शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव से मुश्किल में छोटे निवेशक

Published by :Rajneesh Anand
Published at :20 Apr 2026 5:50 AM (IST)
विज्ञापन
share market

शेयर बाजार

Stock market : बड़ी संख्या में डिमैट खाते खोले जाने का मुख्य कारण मजबूत शेयर बाजार, तेज आइपीओ गतिविधियां और खुदरा निवेशकों की बढ़ती भागीदारी रहीं. जब बाजार मजबूत होता है, तब शेयर के दाम बढ़ते हैं या उनमें तेजी की उम्मीद रहती है.

विज्ञापन

Stock market :देश में 2020 से 2025 के बीच लगभग 17 करोड़ डिमैट खाते खोले गये. वित्त वर्ष 2025 में ही चार करोड़ से ज्यादा नये खाते खुले. इस वर्ष मार्च तक करीब 3.2 करोड़ नये डिमैट खाते खुले हैं, जिससे कुल खातों की संख्या बढ़कर 22.5 करोड़ से अधिक हो गयी है. पिछले पांच वर्षों में डिमैट खातों की संख्या पांच गुना से अधिक बढ़ी है. कोविड के दौरान इन खातों में भारी वृद्धि हुई, जब लॉकडाउन में लोगों ने शेयर बाजार में निवेश को रोजगार के समान मानकर खाली समय का सदुपयोग किया. उन्होंने बाजार की लगातार निगरानी कर निवेश से लाभ कमाने का भी प्रयास किया.

बड़ी संख्या में डिमैट खाते खोले जाने का मुख्य कारण मजबूत शेयर बाजार, तेज आइपीओ गतिविधियां और खुदरा निवेशकों की बढ़ती भागीदारी रहीं. जब बाजार मजबूत होता है, तब शेयर के दाम बढ़ते हैं या उनमें तेजी की उम्मीद रहती है. सस्ती दर पर स्मार्टफोन और डाटा उपलब्धता, खाते खोलने की सरल प्रक्रिया और अर्थव्यवस्था का स्थिर रहना भी प्रमुख कारण हैं. मजबूत अर्थव्यवस्था से निवेशकों को अपने निवेश पर बेहतर प्रतिफल प्राप्त होता है.


पर पिछले कुछ समय से बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव बने रहने और शेयरों में अपेक्षित रिटर्न न मिलने से खुदरा निवेशकों का भरोसा शेयर बाजार से कम हो रहा है. इसी वजह से हाल में जारी आइपीओ में औसत आइपीओ आवेदन संख्या 21.3 लाख से घटकर 13 लाख रह गयी है. पिछले वित्त वर्ष में बेंचमार्क इंडेक्स का प्रदर्शन पिछले छह साल में सबसे कमजोर रहा, जिनमें निफ्टी 50 में 5.1 प्रतिशत और बीएसइ सेंसेक्स में 7.1 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई. वहीं, निफ्टी मिडकैप 100 में 1.9 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 लगभग छह फीसदी गिर गया. बेंचमार्क इंडेक्स शेयर बाजार में निवेश के प्रदर्शन को मापने का एक पैमाना है, जो सेंसेक्स या निफ्टी जैसी शीर्ष कंपनियों के शेयरों के समूह का प्रतिनिधित्व करता है. यह निवेशकों को यह बताने में मदद करता है कि उनका पोर्टफोलियो कुल बाजार की तुलना में कैसा प्रदर्शन कर रहा है.


शेयर बाजार में अनिश्चितता बने रहने और आइपीओ की सुस्त लिस्टिंग से भी छोटे निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है और वे आइपीओ से दूरी बना रहे हैं. इस साल जनवरी से मार्च के दौरान 18 में से 10 यानी करीब 60 फीसदी आइपीओ ऐसे रहे, जिनमें रिटेल श्रेणी पूरी तरह से सब्सक्राइब नहीं हुई. यह स्थिति 2024-25 से बिल्कुल अलग है, जब निवेशकों के बीच शेयर खरीदने की होड़ मची रहती थी. यही नहीं, भारतीय शेयर बाजार में 31 मार्च, 2026 तक हुई 18 लिस्टिंग में से 12 शेयर अपने आइपीओ की कीमत इश्यू प्राइस से नीचे खुले, जबकि नौ आइपीओ अब भी अपनी इश्यू प्राइस से नीचे कारोबार कर रहे हैं.

दरअसल ईरान, इस्राइल और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष से वैश्विक अस्थिरता में वृद्धि के कारण निवेशकों का शेयर बाजार से भरोसा कम हो गया है. इससे पहले भी अमेरिका द्वारा भारत समेत कई देशों पर लगाये गये टैरिफ और भू-राजनीतिक तनाव से घरेलू शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहा था. शेयर बाजार से निवेशकों के मुंह मोड़ने के कुछ अन्य कारण भी हैं. जैसे, बाजार का 60 फीसदी से अधिक हिस्सा ओवरवैल्यूड यानी अपनी वास्तविक कीमत से महंगा है. इससे छोटे निवेशकों को डर है कि अब ऊंचे भाव पर शेयर खरीदने से उन्हें नुकसान हो सकता है. वर्ष 2025 में भारतीय बाजार ने निवेशकों को निराश किया, खासकर स्मॉल और मिडकैप शेयरों में भारी गिरावट के कारण, जिससे उनके पोर्टफोलियो घाटे में गये.

पिछले वित्त वर्ष में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से दो लाख करोड़ रुपये से अधिक की बिकवाली की है, जिससे बाजार की स्थिरता पर भरोसा कम हुआ है. कई नये निवेशक बिना पूरी जानकारी के स्मॉलकैप में पैसा लगाते हैं और बाजार की अनिश्चितताओं के कारण घबरा कर गलत समय पर अपने निवेश को निकाल लेते हैं, जिससे बाजार कमजोर होता है और अफरातफरी वाली स्थिति बन जाती है. बढ़ती महंगाई और ब्याज दरों में वृद्धि का कंपनियों की कमाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिससे निवेशकों का आत्मविश्वास घट रहा है.


वैसे, इन सबके बीच अच्छी खबर यह है कि इस वित्त वर्ष में डिमैट खातों की संख्या स्थिर रहने की संभावना है. साथ ही, बचत को प्रोत्साहित करने, डिजिटल तकनीक अपनाने और निवेशकों के बीच जागरूकता बढ़ाने जैसे मजबूत कारणों से नये डिमैट खातों की संख्या में भी वृद्धि देखने को मिल सकती है. हालांकि, कमजोर रिटर्न और आइपीओ गतिविधियों में मंदी के कारण इस वृद्धि की दर वित्त वर्ष 2025 के उच्च स्तर से नीचे रह सकती है. कुल मिलाकर, यही कहा जा सकता है कि वैश्विक अनिश्चितताओं, पश्चिम एशिया में तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, महंगाई के निरंतर बढ़ने, धीमे होते विकास और रुपये के लगातार कमजोर होने का अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है. इससे निवेशक या तो नुकसान झेल रहे हैं या उन्हें वांछित लाभ नहीं मिल पा रहा, जो छोटे निवेशकों के बीच शेयर बाजार के प्रति रुचि कम कर रहा है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

विज्ञापन
Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola