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पाकिस्तान से व्यापार घाटे का सौदा

असल बात यह है कि आज पाकिस्तान आर्थिक रूप से तबाह हो चुका है और निकट भविष्य में स्थिति में सुधार की कोई आशा भी नहीं है. इसीलिए वे अपने फायदे के लिए भारत से व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने के इच्छुक हैं.

भारत से व्यापार को लेकर पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक डार का एक बयान चर्चा में है. असल में लंदन में एक संवाददाता सम्मेलन में उनसे पूछा गया कि क्या दोनों देशों के रिश्तों में बेहतरी की संभावना है. उस सवाल में व्यापार की कोई बात नहीं थी. इस पर विदेश मंत्री ने कहा कि हम कम से कम व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के बारे में बात कर सकते हैं. इसका मतलब यह है कि भारत पर जो आतंकवाद पाकिस्तान द्वारा थोपा जाता रहा है, भारत के खिलाफ जो नफरत दिखायी जाती है, देश में जो अलगाववाद भड़काने की कोशिश होती है या जो ऐसी और हरकतें हैं, उन पर बात नहीं होगी, लेकिन भारत से व्यापार करना उनके फायदे में है, तो वे इस पर बातचीत करना चाहते हैं.

सवाल अब यह है कि पाकिस्तान से व्यापार करना क्या भारत के हित में है. मेरा मानना है कि पाकिस्तान से व्यापार-वाणिज्य से हमारा कोई लाभ नहीं है. इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम पाकिस्तान से व्यापार करते हैं या नहीं करते. अगर अफगानिस्तान तक चीजें भेजने के लिए पाकिस्तान रास्ता देता है, तो उससे अफगानों को फायदा है, हम पर उसका कोई फर्क नहीं पड़ता. अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था वैसे भी बहुत ही छोटी है.

इसके साथ-साथ व्यापारिक सुरक्षा का प्रश्न भी है. अगर पाकिस्तान से होकर तेल पाइपलाइन आती है या उससे होकर व्यापार होता हो, तो क्या हमें यह स्वीकार होगा कि उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी पाकिस्तान के पास हो? यह तो हो नहीं सकता कि वे जब चाहें पाइपलाइन बंद कर दें या रास्ता रोक दें.

वित्त वर्ष 2022-23 में भारत का कुल विदेश व्यापार 1.6 ट्रिलियन डॉलर था, जो हमारे सकल घरेलू उत्पादन का लगभग 48 प्रतिशत था. उस वित्त वर्ष में पाकिस्तान को भारत का निर्यात 627 मिलियन डॉलर (कुल निर्यात का 0.1 प्रतिशत) और पाकिस्तान से आयात 20 मिलियन डॉलर (कुल आयात का 0.003 प्रतिशत) रहा था. इससे स्पष्ट है कि आर्थिक दृष्टि से पाकिस्तान का हमारे लिए कोई मतलब नहीं है. लेकिन पाकिस्तान के लिए यह बहुत लाभप्रद हो सकता है.

उन्हें दवा समेत कई चीजें सस्ती मिल सकती हैं. प्याज, टमाटर आदि के भाव बीच-बीच में बहुत बढ़ जाते हैं, जिससे मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी होती है. वैसी स्थिति में भारत से आयात उनके लिए बड़ी राहत हो सकता है. साथ ही, व्यापार बढ़ने से आपूर्ति शृंखला का विस्तार होता है. अगर हमारे यहां एक जगह किसी चीज की कमी होती है, तो देश के दूसरे हिस्से से उसकी आपूर्ति हो जाती है. हमारे पास विदेश से आयात का विकल्प भी होता है. यह भी है कि तीसरे देश के जरिये भारत और पाकिस्तान का कुछ व्यापार हो रहा है. उसमें भारतीय व्यापारियों को अपना पैसा मिल जाता है, पर तीसरे देश से होकर सामान आने से पाकिस्तान के लोगों को महंगे दाम देने पड़ते हैं.

एक सोच है कि अगर हम पाकिस्तान से व्यापार करेंगे, तो हमारे संबंध बेहतर होंगे. लेकिन इस बात का हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है. महायुद्धों के इतिहास को देखें या अभी रूस-यूक्रेन युद्ध को लें, उन देशों के बीच बहुत व्यापार होता था, पर युद्ध के शुरू होने के साथ वह सब बंद हो गया. तेल एवं गैस की पाइपलाइनें तक बंद हो गयी हैं. साथ ही साथ, यह मान लेना भी बेकार की बात है कि व्यापार होगा, तो युद्ध नहीं होगा. साल 1965 तक भारत और पाकिस्तान के बीच बहुत व्यापार होता था, पर उस साल पाकिस्तान ने हमारे ऊपर युद्ध भी थोप दिया.

पाकिस्तान की सोच यह है कि भारत और चीन के बीच बहुत तनाव है, लेकिन उनका अच्छा-खासा व्यापार भी होता है, तो इसी तरह हम भी व्यापार करें और तनाव भी बरकरार रखें. भारत को अस्थिर और अशांत करने की उनकी नीति चलती रहे, कश्मीर में आतंक को वे बढ़ावा देते रहें, अलगाववाद बढ़ायें, इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों को समर्थन दें, खालिस्तानियों का सहयोग करें, और साथ में व्यापार भी करें. पहले तो ऐसा ही हो रहा था.

वे आतंक भी फैला रहे थे, उनसे बातचीत भी होती थी, क्रिकेट के मैच भी होते थे. साल 2016 के बाद भारत की नीति में जो बदलाव हुआ और जिसकी वजह से पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया, उसका भारत को बहुत फायदा हुआ है. स्पष्ट है कि आतंक, बातचीत और व्यापार एक साथ नहीं चल सकते.

अगर पाकिस्तान के रवैये में बदलाव नहीं आता और हम उसके साथ व्यापार करें, तो इसका मतलब यह है कि हम दुश्मन को फायदा पहुंचा रहे हैं. हमें किसी बेमानी उम्मीद के पीछे भागने की जरूरत नहीं है कि व्यापार हो सकता है और यदि ऐसा होता है, तो संबंध सुधरेंगे. सबसे पहले हमें यह सोचना चाहिए कि पाकिस्तान से संबंध या व्यापार नहीं हैं, तो उसका हमें नुकसान क्या है. और, अगर कल पाकिस्तान से हमारे संबंध अच्छे भी हो जाएं, तो उसका हमें फायदा क्या है?

ऐसे सवालों पर हमें गंभीरता से और आंकड़ों एवं तथ्यों के आधार पर सोचना चाहिए, न कि किसी भावनात्मक या दार्शनिक आधार पर. कभी कभी अजीब अजीब आकलन पेश किये जाते हैं कि संबंधों में सुधार हो, तो लाखों-करोड़ों डॉलर का व्यापार हो सकता है. ऐसी बातें निराधार हैं. हमें वास्तविकता के आधार पर विश्लेषण करना चाहिए. यह भी सवाल है कि क्या भारत को लेकर पाकिस्तान के रवैये में कोई बदलाव आया है.

असल बात यह है कि आज पाकिस्तान आर्थिक रूप से तबाह हो चुका है और निकट भविष्य में स्थिति में सुधार की कोई आशा भी नहीं है. इसीलिए वे अपने फायदे के लिए भारत से व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने के इच्छुक हैं. लेकिन हमें उसका कुछ भी लाभ नहीं है. ऐसी स्थिति में हमें पाकिस्तान के सामने कुछ शर्तें रखनी चाहिए. अगर वह आतंकवाद को शह देना बंद कर दे और आतंकी सरगनाओं को जेल में डाले या भारत को सुपुर्द करे, तो बातचीत का एक आधार बन सकता है.

हमारे देश में एक समस्या यह भी है कि कुछ लोग पाकिस्तान से अच्छे संबंधों की वकालत करते रहते हैं. उन्हें यह सोचना चाहिए कि जो देश भारत के वजूद को स्वीकार नहीं करता और हर समय नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता रहता है, उससे दोस्ती कर हमें क्या हासिल हो जायेगा. पाकिस्तान में दो-चार लोग खड़े होकर कुछ अच्छी बातें कह देते हैं, तो हम उसे बढ़ा-चढ़ाकर यह कहने लगते हैं कि यही पाकिस्तान की जनता की राय है. भारत की मौजूदा नीति के फायदे हमारे सामने हैं और हमें उसी नीति पर चलना चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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