हिंदी के पक्ष में कर्नाटक के बच्चों ने दिखायी राह

Published at :15 Apr 2026 12:06 PM (IST)
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हिंदी भाषा की कर्नाटक में बढ़ी स्वीकार्यता

Karnataka News : कर्नाटक की बोर्ड परीक्षा में इस वर्ष बैठ रहे आठ लाख, दस हजार छात्रों में से करीब 93 प्रतिशत ने तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को चुना है. जिस राज्य में महज नौ वर्ष पहले 'कर्नाटक रक्षणा वेदिके' संगठन मेट्रो स्टेशनों का नाम हिंदी में लिखने के विरोध में आंदोलन चला चुकी हो, वहां भारी संख्या में छात्रों द्वारा हिंदी का चयन सुखद कहा जा सकता है.

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Karnataka News : दक्षिण भारत के ताकतवर क्षेत्रीय दलों के लिए, राष्ट्रीय दलों को किनारे करने का ताकतवर हथियार रही है हिंदी. दक्षिण भारतीय क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों को उत्तर भारतीय मानसिकता का नजदीकी जताने-बताने में भी सफल हैं. तमिलनाडु के मौजूदा विधानसभा चुनाव के बीच भी मुख्यमंत्री एमके स्टालिन हिंदी को मुद्दा बना रहे हैं. वह सीधे-सीधे भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत वह तीसरी भाषा के नाम पर हिंदी थोप रही है. पिछली शताब्दी में हिंदी विरोधी आंदोलन से तमिलनाडु सुलग उठा था. तब से, विशेषकर द्रमुक अपनी राजनीति चमकाने के लिए हिंदी थोपने का डर राज्य को दिखाती रही है. कर्नाटक में हिंदी विरोध को लेकर तमिलनाडु जैसा हिंसक आंदोलन तो नहीं हुआ, लेकिन वहां भी विरोधी सुर उठते रहे हैं. लेकिन इसी कर्नाटक से हिंदी को लेकर आयी रिपोर्ट दक्षिण भारतीय राज्यों के हिंदी विरोधी नैरेटिव की पोल खोल रही है.


कर्नाटक की बोर्ड परीक्षाओं में नयी शिक्षा नीति के तहत तीन भाषाओं की पढ़ाई जरूरी हो चुकी है. इनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए. आमतौर पर गैर हिंदीभाषी राज्यों के छात्र पहली भाषा के तौर पर अपने राज्य की भाषा चुनते हैं, दूसरी भाषा के तौर पर अंग्रेजी का ही जोर रहता है. तीसरी भाषा के रूप में कई भारतीय भाषाओं के विकल्प हैं. लेकिन कर्नाटक की बोर्ड परीक्षा में इस वर्ष बैठ रहे आठ लाख, दस हजार छात्रों में से करीब 93 प्रतिशत ने तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को चुना है. जिस राज्य में महज नौ वर्ष पहले ‘कर्नाटक रक्षणा वेदिके’ संगठन मेट्रो स्टेशनों का नाम हिंदी में लिखने के विरोध में आंदोलन चला चुकी हो, वहां भारी संख्या में छात्रों द्वारा हिंदी का चयन सुखद कहा जा सकता है.

इससे साफ है कि हिंदी विरोधी राजनीति और हिंदी के जमीनी विरोध की हकीकत अलग है. कर्नाटक के ठीक बगल के राज्य तमिलनाडु में हिंदी को लेकर छात्रों में ऐसा उत्साह नहीं दिख रहा, तो इसकी वजह यह है कि सत्ताधारी द्रमुक राजनीति ने राज्य में त्रिभाषा फॉर्मूला अभी लागू नहीं किया है. ठीक चुनावों के बीच स्टालिन द्वारा हिंदी थोपने का मुद्दा बनाने का उद्देश्य राज्य में हिंदी को लेकर ध्रुवीकरण करना है. इसके जरिये वह अन्नाद्रमुक के सामने धर्मसंकट की स्थिति बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं. पर इतना तय है कि यदि तमिलनाडु में भी हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ने का मौका मिले, तो वहां भी छात्रों की संख्या बढ़ सकती है.


तमिल धरती पर हिंदी के विरोध में भले ही साठ वर्ष पहले आंदोलन हो चुका हो, पर आज की तमिल माटी के कई सपूत हिंदी सीखने की वकालत कर रहे हैं. जोहो के संस्थापक श्रीधर बेंबू ने पिछले वर्ष फरवरी में कहा था कि तमिलनाडु में हिंदी न जानना भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में गंभीर बाधा है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा था कि उनके इंजीनियरों को गैर तमिल ग्रामीण इलाकों में काम करते वक्त हिंदी न जानने की वजह से परेशानी होती है. इससे उनकी कंपनी का कारोबार और प्रदर्शन प्रभावित होता है. हिंदी विरोधी आंदोलन में हिस्सा ले चुकी तमिल पीढ़ी अब बुजुर्ग हो चुकी है. वह मानती है कि हिंदी न सीखने की वजह से उसे बहुत नुकसान उठाना पड़ा है. इसलिए राज्य में हिंदी सिखाने वाली संस्थाओं की संख्या बढ़ी है. कई पब्लिक स्कूल अपने विज्ञापन में हिंदी पढ़ाने को अपने यहां की विशेष सहूलियत के रूप में दिखाते हैं. तमिलनाडु और कर्नाटक के पड़ोसी केरल के लोगों में अपनी मलयालम भाषा को लेकर गहरा प्रेम है. वे हिंदी से शिद्दत से प्यार भले न करें, लेकिन तमिलनाडु की तरह विरोध भी नहीं करते. यही स्थिति कर्नाटक की भी है.


मीडिया के चौतरफा प्रवाह और विकास तथा चैट जीपीटी एवं जेमिनी जैसी तकनीकों की वजह से भाषाएं अब सीखने की राह की बाधा नहीं रहीं. ज्यादा भाषाओं का ज्ञान और बोध व्यक्ति के मानस को समृद्ध ही बनाता है. जहां तक बात हिंदी की है, तो बाजार ने उसे हाथों-हाथ लिया है. कॉरपोरेट की अपनी भाषा भले ही अंग्रेजी हो, लेकिन वह कारोबार और व्यापार हिंदी या दूसरी स्थानीय भाषाओं में ही कर रहा है. भारतीय भाषाओं के बीच हिंदी का वह सेतु के तौर पर इस्तेमाल भी कर रहा है. बाजार ने हिंदी को विशेष पंख दिये हैं, जिनके सहारे हिंदी उन आसमानों में भी कुलांचे भर रही है, जहां उसकी उपस्थिति के बारे में कुछ वर्ष पहले तक सोचना भी मुश्किल था. हिंदी में संभावनाओं के द्वार भी खुल रहे हैं. हिंदी सहज भी है.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन का काम बगैर हिंदी के भले ही चल जाता हो, लेकिन उनके कई सांसद भी मानते हैं कि यदि उन्हें हिंदी ठीक से आती, तो संसदीय प्रक्रिया में वे और अधिक गहन भागीदारी कर पाते. उत्तर भारतीय लोगों और उनके मुद्दों से और गहराई से संवाद कर पाते. हिंदी विरोधी तमिलनाडु के लोगों का भी जब गैर तमिल धरती से संपर्क होता है, तो हिंदी न जानने की कसक उन्हें सताती है. कर्नाटक के छात्रों ने जता दिया है कि वे इस कसक के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते, तमिलनाडु की राजनीति इसे जितना जल्द समझ लेगी, वहां की नयी पीढ़ी के लिए अच्छा ही होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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उमेश चतुर्वेदी

लेखक के बारे में

By उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी is a contributor at Prabhat Khabar.

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