पैदल चलने का अधिकार गाड़ी चलाने के अधिकार से बड़ा है

Updated:
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट

right-to-walk : वर्ष 2019 से 2024 के बीच 1.8 लाख से अधिक पैदल यात्रियों की जान सड़क हादसों में गयी है, जिसमें से राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुई मौतों का आंकड़ा 30 प्रतिशत से अधिक है. यानी, सड़क दुर्घटना का शिकार बन रहा हर तीसरा पैदल यात्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर जान गंवा रहा है.

विज्ञापन

पांच साल का मासूम बच्चा अपने पिता का हाथ थामे स्कूल जा रहा था. टैंकर की चपेट में आने से उसकी जान चली गयी. इस दिल दहला देने वाली घटना ने सर्वोच्च न्यायालय को एक ऐसा फैसला लिखने पर मजबूर कर दिया, जो आने वाली पीढ़ियों तक याद रखा जायेगा. जजों के अनुसार, मनुष्य ने पहले चलना सीखा, पहिया तो बाद में आया. लेकिन आज हमारी सड़कें सिर्फ गाड़ियों के लिए बनती हैं. जो थोड़ा-बहुत फुटपाथ बचा है, उस पर भी दुकानें, दोपहिया वाहन और अतिक्रमण का बोलबाला है. राष्ट्रीय राजमार्ग पैदल यात्रियों के लिए कहीं अधिक जानलेवा साबित हो रहे हैं.

वर्ष 2019 से 2024 के बीच 1.8 लाख से अधिक पैदल यात्रियों की जान सड़क हादसों में गयी है, जिसमें से राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुई मौतों का आंकड़ा 30 प्रतिशत से अधिक है. यानी, सड़क दुर्घटना का शिकार बन रहा हर तीसरा पैदल यात्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर जान गंवा रहा है. अमेरिका में सड़कों पर बड़े बोनट वाली एसयूवी और पिकअप ट्रकों की बढ़ती संख्या पैदल चलने वालों के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है. वर्ष 2009 के बाद हर साल सड़क हादसे में मरने वाले राहगीरों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है.

जस्टिस पारदीवाला संवेदनशील और न्यायप्रिय जज हैं, जो आउट आफ बॉक्स नजरिये से आम जनता से जुड़े मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करते हैं. जजों ने कहा कि पैदल चलने की क्रिया ने हमेशा कल्पनाशीलता को प्रेरित किया है. इसकी सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक व सुधारवादी जड़ें हैं. पैदल चलना कई लोगों के लिए गतिमान अवस्था में ध्यान है, जिज्ञासुओं के लिए खोज है और तेज सामाजिक-राजनीतिक सोच वाले लोगों के लिए एकजुट करने वाली रणनीति है. इसने निश्चित रूप से स्वतंत्रता संग्राम के कुछ आदर्शों को प्रेरित और प्रज्वलित किया, जिनका सम्मान करना और उन्हें संजोना हमारा कर्तव्य है, जैसा संविधान के अनुच्छेद 51-ए में कहा गया है.

संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत लोगों के घूमने-फिरने का अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार को मान्यता देते हुए ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार माना है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंदूरकर की बेंच ने साफ कहा कि पैदल चलने का अधिकार गाड़ी चलाने के विशेष अधिकार से बड़ा है. अनुच्छेद 39 के तहत जजों ने कहा कि संसाधनों के समान वितरण के अनुसार, सड़कों पर बड़ी गाड़ियों के साथ फुटपाथ पर आम लोगों को सुरक्षित चलने का अधिकार मिलना चाहिए. इस मामले में जिला अदालत, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पीड़ित पक्ष को 10 साल बाद न्याय मिला है. यह प्रश्न भी समीचीन है कि जिस स्पीड से हम गाड़ियां चलाते हैं, उतनी स्पीड से न्याय क्यों नहीं मिलता?


महानगरों की सार्वजनिक पार्किंग में प्रति पार्किंग 15 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं. उसके बावजूद दुकानदार सड़कों के सामने गाड़ी खड़ी करना अपना मौलिक अधिकार मानते हैं. सड़कों के किनारे पार्किंग से आम जनता के फुटपाथ पर चलने का अधिकार खत्म हो जाता है. तेज रफ्तार वाली सड़कों को अर्थव्यवस्था के विकास का पैमाना माना जा रहा है. सड़कों के किनारे फुटपाथ कितने बनाये जा रहे हैं, इसका कोई आंकड़ा नहीं है. हाइवे और ओवरब्रिज हमारे इंजीनियरिंग माइंडसेट को दर्शाते हैं, जिन्हें आम जनता के आवागमन के लिहाज से बनाने की जरूरत है.

बड़े स्कूलों के खुलने और बंद होने के समय 500 मीटर के दायरे में गाड़ियों का यातायात प्रतिबंधित होना चाहिए. इससे सड़कों में गाड़ियों की भीड़ कम होने के साथ बच्चों की सुरक्षा भी बढ़ेगी. अब बात सुप्रीम कोर्ट के फैसले की. इस फैसले को लागू करने में अनेक मुश्किलें और कानूनी विरोधाभास हैं. फुटपाथ पर रेहड़ी लगाने वाले लोगों को स्ट्रीट वेंडर एक्ट के तहत व्यवसाय का अधिकार है. संविधान के अनुच्छेद 51-ए में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का विवरण है. उसके अनुसार, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और लोगों को हिंसा से बचाना सभी नागरिकों की जिम्मेदारी है. लोगों के फुटपाथ पर चलने के अधिकार और गरीबों की आजीविका के अधिकार में संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है.


देश की राजधानी दिल्ली में नलों से सीवर लाइन का पानी आ रहा है. शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई और शुद्ध पेयजल लोगों का संवैधानिक अधिकार है, जो व्यावहारिक धरातल पर उन्हें नहीं मिल रहा. मौलिक अधिकारों के हनन के लिए सरकारी विभागों को दंडित करने या उनसे जुर्माना वसूलने के लिए कोई व्यावहारिक तंत्र नहीं है. इस तरह की अव्यवस्था के कारण लोगों में असंतोष व्याप्त हो रहा है. इस असंतोष से साफ है कि लोगों को नये नियम और फैसलों की बजाय एक्शन और जवाबदेही की अपेक्षा है. फुटपाथ पर अतिक्रमण और गंदगी खत्म करने का दायित्व नगर पालिका और पंचायतों के कंधों पर है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार केंद्रीय स्तर पर कोई कानून संसद से ही बनेगा. कानून न बनने पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का केंद्र, राज्य और पंचायत स्तर पर पालन सुनिश्चित करवाना टेढ़ी खीर ही साबित हो सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

विज्ञापन
विराग गुप्ता

लेखक के बारे में

By विराग गुप्ता

लेखक और वकील

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola