शिक्षा सुधार के साथ रोजगार सुधार भी हो

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वी अनंत नागेश्वरन

Education reforms : मुख्य आर्थिक सलाहकार की चेतावनी को इंजीनियरिंग या प्रबंधन शिक्षा के अंत के रूप में नहीं देखना चाहिए. जो देश अब भी सड़कें, पुल, बंदरगाह, रेलवे, जल प्रणालियां, आवास, लॉजिस्टिक्स पार्क और जलवायु अनुकूल शहर बना रहा है, वह यह नहीं कह सकता कि इंजीनियरिंग समाप्त हो चुकी है.

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Education reforms : मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने कहा है कि सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग डिग्रियों और एमबीए का महत्व तेजी से समाप्त हो रहा है. एआइ अब बौद्धिक कार्यों की अर्थव्यवस्था को बदल रही है. एआइ उपकरणों की मदद से एक अनुभवी कर्मचारी वह कार्य कर सकता है, जिसके लिए पहले दर्जनों कर्मचारियों की जरूरत होती थी. इसका असर छंटनी में नहीं दिखेगा. यह प्रवेश द्वारों के चुपचाप बंद हो जाने के रूप में सामने आ सकता है. आइटी कंपनियों द्वारा भर्ती में आयी गिरावट इसका प्रमाण है.


मुख्य आर्थिक सलाहकार की चेतावनी को इंजीनियरिंग या प्रबंधन शिक्षा के अंत के रूप में नहीं देखना चाहिए. जो देश अब भी सड़कें, पुल, बंदरगाह, रेलवे, जल प्रणालियां, आवास, लॉजिस्टिक्स पार्क और जलवायु अनुकूल शहर बना रहा है, वह यह नहीं कह सकता कि इंजीनियरिंग समाप्त हो चुकी है. बल्कि अच्छे इंजीनियरों की मांग और बढ़ेगी. भविष्य का सिविल इंजीनियर केवल कंक्रीट और सर्वेक्षण के पुराने सूत्र सीखकर नहीं चल सकता. उसे जलवायु जोखिम, जल संकट, शहरी बाढ़, हरित निर्माण सामग्री, जीआइएस मानचित्रण, परियोजना वित्त, खरीद प्रक्रिया और जीवनचक्र रखरखाव को समझना होगा. मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों को रोबोटिक्स, सटीक विनिर्माण, ऊर्जा भंडारण, ग्रिड प्रणालियों और नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण की समझ होनी चाहिए.

कंप्यूटर इंजीनियरों को नियमित कोडिंग से आगे बढ़कर सिस्टम सोच, डाटा आर्किटेक्चर, साइबर सुरक्षा और वास्तविक क्षेत्रों में एआइ के अनुप्रयोगों पर ध्यान देना होगा. यही बात एमबीए पर भी लागू होती है. प्रत्येक जिले को ऐसे लोगों की जरूरत है, जो डाटा का विश्लेषण कर सकें, निवेश योजनाएं बना सकें, परियोजनाओं का मूल्यांकन, परिणामों की निगरानी, खरीद प्रक्रियाओं में सुधार, सार्वजनिक परिसंपत्तियों का प्रबंधन और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर सकें. क्यों न जिला योजना कार्यालयों को अर्थशास्त्र, प्रबंधन, सार्वजनिक वित्त, सांख्यिकी, जीआइएस, अवसंरचना योजना और सामाजिक क्षेत्र वितरण में प्रशिक्षित युवा पेशेवरों से सशक्त बनाया जाये? एक जैसे कॉरपोरेट पदों के पीछे भागने वाले सामान्य एमबीए तैयार करने के बजाय हम जिला विकास विश्लेषक, नगर वित्त सहयोगी, खरीद विशेषज्ञ, स्वास्थ्य प्रणाली प्रबंधक, शिक्षा डाटा अधिकारी और जलवायु अनुकूलन अधिकारी तैयार कर सकते हैं. ऐसी टीमें सार्थक रोजगार उत्पन्न कर सकती हैं.


पाठ्यक्रम सुधार और रोजगार संरचना को साथ-साथ चलना होगा. केवल कॉलेजों से पाठ्यक्रम अद्यतन करने के लिए कहना पर्याप्त नहीं है. श्रम बाजार को ऐसे पद भी बनाने होंगे, जो अद्यतन कौशलों को उचित महत्व दें. यदि कॉलेज जलवायु अनुकूल निर्माण सिखायें, पर लोक निर्माण विभाग पुरानी योग्यताओं के आधार पर भर्ती करे, तो कुछ नहीं बदलेगा. यदि एमबीए के छात्र डाटा विश्लेषण सीखें, पर जिला प्रशासन में परिणाम निगरानी या जीआइएस मानचित्रण के लिए पद ही न हों, तो वह कौशल व्यर्थ चला जायेगा. रोजगार सुधार के बिना शिक्षा सुधार केवल प्रमाणपत्र बनाने वाली एक और फैक्टरी बनकर रह जायेगा. मुख्य आर्थिक सलाहकार की यह बात भी सही है कि हमें कुशल व्यवसायों और तकनीकी कार्यों को गंभीरता से लेना चाहिए. वेल्डिंग, प्लंबिंग, बढ़ईगीरी, विद्युत कार्य, देखभाल सेवाएं, नर्सिंग, आतिथ्य और पाक कला जैसे कार्यों में मानवीय उपस्थिति, निर्णय क्षमता, कौशल और विश्वास की जरूरत पड़ती है. इन्हें एआइ आसानी से प्रतिस्थापित नहीं कर सकता. पर यहां भी सावधानी जरूरी है.

दो दशकों तक अपने बच्चे को इंजीनियर या एमबीए बनने के लिए प्रेरित करने वाला एक मध्यवर्गीय अभिभावक अचानक वेल्डिंग को आकर्षक विकल्प नहीं मानेगा. अपने यहां डिग्री केवल एक योग्यता नहीं है. यह प्रतिष्ठा, विवाह मूल्य और शारीरिक श्रम से जुड़ी असुरक्षा के विरुद्ध सुरक्षा का प्रतीक भी है. जर्मनी, स्विट्जरलैंड, जापान या दक्षिण कोरिया में कुशल व्यवसायों को सम्मान इसलिए है, क्योंकि संस्थानों ने उन्हें सम्मानजनक बनाया है. यूरोप में एक सदी से अधिक समय से गिल्ड, चैंबर, प्रशिक्षुता प्रणाली, लाइसेंसिंग मानदंड और वेतन वार्ता संस्थाएं मौजूद हैं. भारत में ऐसा कोई पारिस्थितिकी तंत्र नहीं है. हमारे पास उत्कृष्ट कारीगर तो हैं, पर प्लंबरों, इलेक्ट्रिशियनों, वेल्डरों, बढ़इयों या मरम्मत तकनीशियनों के लिए मजबूत पेशेवर गिल्ड नहीं हैं. हमारे पास आइटीआइ और कौशल विकास योजनाएं हैं, पर इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा कमजोर है. भारत का श्रमबल अब भी अत्यधिक अनौपचारिक और अपंजीकृत है. जबकि जर्मनी के कानून के अनुसार कंपनियों के बोर्ड में श्रमिक प्रतिनिधित्व अनिवार्य है.


नोएडा और गुरुग्राम-मानेसर औद्योगिक क्षेत्र में पिछले दिनों हुआ श्रमिक असंतोष इसकी याद दिलाता है. ऑटोमोबाइल, वस्त्र और संबंधित विनिर्माण क्षेत्रों के अनेक श्रमिकों ने कथित रूप से लगभग 20,000 रुपये या उससे अधिक मासिक वेतन की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया. ये कारखाना श्रमिक थे, जो कह रहे थे कि उनका वेतन जीवन निर्वाह के स्तर से नीचे है. आइटी क्षेत्र अपेक्षाकृत औपचारिक और वैश्विक रूप से जुड़ा हुआ श्रम बाजार बन गया. जबकि औद्योगिक और तकनीकी श्रमिक अक्सर अनौपचारिकता, ठेका श्रम और कमजोर सामूहिक आवाज के बीच फंसे रहते हैं. इससे भी गहरी समस्या स्नातक बेरोजगारी का संकट है. लाखों युवा स्नातक न काम कर रहे हैं, न ही अनुभव प्राप्त कर रहे हैं. वे केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं.

यहां निजी क्षेत्र की प्रारंभिक नौकरियां कम वेतन और असुरक्षा प्रदान करती हैं, जबकि सरकारी नौकरियां सम्मानजनक वेतन, प्रतिष्ठा, सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण देती हैं. यही तर्क विश्वविद्यालयों पर भी लागू होता है. इंटरनेट, मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स, बूटकैंप (संक्षिप्त टेक प्रशिक्षण कार्यक्रम) और एआइ शिक्षकों के कारण उच्च शिक्षा को बार-बार अप्रासंगिक बताया जाता रहा है. फिर भी उच्च शिक्षा का भारी विस्तार हुआ है. मुद्दा यह है कि क्या विश्वविद्यालय एआइ को सीखने के सहयोगी के रूप में अपनायेंगे, या उसे नकल का साधन ही मानते रहेंगे.


मुख्य आर्थिक सलाहकार की चेतावनी महत्वपूर्ण है. पर संदेश डिग्री को दफनाने का नहीं, बल्कि उसे पुनः डिजाइन करने का होना चाहिए. तकनीकी और व्यावसायिक कौशलों को औपचारिक मान्यता और सामाजिक सम्मान मिलना चाहिए. देश का रोजगार संकट तब हल होगा, जब एक युवा सिविल इंजीनियर, प्रोग्रामर, नर्स, शेफ, वेल्डर, जिला योजनाकार, तकनीशियन, शिक्षक, उद्यमी या सिविल सेवक बन सके-और हर पेशा सम्मान, आय, सुरक्षा तथा उन्नति के अवसर प्रदान करे.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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अजित रानाडे

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By अजित रानाडे

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