एक औसत दर्जे के व्यक्ति के रूप में याद करते हैं. वे बताते हैं कि वे न्याय विभाग के वकीलों के प्रति गहरी दुश्मनी रखते थे. पूर्व पर्यवेक्षक माइकल कारुसो का कहना है कि काश पटेल उन प्रस्तावों को दायर करने से कतराते थे, जिनमें जीत की संभावना नहीं रहती थी. काश पटेल न्याय विभाग में सरकारी वकील के रूप में लगभग तीन साल बिताए थे. काश पटेल का दावा है कि वे 2012 में लीबिया के बेंगाजी में अमेरिकी एंबेसी पर हुए हमले के अपराधियों की तलाश में सरकार के मुख्य वकील थे, जबकि उस वक्त वे न्याय विभाग के एक जूनियर कर्मचारी थे और वे ट्रायल टीम का हिस्सा नहीं थे.
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नून्स मेमो के लेखक हैं काश पटेल
डोनाल्ड ट्रंप को काश पटेल ने नून्स मेमो के मुख्य लेखक के रूप में प्रभावित किया था. जिस वक्त नून्स मेमो सामने आया था उस वक्त काश पटेल हाउस इंटेलिजेंस कमेटी के कर्मचारी थे. 2016 के चुनाव पर रूसी हस्तक्षेप के बारे में प्रकाशित नून्स मेमो न्याय विभाग की जांच को कमजोर करने के हाउस रिपब्लिकन के प्रयास का एक प्रमुख तत्व था. इस मेमो को ट्रंप ने खुफिया एजेंसियों और डेमोक्रेट्स की आपत्तियों के बावजूद सार्वजनिक किया. जिसमें यह बात भी शामिल था कि सरकार ने खुद ट्रंप के अभियान की जासूसी की थी.
काश पटेल ने ट्रंप के समर्थन के लिए बेचा टी-शर्ट

डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल की समाप्ति के बाद काश पटेल ने K$H के लोगों के साथ उनके समर्थन में ट्रंप टी-शर्ट और अन्य सामान बेचा. साथ ही बच्चों के लिए किताबों की एक श्रृंखला भी बेची, जिसमें किंग डोनाल्ड के प्रति सम्मान नजर आता है. काश पटेल डोनाल्ड ट्रंप के पक्के समर्थक हैं और इसी का परिणाम है कि वे एफबीआई के निदेशक नियुक्त हुए हैं.
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By रजनीश आनंद
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रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.
रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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