लैंगिक समानता की स्थापना का आधार है पितृत्व अवकाश

Updated at : 20 Mar 2026 11:43 AM (IST)
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Paternity Leave

पितृत्व अवकाश

Paternity Leave : वर्तमान समय में, जब संयुक्त परिवार प्रणाली लगभग समाप्त हो रही है, तब नीति निर्माताओं के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे जैविक एवं दत्तक माता-पिता के लिए पितृत्व/पेरेंटल अवकाश को एक मौलिक मानवीय अधिकार के रूप में मान्यता दें.

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Paternity Leave : हाल ही में देश की शीर्ष अदालत की दो सदस्यीय खंडपीठ ने दत्तक माताओं के लिए मातृत्व लाभों को सीमित करने वाले प्रावधान को रद्द करते हुए कहा कि ‘पालन-पोषण एक साझा जिम्मेदारी है और इसे केवल माताओं को सौंपी गयी पारंपरिक भूमिकाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता है.’ सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने वाला कानून लाने का आग्रह करते हुए कहा कि वह पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने वाला प्रावधान लाये. शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे अवकाश की अवधि माता-पिता और बच्चे, दोनों की जरूरतों के अनुरूप निर्धारित की जानी चाहिए.


इससे पूर्व अगस्त, 2023 में ‘बी सरवनन बनाम पुलिस उप महानिरीक्षक’ मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि पितृत्व अवकाश से इनकार करना अनुच्छेद 21 के तहत नवजात शिशु के जीवन के अधिकार का उल्लंघन है. उल्लेखनीय है कि इस मामले में न्यायालय ने अपनी पत्नी के जटिल प्रसव के दौरान अनधिकृत अनुपस्थिति के कारण सेवामुक्त किये गये एक पुलिस निरीक्षक को बहाल कर दिया था, और पितृत्व अवकाश को एक बुनियादी मानवाधिकार के रूप में मान्यता देते हुए टिप्पणी की थी कि ‘बच्चे का अस्तित्व और उसका संरक्षण परिवार की संयुक्त जिम्मेदारी है.

वर्तमान समय में, जब संयुक्त परिवार प्रणाली लगभग समाप्त हो रही है, तब नीति निर्माताओं के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे जैविक एवं दत्तक माता-पिता के लिए पितृत्व/पेरेंटल अवकाश को एक मौलिक मानवीय अधिकार के रूप में मान्यता दें.’ आधुनिक शोध बताते हैं कि बाल्यावस्था के प्रारंभिक वर्षों में पिता की सक्रिय अनुपस्थिति केवल एक पारिवारिक कमी नहीं, बच्चे के भावनात्मक संतुलन, सामाजिक अनुशासन और व्यावहारिक विकास के लिए एक संरचनात्मक जोखिम उत्पन्न करती है.


पितृत्व अवकाश का विमर्श मूलतः दो समानांतर आयामों में विकसित होता है. पहला, क्या पितृत्व अवकाश वास्तव में आवश्यक है? समझना आवश्यक है कि शिशु के जन्म के बाद के प्रारंभिक महीने बच्चे के लिए ही नहीं, पूरे परिवार के लिए अत्यंत संवेदनशील होते हैं, जहां निरंतर देखभाल और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है. मातृत्व के बाद पिता की भूमिका केवल शिशु तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह एक जीवनसाथी के रूप में भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है.

प्रसवोत्तर काल में जब मां शारीरिक और मानसिक पुनर्प्राप्ति की प्रक्रिया में होती है, तब पिता का सहयोग उसे आवश्यक भावनात्मक संबल प्रदान करता है. इस समय पिता केवल सहायक नहीं, एक सक्रिय सहभागी के रूप में उभरता है, जो देखभाल और जिम्मेदारियों के साझा निर्वहन का आधार बनता है. वर्ष 2010 में ‘जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन’ में प्रकाशित शोध कहता है कि प्रसवोत्तर काल में माता और पिता के मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध होता है, और पिता की सक्रिय संलग्नता मां में अवसाद की संभावना को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इसी तरह, 2016 में ‘पीडियाट्रिक्स’ में प्रकाशित अध्ययन बताता है कि इस प्रारंभिक चरण में पिता की उपस्थिति न केवल परिवार के भावनात्मक संतुलन को सुदृढ़ करती है, बल्कि देखभाल की प्रक्रिया को भी अधिक प्रभावी बनाती है.


दूसरा, क्या पितृत्व अवकाश पुरुषत्व की पारंपरिक और कठोर अवधारणा के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकता है, क्योंकि सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनाएं लंबे समय से पुरुष की भूमिका को केवल आर्थिक दायित्वों तक सीमित करती रही हैं. स्वीडन में पितृत्व अवकाश पर किये गये अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक चरण में अनेक पिताओं ने इसे अपने करियर के लिए बाधक समझा, परंतु समय के साथ उनकी विचारधारा परिवर्तित हुई. स्वीडन में पितृत्व अवकाश को लेकर हुए अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक वर्षों में पिताओं द्वारा अवकाश लेने की प्रवृत्ति अत्यंत सीमित थी और इसे सामाजिक रूप से असामान्य माना जाता था.

किंतु नीतिगत प्रोत्साहनों और बदलती सामाजिक चेतना के कारण यह धारणा धीरे-धीरे परिवर्तित हुई और पितृत्व अवकाश एक सामान्य सामाजिक व्यवहार के रूप में स्थापित हो गया. बीते दशकों में वह कठोर सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना धीरे-धीरे उन सभी देशों में परिवर्तित होने लगीं, जहां पितृत्व अवकाश का प्रावधान किया गया है. परिणामस्वरूप ‘डायपर डैड’ (अर्थात शिशु की दैनिक देखभाल में सक्रिय रूप से सहभागी पिता) की अवधारणा तेजी से विकसित हो रही है. यह केवल एक व्यवहारगत परिवर्तन नहीं, उस सहजता का प्रतीक है, जो पारंपरिक पुरुषत्व की कठोर धारणाओं को तोड़ते हुए एक संतुलित और साझेदारी आधारित सामाजिक संरचना की ओर संकेत करती है. अब समय आ गया है कि भारत सरकार इस प्रश्न पर समाज के साथ गंभीर संवाद स्थापित करे, क्योंकि पितृत्व अवकाश केवल सुविधा नहीं, लैंगिक समानता की वास्तविक स्थापना का आधार है.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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डॉ ऋतु सारस्वत

लेखक के बारे में

By डॉ ऋतु सारस्वत

डॉ ऋतु सारस्वत is a contributor at Prabhat Khabar.

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