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अदालत में सामाजिक विविधता

Updated at : 25 Jul 2023 8:10 AM (IST)
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न्यायपालिका लोकतंत्र के चार स्तंभों में एक महत्वपूर्ण स्तंभ है. अदालतों को लेकर चाहे जितनी भी शिकायतें हों, आम आदमी के लिए वह अब भी इंसाफ का मंदिर समझा जाता है.

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न्यायपालिका में जजों की नियुक्तियों को लेकर पिछले कुछ समय से सवाल उठते रहे हैं. पिछले सप्ताह लोक सभा में ऐसा ही एक सवाल उठा. एआइएमआइएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने पूछा कि उच्च न्यायालय में वर्ष 2018 के बाद से जिन जजों की नियुक्ति हुई है, क्या उनमें से 79 फीसदी ऊंची जाति के हैं? केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने जवाब में बताया कि 2018 के बाद से अब तक देश के विभिन्न हाई कोर्टों में 604 जज नियुक्त हुए हैं, और इनमें से 454 सामान्य वर्ग के हैं.

यानी, उच्च न्यायालय में पिछले पांच वर्षों में जितने भी जजों की नियुक्तियां हुई है उनमें से 75 फीसदी से ज्यादा जज ऊंची जाति के हैं. मुद्दा स्पष्ट है. हमारी अदालतों में हमारी आबादी का असल प्रतिनिधित्व नहीं दिखाई देता. यही वजह है कि कभी दलित जजों की, तो कभी महिला, तो कभी अल्पसंख्यक जजों की संख्या को लेकर नियुक्ति का मुद्दा उठता है. ओवैसी ने सामाजिक विविधता को स्थापित करने में कॉलेजियम सिस्टम के प्रभाव को लेकर भी सवाल पूछा. इस व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों का चुनाव जज ही करते हैं.

कॉलेजियम की सिफारिश के आधार पर सरकार जजों को नियुक्त करती है. कानून मंत्रालय ने इस बात का संज्ञान लिया है कि तीन दशक से जारी इस व्यवस्था के बावजूद उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की कमी है. कानून मंत्री ने साथ ही स्पष्ट किया कि संविधान के तहत न्यायिक नियुक्तियों में किसी जाति या समुदाय के लिए आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. लेकिन, सरकार ने साथ ही सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से कम प्रतिनिधित्व वाली पृष्ठभूमि से आये उम्मीदवारों पर ध्यान देने का अनुरोध किया है.

न्यायपालिका लोकतंत्र के चार स्तंभों में एक महत्वपूर्ण स्तंभ है. अदालतों को लेकर चाहे जितनी भी शिकायतें हों, आम आदमी के लिए वह अब भी इंसाफ का मंदिर समझा जाता है. न्यायपालिका में सामाजिक विविधता कायम करने से इस संस्थान के प्रति लोगों का भी भरोसा बढ़ेगा, और अदालतें भी सही मायने में देश का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होंगी. न्यायपालिका में जजों की नियुक्तियों पर पूछे जाने वाले हर सवाल को सकारात्मक नजरिये से देखा जाना चाहिए. इन्हें न्यायपालिका और विधायिका के टकराव का नहीं, बल्कि एक बुनियादी मुद्दे का हल निकालने का अवसर समझा जाना चाहिए.

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