नेपाल ने पुरानी राजनीति को नकार दिया है

Updated at : 12 Mar 2026 11:10 AM (IST)
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Balen Shah Nepal

बालेन शाह

Nepal Election : नेपाल के लोगों ने जितना स्पष्ट जनादेश दिया है, उसे समझने की जरूरत है. यह जनादेश पुरानी राजनीति को लगभग सीधे-सीधे नकारने जैसा है. दरअसल, नेपाली मतदाता ने सारे ‘वादों’, अर्थात विचारधारा का नाम लेकर राजनीतिक नौटंकी करने वालों को ठुकराया है.

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Nepal Election : नेपाल चुनाव और उसके नतीजों की व्याख्या कई तरह से की जा रही है. लेकिन चुनावी प्रक्रिया के दौरान वहां जो कुछ दिखा, उसकी चर्चा कम हुई. चुनाव की घोषणा होते ही हर बड़े दल में उठापटक हुई और कई टूट-फूट तथा विलय भी देखने में आये. कई दलों ने अपने ‘आराध्य’ का नाम लेना भी पाप समझा, तो नेपाली कांग्रेस ने नेपाल के जेन जी आंदोलन और मुख्य ताकत बनकर उभर रही राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को देखते हुए नया नेता चुना. तब भी पार्टी चारों खाने चित्त हुई. हर दल ने नौजवानों को आगे करने का प्रयास जरूर किया, पर स्थापित पुराना नेतृत्व नतीजों के पहले मैदान छोड़ने को तैयार न था. ‘न था’ कहना शायद गलती है, इसे ‘नहीं है’ कहना चाहिए. जिस समानुपातिक प्रणाली से नेपाल की संसद के एक बड़े हिस्से को भरने की विलक्षण व्यवस्था की गयी है, उसके लिए पार्टियों के नामांकन की सूची चुनाव उम्मीदवार चुनने से पहले बनी. और उसे बनाने के क्रम में ही असली झगड़े हुए. आप पायेंगे कि इतने स्पष्ट जनादेश के बावजूद जब इस व्यवस्था वाले सांसद आयेंगे, तो काफी पिटे-पिटाये चेहरे भी देखने को मिलेंगे.


नेपाल के लोगों ने जितना स्पष्ट जनादेश दिया है, उसे समझने की जरूरत है. यह जनादेश पुरानी राजनीति को लगभग सीधे-सीधे नकारने जैसा है. दरअसल, नेपाली मतदाता ने सारे ‘वादों’, अर्थात विचारधारा का नाम लेकर राजनीतिक नौटंकी करने वालों को ठुकराया है. इसमें कम्युनिस्ट खेमे के दल तो हैं ही, दक्षिणपंथी और राजशाही समर्थक दल भी हैं. एक पार्टी तो सीधे राजतंत्र की वापसी के नाम पर इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा ले रही थी. एक चीन समर्थक पार्टी थी. पर चुनाव में मधेश और पहाड़ या किसी जाति और क्षेत्र का नाम लेकर राजनीति करने वालों की दुर्गति का मामला भी कम दिलचस्प नहीं है. खुद बालेंद्र शाह के मैथिली बयान या मधेशी होने का सवाल भी उठाया गया, लेकिन लगता नहीं है कि मतदाता इन बातों से किसी भी तरह प्रभावित हुए.

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को दो-तिहाई बहुमत का मतलब बहुत बड़ा है और वह नये कानून बनाने से लेकर इस पर्वतीय राष्ट्र की किस्मत बनाने-बिगाड़ने के लिए कोई भी कदम उठा सकती है. पर उसकी अपनी राजनीति भी है. प्रधानमंत्री बनने जा रहे बालेंदु उर्फ बालेंद्र शाह और पार्टी अध्यक्ष रबी लामिछाने के बीच दोस्ती भी चुनाव के पहले ही हुई है. लामिछाने के खिलाफ कई गंभीर आरोप भी हैं. हालांकि, पैंतीस वर्ष के बालेंद्र शाह ने अभी तक पर्याप्त समझदारी दिखाई है, लेकिन काठमांडू शहर के शासन और नेपाल के शासन में फर्क है. उम्मीद करनी चाहिए कि उनका उत्साह और नयी ऊर्जा इस जवाबदेही को पूरी तरह निभाने में उनकी सहायता करेगी.


बालेंद्र शाह के साथ किसी वाद का तमगा नहीं है, न ही उन्होंने इस तरह के ‘फाॅर्मूले’ वाले ज्यादा वायदे किये हैं. लेकिन वे विचारधारा से मुक्त होंगे, कहा नहीं जा सकता. और स्वतंत्र पार्टी का अर्थ किसी किस्म की मूल्यगत निष्ठा से स्वतंत्र होना नहीं है. बेरोजगारी, गरीबी, प्राकृतिक संसाधनों का कुप्रबंध या लूट, भारत और चीन जैसे दो बड़े पड़ोसी देशों के बीच संतुलन साधते हुए आगे बढ़ने की चुनौती और लोकतांत्रिक व्यवस्था में दिख रही कमजोरियों को दुरुस्त करने जैसे काम उसके सामने है, ऐसे में अपने इन पड़ोसियों से किसी किस्म की होड़ करने या दांव-पेच दिखाने की फुर्सत नयी सरकार के पास नहीं होगी.

उधर, इस बार नेपाली राजनीति के तीन सूरमा- केपी शर्मा ओली, शेर बहादुर देउबा और पुष्प कमल दहल प्रचंड- एकदम हाशिये पर आ गये हैं. देउबा को तो उनकी पार्टी- नेपाली कांग्रेस- के नये नेताओं ने ही घर बिठा दिया, तो ओली बुरी तरह पराजित हुए हैं. प्रचंड चुनाव जरूर जीते हैं, पर उनकी पार्टी दूसरे स्थान पर भी नहीं रह पायी. यह जगह गिरते-पड़ते नेपाल कांग्रेस को ही मिली है. फिर बाबुराम भट्टराई जैसे पूर्व सहयोगी के अलग दल बनाने से भी प्रचंड की पार्टी कमजोर हुई है. ऐसे में संभव है कि सारी कम्युनिस्ट पार्टियां फिर से एकजुटता का स्वर बुलंद करें. पर लोग उन पर फिर से विश्वास करेंगे, यह कहना जल्दबाजी होगी. गगन थापा और शेर बहादुर देउबा की लड़ाई से नेपाल कांग्रेस बंटी हुई है. चुनावी धुलाई के बाद राजशाही समर्थक पार्टी या अनेक नामधारी, पर अलग-अलग जातीय प्रभाव वाले मधेशी दलों में से भी कितने टिक पायेंगे, इसे देखना होगा.


जिस तरह लोगों ने पुरानी राजनीति को ठुकराया है, वैसा ही बदलाव एक अन्य मामले में भी दिखता है. केपी शर्मा ओली और उनकी पार्टी की हार, उनकी मौकापरस्त राजनीति के साथ-साथ नेपाल की राजनीति में चीनी दखल को नकारना भी है. नये व्यक्ति के लिए राजनय भी कोरे पन्ने के साथ शुरू हो, तो अच्छा रहता है. नेपाल के पास समस्याओं का काफी ऊंचा पहाड़ है. और इन समस्याओं में असली समस्या नेताओं और जिम्मेदार लोगों के भ्रष्टाचार या भाई-भतीजावाद की रही है. इस बार जनता ने ऐसे सारे झमेले किनारे करके बालेंद्र शाह को सत्ता सौंपी है. सितंबर में हुई बगावत अपनी समस्याओं के साथ नेताओं के आचरण के खिलाफ भी थी, इस बात को शाह से बढ़िया कौन जानता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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अरविंद मोहन

लेखक के बारे में

By अरविंद मोहन

अरविंद मोहन is a contributor at Prabhat Khabar.

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