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नयी भाजपा के सामने पुरानी कांग्रेस

BJP vs Congress: अपने मजबूत कैडर, सक्रिय संगठन और पैरेंटल ऑर्गनाइजेशन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ठोस समर्थन के बल पर भाजपा उस मुकाम तक पहुंच चुकी है, जहां उसे अब पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता नहीं दिखती. जबकि कांग्रेस अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए संघर्षरत है और पार्टी में बदलाव लाने के लिए उतनी तैयार नहीं दिखती. भाजपा ने नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया, तो कांग्रेस में भी बदलाव का दबाव बना है. पर सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपनी जड़ता तोड़कर साहसिक फैसले ले पायेगी या हर चुनाव के बाद हार के नये बहाने ही तलाशती रहेगी.

BJP vs Congress: नया साल देश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों, भाजपा और कांग्रेस के लिए कैसा रहेगा, यह सवाल महत्वपूर्ण है. यह प्रश्न इसलिए भी ज्यादा प्रासंगिक हो गया है, क्योंकि दोनों ही राजनीतिक दल आज अपने इतिहास के ऐसे मोड़ पर आ खड़े हुए हैं, जहां वे पहले कभी नहीं रहे. अपने मजबूत कैडर, सक्रिय संगठन और पैरेंटल ऑर्गनाइजेशन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ठोस समर्थन के बल पर भाजपा उस मुकाम तक पहुंच चुकी है, जहां उसे अब पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता नहीं दिखती. इसके ठीक उलट, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए संघर्षरत है. वह पार्टी में बदलाव लाने के लिए उतनी तैयार नहीं दिखती.

भाजपा बदलाव में विश्वास करती है. हाल ही में भाजपा ने 45 वर्षीय युवा नेता नितिन नबीन को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है. इसके साथ ही उनका अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना भी लगभग तय माना जा रहा है. दिलचस्प यह है कि बिहार से बाहर के अधिकांश लोग कुछ समय पहले तक उनका नाम भी नहीं जानते थे. लेकिन यह नियुक्ति इस बात का संकेत है कि पार्टी संगठन पर मोदी-शाह की पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी है कि उनके द्वारा चुने गये किसी भी नाम पर सवाल उठाने की गुंजाइश तक नहीं बची है. यह इंदिरा गांधी के दौर की याद दिलाता है, जब कांग्रेस के संगठन में उनकी तूती बोलती थी और वह अपनी मनमर्जी से राज्यों के मुख्यमंत्री फेंटा करती थीं.

भाजपा में भी इस समय सत्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह के इर्द-गिर्द केंद्रित है और पार्टी के सभी निर्णयों पर इन दो शीर्ष नेताओं की छाप साफ दिखाई दे रही है. भाजपा अध्यक्ष पद पर नितिन नबीन की संभावित ताजपोशी केवल मोदी-शाह के दबदबे का प्रतीक ही नहीं होगी, बल्कि यह भाजपा में पीढ़ीगत बदलाव का साक्षी भी बनेगी, जिसकी प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पार्टी के पुराने चेहरों को हटाकर नये मुख्यमंत्रियों को आगे लाना पार्टी की इसी रणनीति का हिस्सा है. नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाये जाने को इस कड़ी का अगला कदम माना जा सकता है. हालांकि नये नेताओं को लाते समय इस बात का भी खास ध्यान रखा जा रहा है कि वे ऐसे हों, जो आगे चलकर नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी के तौर पर आने वाले अमित शाह के लिए कोई चुनौती न बन सकें.

आज भाजपा का राजनीतिक इकबाल इतना बुलंद हो चुका है कि यदि 2029 या उसके बाद किसी चुनाव में उसका कद कुछ घट भी जाये, तब भी वह देश की सबसे अहम राजनीतिक ताकत बनी रहेगी. यह लगभग तय है कि पार्टी आने वाले कई वर्षों तक सत्ता के केंद्र में या कम से कम उसकी धुरी बनी रहेगी, यहां तक कि मोदी-शाह युग के बाद भी. यह उसी संगठनात्मक ताकत का नतीजा है, जिसकी हाल ही में तारीफ कर वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी के भीतर विवाद खड़ा कर दिया था.

भाजपा और आरएसएस संबंधी दिग्विजय सिंह की सोशल मीडिया पोस्ट के कई राजनीतिक अर्थ निकाले जा सकते हैं, लेकिन इसमें कांग्रेस के लिए एक अहम सबक तो छिपा ही है. भले ही कांग्रेस नेतृत्व ने उनके बयान से खुद को अलग कर लिया हो, लेकिन पार्टी इस कड़वी सच्चाई से आंखें नहीं मूंद सकती कि आज कांग्रेस जिस मोड़ पर आ खड़ी हुई है, वह पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के नेस्तनाबूत होने का ही नतीजा है और दिग्विजय सिंह ने उसी ओर इशारा किया है. हकीकत यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जो थोड़ी-बहुत चमक दिखाई थी, वह अब फीकी पड़ चुकी है और पार्टी के वजूद पर ही सवाल उठने लगे हैं. एक सौ चालीस साल पुरानी पार्टी के अस्तित्व पर संकट हो, तो नये साल में उससे गंभीर आत्ममंथन की अपेक्षा करना लाजिमी है.

किसी भी राजनीतिक दल में संगठन महामंत्री का पद सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. पिछले करीब छह वर्षों से कांग्रेस में यह जिम्मेदारी केसी वेणुगोपाल के पास रही है और उनके कार्यकाल में पार्टी लगातार कमजोर होती गयी है. हालांकि 2026 पार्टी के लिए अच्छी खबर ला सकता है, क्योंकि स्वयं वेणुगोपाल ने अपने राज्य की राजनीति में लौटने की इच्छा जतायी है, जहां अगले कुछ महीनों में चुनाव होने हैं और पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बना सकती है. कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी चाहते हैं कि वेणुगोपाल राज्य की सक्रिय राजनीति में लौटें, ताकि संगठन महामंत्री जैसे अहम पद पर किसी अपेक्षाकृत युवा चेहरे को जिम्मेदारी दी जा सके.

दरअसल भाजपा में नयी पीढ़ी को आगे बढ़ाये जाने के बाद कांग्रेस पर भी युवा नेतृत्व को अवसर देने का दबाव बढ़ गया है. पार्टी अध्यक्ष के रूप में 83 वर्षीय मल्लिकार्जुन खरगे की मौजूदगी के बीच संगठन महामंत्री के पद पर युवा नेता की नियुक्ति संतुलन साधने का एक तरीका हो सकता है. नये साल में प्रियंका गांधी वाड्रा की भूमिका पहले से कहीं अधिक ठोस और व्यापक हो सकती है. बताया जाता है कि एआइसीसी के चुनाव प्रबंधन विभाग की प्रमुख के रूप में प्रियंका की नियुक्ति का पत्र पिछले कई हफ्तों से तैयार पड़ा है. इस बारे में भी स्थिति साफ नहीं है कि क्या अब यह पत्र रद्द किया जायेगा और प्रियंका को कोई नयी जिम्मेदारी सौंपी जायेगी.

कांग्रेस के भीतर यह चर्चा भी तेज है कि सचिन पायलट की भूमिका बढ़ सकती है. इस समय वह कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और छत्तीसगढ़ के प्रभारी हैं. उनकी नजरें राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष पद पर हैं, जहां गोविंद सिंह डोटासरा साढ़े पांच साल से जमे हुए हैं. लेकिन यदि गांधी परिवार पायलट को संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी संभालने को कहता है, तो वह इससे इनकार भी नहीं कर पायेंगे. पार्टी में पायलट की लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपना कांग्रेस संगठन को नयी धार दे सकता है. सचिन के प्रियंका गांधी से भी करीबी ताल्लुक हैं और पार्टी नेताओं का एक बड़ा वर्ग मानता है कि राहुल , प्रियंका और सचिन पायलट की तिकड़ी 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए एक मजबूत संबल बन सकती है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अपनी जड़ता तोड़कर साहसिक फैसले ले पायेगी या फिर हर चुनाव के बाद हार के नये बहाने ही तलाशती रहेगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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