सिमडेगा में देशज ज्ञान परंपरा संरक्षण की अनूठी पहल

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मुंडा आदिवासी महिेलाएं

indigenous knowledge : हमारा देश लंबे समय तक औपनिवेशिक दासता के अधीन रहा और आज भी समाज के अंदर औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की बहस जारी है. उपरोक्त संदर्भों में झारखंड के सिमडेगा जिले में किये गये प्रयास का उल्लेख किया जाना चाहिए, जिसे एक समय अविभाजित बिहार में राजकीय कर्मचारियों-अधिकारियों द्वारा ‘कालापानी’ कहा जाता था.

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indigenous knowledge : केन्या के मशहूर लेखक और संस्कृतिकर्मी, न्गुगी वा थ्यांगो अपनी पुस्तक ‘औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति’ में कहते हैं कि किसी भी समाज की भाषा एवं संस्कृति पर नियंत्रण कर उसे स्थायी रूप से गुलाम बनाया जाता है. अपने लेखन के आरंभिक दिनों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करने वाले न्गुगी ने बाद में अंग्रेजी भाषा छोड़ अपनी मातृभाषा ‘गिकुयु’ में लेखन किया. वास्तव में, मुक्ति का प्रश्न जितना राजनीतिक होता है, उससे कहीं अधिक सांस्कृतिक. राष्ट्रीय आंदोलनों द्वारा औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुए राष्ट्रों के लिए भाषा, संस्कृति और जीवनशैली का प्रश्न ही मुख्य प्रश्न होना चाहिए.


हमारा देश लंबे समय तक औपनिवेशिक दासता के अधीन रहा और आज भी समाज के अंदर औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की बहस जारी है. उपरोक्त संदर्भों में झारखंड के सिमडेगा जिले में किये गये प्रयास का उल्लेख किया जाना चाहिए, जिसे एक समय अविभाजित बिहार में राजकीय कर्मचारियों-अधिकारियों द्वारा ‘कालापानी’ कहा जाता था. इस अंचल में अंग्रेजों की औपनिवेशिक सत्ता ने 1915 में पहली बार सब डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) कार्यालय की स्थापना की थी. अंग्रेजों ने भारत के संसाधनों और मानव संसाधनों का जमकर दोहन किया है, इसका गवाह सिमडेगा जिला भी है. जब प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा, तब भारत की ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को जर्मनी के खिलाफ फ्रांस के पक्ष में लड़ने के लिए भेजा था.

वर्ष 1915 में स्थापित यहां के एसडीएम कोर्ट के अभिलेखागार में यहां से आदिवासी युवाओं को फ्रांस भेजे जाने के दस्तावेज उपलब्ध हैं. प्रथम विश्व युद्ध के मध्य में फ्रांस की मदद के लिए यहां से ‘लेबर कॉर्प्स’ की कई यूनिट भेजी गयी थी. सिमडेगा के सब डिविजनल मजिस्ट्रेट को भेजे गये दस्तावेजों से पता चलता है कि इन यूनिटों में सिमडेगा के आदिवासी शामिल थे. सिमडेगा से फ्रांस की जमीन पर लड़ने की सूचना केवल अभिलेखीय दस्तावेज नहीं देते, यहां के आदिवासियों की स्मृतियों में भी यह शामिल है. फ्रांस की ओर से युद्ध के लिए गये लोगों द्वारा बनाये गीत यहां आज भी गाये जाते हैं.

यहां के मुंडा आदिवासी समाज द्वारा गाये जाने वाले एक लोकगीत में इसका उल्लेख मिलता है. गीत का भावानुवाद है- ‘फ्रांस देश गये थे/लोग कहते हैं बहुत खुशहाल देश है/लेकिन वहां खुशी नहीं है/वहां दुख ही दुख है.’ विदित है कि अभिलेखीय दस्तावेज शासकीय स्थिति दर्शाते हैं और मौखिक परंपरा संवेदनात्मक स्थिति. लोक की संवेदनात्मक स्थिति ही औपनिवेशिक सत्ता का निषेध करती है. उपरोक्त संदर्भों में सिमडेगा जिले की उपायुक्त कंचन सिंह एवं युवा उप विकास आयुक्त दीपंकर चौधरी के नेतृत्व में प्रशासन ने ‘हेरिटेज सेंटर-सह-संग्रहालय’ बनाकर मिसाल कायम की है.


महर्षि अरविंद चेतना के विकास को मनुष्य के विकास का सर्वोत्तम लक्ष्य कहा करते थे. यहां कोर्ट ऑफिस के औपनिवेशिक शासकीय इकाई को आम जनता की विरासतों का केंद्र बनाकर उसकी चेतना को संरक्षित करने का अनूठा कदम उठाया गया है. इसकी स्थापना के एक सौ दस वर्ष बाद उसे स्थानीय-आदिवासी-सदान समुदायों की संस्कृति का केंद्र बनाया गया है. संभवतः, यह देश में अपनी तरह का अकेला हेरिटेज क्लब है, जो उपनिवेशवादी मानसिकता से मुक्ति के संदर्भ में समाज के सबसे वंचित तबकों और हाशिये पर रह गये समुदायों की ज्ञान परंपरा पर आधारित है. हेरिटेज सेंटर में 1915 से आरंभ हुए कोर्ट के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं. इसमें ऊपर वर्णित मुंडारी आदिवासी गीत भी शामिल है. इस तरह के गीतों की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक व्याख्या की जानी चाहिए. लिखित साहित्य को बड़ा और मौखिक साहित्य को कमतर मानने की सोच भी औपनिवेशिक मानसिकता का ही सूचक है.

लिखित साहित्य यदि ताकतवर सामाजिक वर्ग की भाषा का हो, तो यह स्वाभाविक रूप से महत्ता प्राप्त कर लेता है. पर आदिवासियों, किसानों, कारीगरों, श्रमिकों की वाचिक परंपरा की अभिव्यक्ति को न तो सांस्कृतिक महत्व दिया जाता है, न ही अकादमिक. प्रथम विश्वयुद्ध को लेकर बड़े पैमाने पर विश्व साहित्य की रचना हुई है. अर्नेस्ट हेमिंग्वे का प्रथम विश्व युद्ध पर आधारित उपन्यास ‘ए फेयरवेल टू आर्म्स’ 1929 में प्रकाशित हुआ था. चंद्रधर शर्मा गुलेरी की पहले विश्व युद्ध पर आधारित कहानी ‘उसने कहा था’ 1915 में प्रकाशित हो चुकी थी. ऐसी कई रचनाएं हैं, जो युद्ध की विभीषिका का चित्रण कर मानवता के लिए विचार उत्पादित करती हैं. आदिवासी-सदान समुदायों की युद्ध विरोधी रचनाओं को क्या इसी श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए?


नि:संदेह, जब हम देशज ज्ञान परंपरा और मनुष्यता की बातें करते हैं, तो प्राथमिक रूप से लोक जन की सामूहिक अभिव्यक्ति को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए. सिमडेगा में नवनिर्मित हेरिटेज सेंटर को इसी दिशा में की गयी पहल माना जाना चाहिए. आज के साइबर जमाने में तकनीकों की अबाध गति के साथ-साथ उपनिवेशवादी मानसिकता से मुक्ति का साझा कार्यक्रम जरूरी है. यह देशज ज्ञान परंपराओं के संरक्षण के साथ किया जाना चाहिए. हमें अपनी मौलिकता और सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता पर लगातार चिंतन करते हुए विकास की अवधारणा को स्थानीय जनों पर केंद्रित करना चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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डॉ अनुज लुगुन

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By डॉ अनुज लुगुन

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