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ऊंची विकास दर के जोखिम भी होते हैं

Updated at : 19 Dec 2025 10:55 AM (IST)
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GDP rate

जीडीपी

High-Growth Rate : वर्ष 2007 के एक अध्ययन पत्र में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के दो अर्थशास्त्रियों, कौशिक बसु और एनेमे मार्टंस ने यह बताया था कि हिंदू विकास दर शब्दावली दिवंगत अर्थशास्त्री राज कृष्णा द्वारा गढ़ी गयी थी, और जो वस्तुत: देश के आर्थिक योजनाकारों के प्रति हताशा व्यक्त करने के लिए व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति थी.

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High-Growth Rate : मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों की पारंपरिक सोच यह है कि जीडीपी की वृद्धि दर जितनी अधिक हो, अर्थव्यवस्था के लिए उतना ही अच्छा होगा. भारत की आर्थिक विकास दर मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 8.2 फीसदी रही. हालांकि भारत की आर्थिक सोच हमेशा से ऊंची विकास के पक्ष में नहीं रही है. यह सोच तब मजबूत हुई, जब मनमोहन सिंह ने देश में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की थी. उससे पहले इस देश की आर्थिक विकास दर औसतन 3.5 फीसदी थी. वर्ष 1947 से 1980 तक अर्थव्यवस्था की स्थिति कमोबेश यही रही. उसे ‘हिंदू विकास दर’ कहा गया. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत इस शब्दावली को लगातार बदल रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सप्ताह कहा कि यह शब्दावली वस्तुत: ‘गुलाम मानसिकता’ का प्रतीक है. उन्होंने कहा,’…यह साबित करने की कोशिश की गयी कि भारत की धीमी आर्थिक विकास दर का कारण हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति है.’ आगे उनका यह कहना था, ‘क्या आज कोई भारत की मौजूदा आर्थिक विकास दर को हिंदू विकास दर से जोड़ सकता है?’ प्रधानमंत्री ने ऊंची आर्थिक विकास दर के पीछे जहां अपनी सरकार की कोशिशों के बारे में बताया, वहीं उनके वक्तव्य में आजादी के बाद की समाजवादी रवैयों और नीतियों की अनकही आलोचना थी. दावा यह किया गया कि चूंकि उन नीतियों ने ही भारत को विफल किया, लिहाजा उसका दोष संपूर्ण हिंदू समाज पर नहीं मढ़ा जा सकता है.


वर्ष 2007 के एक अध्ययन पत्र में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के दो अर्थशास्त्रियों, कौशिक बसु और एनेमे मार्टंस ने यह बताया था कि हिंदू विकास दर शब्दावली दिवंगत अर्थशास्त्री राज कृष्णा द्वारा गढ़ी गयी थी, और जो वस्तुत: देश के आर्थिक योजनाकारों के प्रति हताशा व्यक्त करने के लिए व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति थी. अपने पत्र में उन दोनों अर्थशास्त्रियों ने लिखा था, ‘आर्थिक योजनाकारों ने जो भी कुछ किया हो, लेकिन भारत की आर्थिक विकास दर सालाना 3.5 फीसदी के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती थी, मानो यह जादुई आंकड़ा इस देश के धर्मग्रंथों में लिख दिया गया हो’.

इस शब्दावली का संबंध 1973 से और एक नौकरशाह बीपीआर विट्ठल से है, जो उस समय 10वें वित्त आयोग के सदस्य थे. बीपीआर विट्ठल की स्थापना जटिल थी, और कुछ अर्थों में समस्या पैदा करती थी, लिहाजा उसकी आलोचना भी हुई. लेकिन उस अर्थ में नहीं, जिस अर्थ में आज हो रही है. विट्ठल दरअसल कहना यह चाह रहे थे कि हिंदू समाज के जीवन जीने का जो तरीका है, वह आर्थिक विकास दर के रफ्तार पकड़ने पर सामंजस्य नहीं बिठा पायेगा. हिंदू विकास दर को आज जिस तरह अपमानजनक बताया जा रहा है, विट्ठल का कहने का मतलब वह कतई नहीं था. हालांकि दक्षिणपंथियों द्वारा विट्ठल की आलोचना को बिल्कुल गलत भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इनकी आर्थिक सोच धर्म से जुड़ी है, और इसमें प्रगति की पश्चिमी धारणा को खारिज करने की प्रवृत्ति है.


वास्तविकता यह है कि विट्ठल ने भारत की ऐतिहासिक निम्न आर्थिक विकास दर की आलोचना नहीं की थी. इसके बजाय उन्होंने अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों को ऊंची विकास दर को बेहतर आंकड़ा मान लेने की सोच के खिलाफ चेताया था. उनका तर्क यह था कि ऊंची विकास दर को रामबाण समझ लेना समाज में प्रतिकूल बदलाव का कारण बन सकता है, क्योंकि तब इस देश के नागरिक पश्चिम की उपभोक्तावादी जीवनशैली के गुलाम बन सकते हैं. अपनी सोच को ज्यादा स्पष्ट करते हुए 1993 में उन्होंने लिखा, ‘लिहाजा अगर नयी आर्थिक नीतियों से जुड़ी संभावनाएं फलीभूत होती हैं और हम देश में तेज आर्थिक वृद्धि दर देखते हैं, तो हमें इसके अनुकूल एक सुचिंतित वैचारिक और सांस्कृतिक ढांचा भी बनाना होगा.

अगर ऊंची आर्थिक विकास दर हमारी मौजूदा सोच और जीवन-यापन को उलट देने में सफल हो जाये, तो एक किस्म की जड़विहीनता की स्थिति पैदा होगी, जो भारत जैसे विशाल देश के लिए खतरनाक साबित होगी’. विट्ठल एक ऐसे अर्थशास्त्री थे, जो आर्थिक आंकड़ों और उसे हासिल करने की दौड़ में शामिल नहीं थे. इसके बजाय उन्होंने वृद्धि दर के समाजशास्त्रीय आयामों पर विचार किया कि भारत जैसे विशाल देश में तेज आर्थिक वृद्धि दर का नतीजा क्या हो सकता है. हिंदू विकास दर की शब्दावली या विट्ठल की ‘बौद्धिक चालाकी’ पर, जैसा कि एक आर्थिक समीक्षक ने कटाक्ष किया है, टिप्पणी किये बगैर यहां स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए कि ऊंची वृद्धि दर के दावे से जुड़े इस देश का सामाजिक-राजनीतिक मानस आज गंभीर संकट का सामना कर रहा है. इसलिए विचार-विमर्श इस पर होना चाहिए, न कि इस शिकायत पर, कि हिंदू विकास दर की शब्दावली इस देश के लिए अपमानजनक है.

यह विडंबना ही है कि कथित हिंदू विकास दर वाली टिप्पणी तब सुर्खियों में है, जब हमने देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो के प्रसंग में कॉरपोरेट शक्ति का वह अतिरेक देखा, जो राष्ट्रीय स्तर पर ब्लैकमेलिंग से नहीं हिचकता. बेहद ठसक से अपनी उड़ानें रद्द करते हुए इंडिगो ने इस देश को बताया कि बेहद ताकतवर कंपनियों से जुड़े अपने जोखिम होते हैं और उसकी विफलता भी देश को भीषण तरीके से प्रभावित करती है. ऐसे ही, इस महीने की शुरुआत में गोवा के नाइट क्लब में 25 लोगों के मारे जाने के बाद नाइट क्लब के मालिकों ने मेहुल चोकसी और विजय माल्या की तरह देश से निकल भागने का उदाहरण पेश किया.

इंडिगो की विफलता एक राष्ट्रीय दुर्घटना थी, तो गोवा की घटना एक स्थानीय घटना थी. पर ये दोनों ही घटनाएं अपने-अपने तरीके से इस देश को और इसकी ऊंची विकास दर की गाथा को शर्मसार करती और तेज आर्थिक वृद्धि की भारी कीमत चुकाने के बारे में बताती हैं. इस तेज आर्थिक वृद्धि ने तथाकथित हिंदू विकास दर को बेशक बहुत पीछे छोड़ दिया है, लेकिन यह कथित उपलब्धि बीच-बीच में इस देश को स्तब्ध और इसके शासन के ढांचे का उपहास करती रहती है.


इस अर्थ में तेज आर्थिक विकास अच्छा तो है, लेकिन इसमें ऐसी स्थिति भी आती है, जिसे बुरा विकास कहा जाता है. इस संदर्भ में यूएनडीपी की एक पुरानी मानव विकास रिपोर्ट को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा, ‘वैसे आर्थिक विकास से बचने की सुनियोजित कोशिश करनी चाहिए, जो विकास रोजगार विहीन, क्रूर, बेआवाज, जड़विहीन और भविष्यहीन हो’. अगर हम तेज आर्थिक विकास के जरिये यही सब कुछ हासिल करना चाहते हैं, तो फिर हिंदू विकास दर इससे अच्छी लगेगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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जगदीश रत्नानी

लेखक के बारे में

By जगदीश रत्नानी

जगदीश रत्नानी is a contributor at Prabhat Khabar.

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