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आत्मनिर्भरता से ही चीन को सबक

By डॉ अश्विनी महाजन
Updated Date

डाॅ अश्विनी महाजन, एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

ashwanimahajan@rediffmail.com

आज दुनियाभर के लगभग सभी देश चीन से आये वायरस से जूझ रहे हैं, जिससे संक्रमितों की संख्या एक करोड़ तथा मृतकों की संख्या पांच लाख से अधिक हो चुकी है. यदि इसे चीन का षड्यंत्र न भी माना जाए, तो भी यह सर्वविदित ही है कि चीन ने इसकी भयावहता को दुनिया से छुपाया और अपनी वैश्विक विमान सेवाओं को जारी रखते हुए जान-बूझ कर संक्रमित लोगों को दुनियाभर में पहुंचाया. चीन के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार से दुनिया न केवल स्वास्थ्य संकट से जूझ रही है, बल्कि उसे भयंकर आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ रहा है. लगभग 20 वर्षों में जब से चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का सदस्य बना है, उसने सस्ते सामानों से दुनियाभर के बाजारों पर कब्जा कर लिया है.

सभी देश-महादेश चीन के माल पर आश्रित हैं, क्योंकि उनके उद्योग सस्ते चीनी माल से प्रतिस्पर्धा न कर पाने के कारण नष्ट हो चुके हैं. ऐसे में अमेरिका के मुकाबले चीन एक महाशक्ति के रूप में उभरा है. खरबों डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के बलबूते उसने 67 देशों को मिला कर एक बेल्ट रोड परियोजना भी शुरू कर दी है, ताकि दुनिया के बड़े हिस्से के इंफ्रास्ट्रक्चर पर काबिज होने के साथ अधिकतर देशों को अपने जाल में फंसा कर उनके उन इलाकों को हथिया सके, जो उसकी सामरिक शक्ति को बढ़ाने में सहयोगी हों. श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर चीनी कब्जा उसी कुटिल नीति का उदाहरण है. चीन ने अपनी सामरिक शक्ति को भी विस्तार दिया है. उसका इतिहास विस्तार वाद का ही रहा है.

हालांकि, अमेरिका ने पहले से ही चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ रखा है, पर कोरोना संकट के बाद तो लगभग हर देश चीन से किनारा कर रहा है. भारत समेत कई अन्य यूरोपीय देशों ने भी चीन की घटिया मेडिकल खेपों को वापस भेज कर अपनी नाराजगी जतायी है. यूरोपीय देशों ने भी चीन पर विशेष आयात शुल्क लगाने का फैसला किया है. ये देश यह मानते हैं कि चीन अपने निर्यातों पर प्रोत्साहन राशि देकर उनको सस्ता कर यूरोप में भेजता है, जिसके कारण उनके उद्योगों को नुकसान हो रहा है. लगता है कि बेल्ट रोड परियोजना भी खटाई में पड़ सकती है.

कई भागीदार देश तो पहले ही चीन के विस्तारवादी मंसूबों की वजह से कन्नी काटने लगे थे. मलेशिया ने अपनी परियोजना को काफी छोटा कर दिया है. बंदरगाह हथियाने के कारण श्रीलंका की जनता और सरकार चीन से बहुत नाराज है. कई मुल्कों पर कर्ज का बोझ बढ़ने से नाराजगी है. ऑस्ट्रेलिया के भारत के साथ बढ़ते रिश्तों को लेकर भी चीन आशंकित हुआ है. ऐसी परिस्थिति को हम चीन का ‘वैश्विक बहिष्कार’ भी कह सकते हैं.

चीन दुनियाभर में जनता के गुस्से और सरकारों के विरोध के चलते भारी चिंता में है. चीनी सरकार के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ के लेख इस ओर स्पष्ट इंगित कर रहे हैं. भारत में अब भी कई लोग हैं, जो यह मानते हैं कि चीन का बहिष्कार फलीभूत नहीं हो पायेगा, क्योंकि हमारी चीन पर अत्यधिक निर्भरता है. मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा उद्योगों के कच्चे माल, स्वास्थ्य उपकरण, केमिकल्स, धातुओं, खिलौनों, उद्योगों के लिए कलपुर्जों और कच्चे माल समेत हमारे देश की निर्भरता चीन पर इतनी अधिक है कि बहिष्कार संभव नहीं और चीन के आयात पर रोक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकती है. उनका यह भी कहना है कि चीन के माल का पूर्ण बहिष्कार कर भी दिया जाए, तो भी उससे चीन को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा, क्योंकि उसके कुल निर्यात 2498 अरब डॉलर के मुकाबले भारत का उसको निर्यात मात्र 68.2 अरब डॉलर के ही हैं.

हमें समझना होगा कि हमारे देश से चीन को कुल 50 अरब डॉलर का व्यापार अतिरेक प्राप्त होता है, जो उसके कुल व्यापार अतिरेक (430 अरब डॉलर) का 11.6 प्रतिशत है. यह भी भूलना नहीं चाहिए कि अमेरिका का चीन से व्यापार घाटा 360 अरब डॉलर का है, जो चीन के व्यापार अतिरेक का 83 प्रतिशत से ज्यादा है. यदि भारत और अमेरिका मिल कर चीनी माल को अपने देशों से बाहर कर दें, तो चीन का सारा व्यापार अतिरेक समाप्त हो जायेगा. जहां तक भारत की चीन के आयात पर निर्भरता का प्रश्न है, भारत की क्षमता को कम आंकना सही नहीं है.

आज से 15 साल पहले तक दवाओं का कच्चा माल का 90 फीसदी हिस्सा भारत में ही बनता था, लेकिन चीन द्वारा डंपिंग के कारण यह इंडस्ट्री प्रभावित हुई. उसे फिर स्थापित करने हेतु सरकार 3000 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा कर चुकी है. चीन से आयातित कई जीरो टेक्नोलॉजी वस्तुओं का उत्पादन भारत में तुरंत शुरू हो सकता है. मात्र दो माह में भारत पीपीइ व टेस्टिंग किट्स समेत कई मामलों में आत्मनिर्भर हो चुका है और 50 हजार से ज्यादा वेंटिलेटर भी तैयार हो चुके हैं. भारत की प्रतिभा और क्षमता पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए. चीन के आयातों से देश में उद्योगों के पतन, बढ़ती बेरोजगारी और गरीबी पर भी विचार करना होगा. सस्ते के नाम पर हम अपनी अर्थव्यवस्था को गर्त में नहीं डाल सकते.

(ये लेखक के िनजी विचार हैं)

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