आंतरिक और बाहरी दबावों के आगे झुका अमेरिका

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डोनाल्ड ट्रंप

US bowed : पश्चिम एशिया में शांति बहाली की जिम्मेदारी केवल पाकिस्तान या अमेरिका, ईरान और इस्राइल पर नहीं रहनी चाहिए, बल्कि बाकी के देशों को भी अपनी तरफ से कोशिश करनी चाहिए कि युद्धविराम का यह जो अवसर मिला है, उससे क्षेत्र में दीर्घकालिक व स्थायी शांति स्थापना की राह बन सके.

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us iran deal : फ्रांस में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान युद्धविराम समझौते पर अमेरिका और ईरान के हस्ताक्षर होने के तत्काल बाद स्विट्जरलैंड में अगले दौर की वार्ता में भी दोनों के बीच जिस तरह कुछ सहमति बनती दिख रही है, उससे दुनिया ने राहत की सांस ली है. फ्रांस में चौदह बिंदुओं वाले जिस समझौते पर दोनों पक्षों ने दस्तखत किये, उसमें हर मोर्चे पर संघर्ष का अंत, दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे की संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, अधिकतम 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते पर बातचीत पूरी करने की कोशिश, अमेरिका द्वारा 30 दिनों के भीतर नौसैनिक नाकाबंदी पूरी तरह समाप्त करना, होर्मुज जलडमरूमध्य से व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही, ईरान के पुनर्निर्माण के लिए धन, ईरान पर लगे प्रतिबंध समाप्त होना, ईरान द्वारा परमाणु क्षमता हासिल नहीं करना, संवर्धित यूरेनियम का समाधान होने तक परमाणु कार्यक्रम यथास्थिति में बनाये रखना और इस दौरान तेल व पेट्रोलियम उत्पादों और उनसे जुड़ी सेवाओं के लिए ईरान को छूट मिलना, ईरान की फ्रीज हुई संपत्ति रिलीज करना आदि शामिल हैं. इस बीच अमेरिका ने ईरानी तेल पर लागू प्रतिबंध को आगामी अगस्त तक हटा लिया है.


समझौते में पाकिस्तान की भूमिका अहम रही है और लेबनान को समझौते में शामिल करने की उसकी बात भी मानी गयी है. हालांकि, समझौते में इस्राइल शामिल नहीं है. लेबनान को समझौते में शामिल करना ईरान के लिए संतोष की बात होनी चाहिए. संतोष की दूसरी बात यह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में जिस तरीके से सैकड़ों जहाज रुके हुए थे, उनकी आवाजाही फिर शुरू हो जायेगी. हालांकि इसमें अभी 30 दिन का समय तो लगेगा ही. पर इतना तो तय है कि बीते कई महीनों से जो अनिश्चितता बनी हुई थी, वह अब समाप्त हो गयी है. अब चूंकि समझौता हो गया है, तो इसे बनाये रखने के लिए भारत, चीन, रूस समेत नाटो के सदस्यों को सक्रियता दिखाते हुए पश्चिम एशिया में सुरक्षा और शांति पर ध्यान देना होगा, ताकि समझौते की शर्तों का उल्लंघन न हो.

पश्चिम एशिया में शांति बहाली की जिम्मेदारी केवल पाकिस्तान या अमेरिका, ईरान और इस्राइल पर नहीं रहनी चाहिए, बल्कि बाकी के देशों को भी अपनी तरफ से कोशिश करनी चाहिए कि युद्धविराम का यह जो अवसर मिला है, उससे क्षेत्र में दीर्घकालिक व स्थायी शांति स्थापना की राह बन सके. यहां कतर की चर्चा भी जरूरी है. भले ही सीधे तौर पर कतर इस समझौते में शामिल नहीं रहा है, पर शांति के लिए प्रयासरत तो रहा ही है. ऐसा लगता है कि उसने अपनी तरफ से अमेरिका और ईरान को यह आश्वासन देने की कोशिश जरूर की है कि अपने सैन्य अड्डे का इस्तेमाल वह ईरान पर हमले के लिए नहीं करने देगा, इसलिए ईरान कतर पर हमला न करे. वैसे भी कतर और ईरान के संबंध काफी अच्छे रहे हैं. वहीं, इस्लामाबाद सऊदी अरब से अपने अच्छे संबंध का हवाला देते हुए संभवत: सऊदी अरब और ईरान, दोनों को यह समझाने में सफल रहा है कि सऊदी के सैन्य अड्डे ईरान के खिलाफ उपयोग में नहीं लाये जायेंगे.


अब, जब मसला सुलझ रहा है, तब यह सवाल उठता है कि अमेरिका ने ईरान पर हमला क्यों किया था. तो उसके कई कारण थे. पहली बात, वह ईरान में सत्ता बदलना चाहता था. दूसरी, वह उसके यूरेनियम भंडार समाप्त कर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए समाप्त करना चाहता था. तीसरी, वह ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को पूरी तरह ध्वस्त करना चाहता था और चौथी बात, वह ईरान की नीतियों में बदलाव कर वहां किसी ऐसी सरकार को बिठाना चाहता था, जिसके जरिये ईरान अब्राहम एकॉर्ड में शामिल हो जाये. इनमें से किसी भी मामले में अमेरिका को सफलता नहीं मिली है. जहां तक इस्राइल की बात है, तो कहा जा सकता है कि वह यहां अलग-थलग पड़ गया है.

असल में ट्रंप द्वारा समझौता करने से इस्राइल की सरकार खुश नहीं है. हालांकि, अमेरिका समय-समय पर इस्राइल को सूचित करता रहा है. फिर भी यहां एकतरफा संवाद ही रहा है और इस बार इस्राइल की बात नहीं मानी गयी है. जबकि ट्रंप ने जिस तरह अपनी निजी जिम्मेदारी समझते हुए पश्चिम एशिया में शांति बहाली के प्रयास किये, उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए. समझौते के तहत ईरान को उसकी आर्थिक स्थिति बेहतर करने और पुनर्निर्माण के लिए धन दिया जाना है. समझौते की यह शर्त काफी व्यावहारिक है, क्योंकि ईरान बुरे दौर से गुजर रहा है. युद्धविराम समझौते के जरिये इस क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित होने की उम्मीद बंधी है. यहां ईरान की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है कि वह हिज्बुल्ला को समझाये कि वह इस्राइल पर हमला बंद करे. दूसरी ओर ट्रंप को इस्राइली सरकार को समझाना होगा कि वह लेबनान पर हमला बंद करे और क्षेत्र में शांति लाने का प्रयास करे.


यहां इस बात का जिक्र भी आवश्यक है कि आखिर किस तरह यह समझौता हो पाया, क्योंकि पिछले काफी समय से दोनों देशों के बीच बात बनते-बनते रह जाती थी. अमेरिका की बात करें, तो युद्ध के कारण डेमोक्रेट्स तो उनसे नाराज थे ही, ‘मागा’ (‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’) के उनके जो समर्थक हैं, उनमें से भी 20-30 प्रतिशत उनसे दूर हो गये थे और कुछ उनके विरोध में आ गये थे. ईरान पर हमले से अमेरिका की लिबरल-डेमोक्रेटिक छवि को भी नुकसान पहुंच रहा था. एक और कारण खाड़ी के देशों का अमेरिका पर दबाव था कि वह क्षेत्र में शांति स्थापना के लिए कदम उठाये, क्योंकि इन देशों ने अरबों खर्च कर अपनी सुरक्षा और शांति के लिए अपने यहां अमेरिकी सैन्य अड्डे बनाये हैं, पर ईरान ने उन्हें निशाना बनाया और नष्ट कर डाला. ऐसे में इन देशों में यह धारणा बनने लगी थी कि अमेरिका जब अपने आपको ही नहीं बचा सका, तो उन्हें क्या बचायेगा. ईरान की बात करें, तो उसके लगभग सारे नेता युद्ध में मारे जा चुके थे और जो नये नेता थे, वे छिपकर बैठे थे. ईरान इस गतिरोध से बाहर निकलना चाहता था. फिर ईरान की सत्ता ने जिस तरह अपने आलोचकों को मार डाला, उसे लेकर भी वहां के लोगों के मन में रोष था. तीसरी बात, ईरान के कूटनीतिक वार्ताकार इस कोशिश में लगे हुए थे कि शांति की दिशा में चल रही बातचीत सफल हो जाये. उधर आइआरजीसी के युवा अधिकारियों को भी समझ में आने लगा था कि युद्ध से ईरान को कोई लाभ नहीं होने वाला है. उल्टे इससे ईरान समेत पूरा क्षेत्र तबाह हो जायेगा. अंत में, हमें इस बहस में नहीं पड़ना चाहिए कि समझौते से किसकी जीत हुई है और किसकी हार. बड़ी बात यह है कि शांति समझौते से मानवता की जीत हुई है.
(बातचीत पर आधारित)
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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