फोन की बैटरी 1% होते ही क्यों होने लगती है बेचैनी और बढ़ जाती है दिल की धड़कन? इसके पीछे छिपा है दिमाग का दिलचस्प राज
फोन की बैटरी कम होने से बेचैनी क्यों होती है? AI image
Do You Know: क्या आपके फोन की बैटरी 1 परसेंट पर आते ही दिल की धड़कन तेज होने लगती है? अगर हां, तो आप अकेले नहीं हैं. इसके पीछे सिर्फ आदत नहीं, बल्कि दिमाग की कुछ दिलचस्प ट्रिक्स और मेंटल कंडीशंस काम करती हैं. जानिए आखिर बैटरी लो होते ही इतनी बेचैनी क्यों होने लगती है.
Do You Know: आज के समय में अगर देखा जाए, तो स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का एक सबसे जरूरी हिस्सा बन चुका है. सुबह सोकर उठने से लेकर रात को सोने तक, हमारा फोन ही हमारे साथ पूरे दिन रहता है. अगर आप भी पूरे दिन स्मार्टफोन को अपने साथ रखते हैं, तो आज के इस आर्टिकल के साथ आप काफी आसानी से रिलेट कर सकते हैं. अगर आप पूरे दिन स्मार्टफोन में घुसे रहते हैं, तो आपके साथ आए दिन यह होता ही होगा कि जैसे ही आपके फोन की बैटरी 1 परसेंट पर पहुंचती है, आपके दिल की धड़कन तेज होने लगती होगी. बैटरी डाउन होते ही एक अजीब सी बेचैनी और घबराहट होने लगती है, मानो कोई बड़ी मुसीबत आने वाली हो. साइंस और साइकोलॉजी की लैंग्वेज में इसे सिर्फ एक आम बात नहीं माना जाता है, बल्कि इसके पीछे हमारे दिमाग की एक बेहद दिलचस्प ट्रिक और खास मेंटल कंडीशन छिपी हुई होती है. आज इस आर्टिकल में हम आपको इन्हीं मेंटल कंडीशंस के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं.

नोमोफोबिया यानी बिना फोन के रहने का डर
जब फोन की बैटरी 1 परसेंट बचती है, तो जो घबराहट हमें होती है, उस सिचुएशन का एक खास नाम होता है नोमोफोबिया. इसका पूरा मतलब होता है ‘नो मोबाइल फोन फोबिया’ यह एक ऐसी मेंटल कंडीशन है जिसमें इंसान को अपने मोबाइल फोन से दूर होने या उसका इस्तेमाल न कर पाने का डर सताने लगता है. आज हम अपने दोस्तों से बात करने, ऑफिस का काम करने, पैसे भेजने और यहां तक कि रास्ता ढूंढने के लिए भी फोन पर डिपेंड रहने लगे हैं. इसलिए, जैसे ही बैटरी खत्म होने की कगार पर पहुंचती है, हमारे दिमाग को लगता है कि हम पूरी दुनिया से कटने वाले हैं, और यही बात घबराहट को पैदा करती है.
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दिमाग की ट्रिक या अर्जेंसी इफेक्ट और खतरा
जब फोन की स्क्रीन पर 1 परसेंट का लाल निशान दिखाई देता है, तो हमारा दिमाग उसे एक नॉर्मल इन्फॉर्मेशन की तरह नहीं देखता, बल्कि हमारा दिमाग इसे एक ‘इमरजेंसी’ या खतरे के संकेत के रूप में लेता है. इसे साइकोलॉजी में अर्जेंसी इफेक्ट भी कहा जाता है. दिमाग को लगता है कि अब हमारे पास समय बहुत कम है और हमें तुरंत कोई स्टेप लेना होगा. इस कंडीशन में दिमाग में कॉर्टिसोल’ नाम का स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होने लगता है. यही हार्मोन हमें बेचैन करता है और हमारा फोकस पूरी तरह से चार्जर ढूंढने पर लगा देता है. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे पुराने समय में इंसानों को किसी जंगली जानवर को देखकर डर लगता था.
अधूरी इच्छाएं और फोमो का चक्कर
बैटरी खत्म होने के डर के पीछे एक और बड़ा कारण है, जिसे फोमो भी कहा जाता है. इसका मतलब है लाइफ में कुछ छूट जाने का डर. फोमो की वजह से हमें यह डर लगता है कि जैसे ही फोन बंद होगा, कहीं कोई जरूरी मैसेज, कोई जरूरी कॉल या सोशल मीडिया पर चल रही कोई बड़ी खबर हमसे छूट न जाए. इसके अलावा, हमारा दिमाग हमेशा उन कामों को याद रखने की कोशिश करता है, जो अभी अधूरे हैं. जैसे ही बैटरी 1 परसेंट पर होती है, दिमाग को याद आता है कि अरे, अभी तो उसे ईमेल करना था या अरे, अभी तो रील पूरी देखनी थी. इन अधूरी इच्छाओं का प्रेशर हमारी घबराहट को दोगुना कर देता है.
इस बेचैनी से बचने का क्या है तरीका?
- अगर आप इस घबराहट से बचना चाहते हैं तो इसका सबसे आसान तरीका है कि आप टेक्नोलॉजी पर अपनी डिपेंडेंसी थोड़ी कम कर लें.
- इस बेचैनी से बचने के लिए डिजिटल डिटॉक्स करें. इसका मतलब होता है दिन में कुछ घंटे फोन से पूरी तरह दूरी बनाने की आदत डालें.
- बेचैनी से बचने के लिए पावर बैंक का इस्तेमाल करना शुरू कर दें. अगर आप अक्सर बाहर रहते हैं, तो एक छोटा पावर बैंक साथ रखें ताकि 1 परसेंट की वार्निंग देखने की नौबत ही न आए.
- अपने दिमाग को समझाएं कि जब बैटरी 1 परसेंट होगी तो या फिर स्विच ऑफ भी हो जाएगी तो दुनिया खत्म नहीं होने वाली है.
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लेखक के बारे में
By Saurabh Poddar
सौरभ पोद्दार एक लाइफस्टाइल जर्नलिस्ट हैं और पिछले 4 सालों से डिजिटल मीडिया में एक्टिव हैं. उन्होंने रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है. फिलहाल, सौरभ 'प्रभात खबर' के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बतौर कंटेंट राइटर काम कर रहे हैं. सौरभ को उन विषयों पर लिखना सबसे ज्यादा पसंद है, जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं. उनके आर्टिकल्स में आपको हेल्थ, फिटनेस, स्किन-हेयर केयर, पेरेंटिंग, हेल्दी रेसिपीज, घरेलू नुस्खे, रिलेशनशिप और वास्तु शास्त्र जैसी उपयोगी जानकारियां मिलेंगी. फिटनेस और अच्छी सेहत सौरभ की निजी जिंदगी का भी अहम हिस्सा हैं. वे जिन विषयों पर लिखते हैं, उन्हें अपनी रूटीन में फॉलो भी करते हैं. उनका मानना है कि जब आप किसी चीज को खुद एक्सपीरियंस करते हैं, तभी दूसरों तक सही और प्रैक्टिकल जानकारी पहुंचा सकते हैं. उनकी हमेशा यही कोशिश रहती है कि वे ट्रेंडिंग टॉपिक्स पर बिल्कुल आसान और आम बोलचाल की भाषा में लिखें, ताकि हर पाठक उसे आसानी से समझ सके. यही वजह है कि उनके लिखे आर्टिकल्स काफी एंगेजिंग और एसईओ फ्रेंडली होते हैं.
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