भरोसेमंद संकटमोचक थे प्रणब दा

Author : रशीद किदवई Published by : Prabhat Khabar Updated At : 02 Sep 2020 1:56 AM

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जहां प्रणब मुखर्जी इंदिरा गांधी और संजय गांधी के लिए बहुत भरोसेमंद थे, वहीं राजीव गांधी और सोनिया गांधी से उनके रिश्तों में उतार-चढ़ाव रहा.

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रशीद किदवई, राजनीतिक विश्लेषक

rasheedkidwai@gmail.com

डॉ प्रणब मुखर्जी शायद देश के वैसे बेहतरीन प्रधानमंत्री थे, जो कभी उस पद पर नहीं रहे. कोलकाता में डाक-तार विभाग के एक कार्यालय में एक क्लर्क की राष्ट्रपति भवन तक की यात्रा हमारे दौर की सबसे शानदार कथा है. राजनीति शास्त्र और इतिहास में परास्नातक और कानून की डिग्री की बदौलत मुखर्जी को एक कॉलेज में सहायक प्राध्यापक का पद हासिल हुआ. बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने कुछ समय के लिए कोलकाता से निकलनेवाले पत्र ‘देशेर डाक’ के लिए पत्रकारिता भी की थी.

उनका राजनीतिक करियर साठ के दशक में शुरू हुआ, जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं. उन्होंने मुखर्जी को राज्यसभा में भेजा और इस तरह वे दिल्ली आ गये. साल 1977-78 में जब कांग्रेस के अधिकतर दिग्गज नेताओं ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ दिया, तब प्रणब मुखर्जी उनके साथ बने रहे और पार्टी के कोषाध्यक्ष के रूप में भी काम किया. वह दौर पार्टी और इंदिरा गांधी के लिए बहुत संकटपूर्ण था.

जब 1980 में इंदिरा गांधी ने सत्ता में वापसी की, तो मुखर्जी उनके बड़े संकट मोचक के रूप में उभरे. साल 1984 में ‘यूरोमनी’ पत्रिका ने इन्हें दुनिया के पांच बेहतरीन वित्तमंत्रियों में शुमार किया था. इंदिरा गांधी और उनके बीच भरोसे का ऐसा रिश्ता था कि कुछ अवसरों में उन्हें ऐसे दायित्व भी संभालने के लिए सौंपे जाते थे, जिनमें उन्हें तीन सबसे वरिष्ठ मंत्रियों- आर वेंकट रमण, पीवी नरसिम्हा राव और नारायण दत्त तिवारी- के ऊपर निर्णय लेना होता था. मुखर्जी के साथ मंत्रिमंडल में रहे लोगों के अनुसार, वे बैठकों में इस तरह से सहमति बनाने में कामयाब होते थे कि प्रधानमंत्री का काम आसान हो जाता था. उन्होंने कई मंत्रालयों को संभाला था और कानून, इतिहास, वित्त आदि कई विषयों पर उन्हें महारत हासिल थी.

डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल में तो वे एक दर्जन से भी अधिक मंत्रियों की समितियों के प्रमुख होते थे. राजनीतिक स्तर पर देखें, तो मुखर्जी इंदिरा युग से लेकर मनमोहन सिंह तक मुश्किलों को हल करनेवाले के तौर भी सामने आते हैं. इंदिरा गांधी ने 1982 में एआर अंतुले का इस्तीफा लेने में उनकी मदद ली थी, जिनका नाम भ्रष्टाचार के एक मामले में आ गया था और वे पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे. उस दौर में कई राज्यों में मुख्यमंत्रियों को लगातार बदलने में भी इंदिरा गांधी उनका सहयोग लेती थीं.

कई दशकों तक फैले अपने राजनीतिक करियर में गांधी परिवार के साथ मुखर्जी का संबंध असमान रहा था. जहां वे इंदिरा गांधी और संजय गांधी के लिए बहुत भरोसेमंद थे, वहीं राजीव गांधी और सोनिया गांधी से उनके रिश्तों में उतार-चढ़ाव रहा. संस्मरणों की अपनी किताब में मुखर्जी ने स्पष्ट किया है कि उनके संबंधों का समीकरण गांधी परिवार के विभिन्न सदस्यों के साथ कैसा रहा था.

राजीव गांधी से उनके तनावपूर्ण संबंधों की शुरुआत श्रीमती गांधी की हत्या के तुरंत बाद हो गयी थी. वे उस समय केंद्रीय वित्त मंत्री थे और कांग्रेस में इंदिरा गांधी के बाद उन्हीं का स्थान माना जाता था, परंतु प्रणब मुखर्जी को कार्यकारी प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया. उस समय की अफवाहों का उनके राजनीतिक करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा. इंदिरा गांधी की हत्या के समय उनके पुत्र व कांग्रेस महासचिव राजीव गांधी तब बंगाल के दौरे पर थे.

प्रणब मुखर्जी भी उस समय राजीव गांधी के साथ थे तथा दोनों एक ही वायुयान से दिल्ली पहुंचे थे. कुछ लोगों का कहना है कि इंदिरा गांधी की हत्या से मुखर्जी अत्यंत दुखी थे. वे वायुयान के शौचालय में जाकर रोये और फिर यान की पिछली सीट पर ही बैठ गये. लेकिन कांग्रेस में उनके विरोधियों ने यह बात चला दी कि वे पीछे बैठ कर राजीव गांधी के खिलाफ योजना बना रहे थे. यह भी कहा जाता है कि राजीव गांधी ने जब ‘कार्यकारी प्रधानमंत्री’ की बाबत ‘सैद्धांतिक प्रश्न’ उठाया, तो प्रणब मुखर्जी ने ‘वरिष्ठता’ पर जोर दिया. इसे बाद में प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी इच्छा के रूप में प्रचारित किया गया.

मुखर्जी कहते थे, उनसे कई बार पूछा गया कि क्या वे राजीव गांधी से ईर्ष्या करते थे? इसके जवाब में वे इंडिया टुडे के एडिटर अरुण पुरी को दिये गये राजीव गांधी के इंटरव्यू का जिक्र करते थे. इसमें राजीव गांधी ने स्वीकार किया था कि उन्हें बाद में आभास हुआ कि उनके (प्रणब मुखर्जी के) बारे में कही गयी कई बातें गलत थीं. खुद मुखर्जी को लगता था कि कांग्रेस के पुराने दिग्गजों, जैसे कमलापति त्रिपाठी व वसंत दादा पाटिल से उनकी निकटता ने राजीव को नाराज कर दिया.

मुखर्जी के अनुसार, उन्हें राजीव गांधी की उनके प्रति बढ़ती नाराजगी व उनके आसपास मौजूद लोगों पर उनकी निर्भरता से स्थिति भांप लेना चाहिए थी, ‘लेकिन जैसी कि मेरी प्रकृति है, मैं अपने कामों में व्यस्त रहा.’ स्थिति यह आ गयी कि अप्रैल, 1986 में उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया. मुखर्जी के अनुसार, जब उन्हें पार्टी से निकाला गया, तो किसी ने उन्हें सूचित करने तक का कष्ट नहीं किया. बाद में जब धुंध हटी, तो मुखर्जी वापस कांग्रेस के क्षत्रपों में शामिल हो पाये. कई लोगों का मानना है कि वर्ष 2012 में प्रणब मुखर्जी ने खुशी-खुशी राष्ट्रपति बनना इसलिए स्वीकार कर लिया कि वे दूसरे गुलजारीलाल नंदा नहीं बनना चाहते थे.(ये लेखक के निजी िवचार हैं)

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