1. home Home
  2. opinion
  3. article by senior journalist krishna pratap singh on prabhat khabar editorial about hindi diwas 2021 srn

Hindi Diwas 2021: अस्मिता व संस्कृति से जोड़ने का जरिया है हिंदी

समय के अंधेरों से जूझने वालों को हिंदी से उजाले की ओर ले जाने वाली भूमिका की ही दरकार है, जो भविष्य की इबारतें पढ़ने में उनकी मदद करे और बुरे समय में भी सच्ची अस्मिता व संस्कृति से जोड़े रखे.

By कृष्ण प्रताप सिंह
Updated Date
अस्मिता व संस्कृति से जोड़ने का जरिया है हिंदी
अस्मिता व संस्कृति से जोड़ने का जरिया है हिंदी
Prabhat Khabar Graphics

जून, 1996 में कर्नाटक निवासी अहिंदी भाषी जनता दल नेता एचडी देवगौड़ा जब देश के ग्यारहवें प्रधानमंत्री बने, तो कई प्रेक्षकों ने उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह बतायी कि उन्हें हिंदी तो आती ही नहीं! सवाल उठाये जाने लगे कि इस कमजोरी के रहते वे इस विशाल हिंदी भाषी देश के प्रधानमंत्रित्व का दायित्व भला कैसे निभायेंगे?

एक पत्रकार ने तो खचाखच भरे संवाददाता सम्मेलन में भी उनसे यह सवाल पूछने में संकोच नहीं किया. लेकिन अविचलित देवगौड़ा का बेहद संयत-सा उत्तर था, ‘चिंता मत कीजिए. तकलीफों की भाषा दुनियाभर में एक ही है और मैं उस भाषा को अच्छी तरह जानता-समझता हूं.’

अलबत्ता, देवगौड़ा ने खासी तेजी से हिंदी सीखकर जल्दी ही अपनी ‘कमी’ दूर कर ली थी. जब उन्हें पद त्यागना पड़ा, तो उन्होंने देश के नाम अपना विदाई संदेश हिंदी में ही दिया था. उनकी विदाई के इतने सालों बाद यह देखकर संतोष होता है कि भले ही उनके बाद के हिंदी भाषी प्रधानमंत्रियों ने भी हिंदी को उसकी उचित जगह देकर उसे ‘तकलीफों की भाषा’ बनाने या बनाये रखने को लेकर ज्यादा गंभीरता प्रदर्शित नहीं की, पर हिंदी ने जहां तक संभव हुआ, न अपनी प्रतिरोध की परंपरा को कमजोर पड़ने दिया है, न ही तकलीफजदा तबकों का साथ छोड़ा है.

अपने कुछ संस्तरों के हवा का रुख देखकर ‘समय के प्रवाह’ में बह जाने के बावजूद हिंदी ‘गुलामों, गंवारों और जाहिलों’ की भाषा बनी रही है. उसने उनके प्रति अपनी संवेदनाओं को मरने नहीं दिया है, तो यह कोई छोटी बात नहीं है. हिंदी को अपनी संवेदना व चेतना को बचाने के लिए अलगाव, उद्वेलन, घृणा, पुरातनपंथ, पोंगापंथ, संकीर्णताओं व क्षुद्रताओं के अनगिनत हमले झेलने पड़े हैं. विज्ञापन, व्यापार व मनोरंजन के क्षेत्रों तक सीमित कर दिये जाने की कितनी साजिशों से गुजरना पड़ा है.

‘वोट मांगने’ की इस भाषा को सत्ता व शासन, चिंतन-मनन, ज्ञान-विज्ञान व विचार-विमर्श के दायरों में फिट करना अभी भी किसे अभीष्ट है? अच्छी बात है कि ऐसे में हिंदी ने, खासकर उसके निचले कहे जाने वाले संस्तरों ने, समझा है कि उनके लिए अपना पक्ष बदलना अपने अस्तित्व से खेलना होगा. इसी चेतना के तहत हिंदी के इन संस्तरों ने अभी भी प्रतिकार और प्रतिरोध की आवाजों को बेदम होने से बचाने में शक्ति लगाये रखी है.

यकीनन, समय के अंधेरों से जूझने वालों को हिंदी से ऐसे उजाले की ओर ले जाने वाली भूमिका की ही दरकार है, जो भविष्य की इबारतें पढ़ने में उनकी मदद करे और बुरे समय में भी सच्ची अस्मिता व संस्कृति से जोड़े रखे. इसलिए आज हिंदी दिवस पर हमें कामना करनी चाहिए कि हिंदी कभी इतनी कमजोर न पड़े कि उसे अपनी इस भूमिका पर पुनर्विचार करना पड़े.

वर्ष 2015 में 10 से 12 सितंबर को भोपाल में संपन्न हुए दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भाषा तो हवा का बहता हुआ झोंका होती है. ऐसा झोंका, जो बगीचे से गुजरे, तो उसकी सुगंध और ड्रेनेज से गुजरे तो उसकी दुर्गंध बटोर लेती है. यह भी कहा था कि वर्तमान में विश्व की छह हजार में से नब्बे प्रतिशत से ज्यादा भाषाएं सदी के अंत तक अस्तित्व संकट में फंस जायेंगी.

जो तीन उसके पार जाकर बचेंगी, उनमें अंग्रेजी व चीनी के साथ हिंदी भी होगी. आज हिंदी की राह की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि देश में ड्रेनेज बढ़ते और बगीचे घटते जा रहे हैं. यही कारण है कि अपनी मातृभाषा व राष्ट्रभाषा से ही नहीं, जमीन व विरासत तक से कटाव को अभिशप्त हमारी नयी पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा हिंदी की उतनी भी सेवा नहीं कर पा रहा, जितनी गुलामी के दौर में गिरमिटिये मजदूरों ने की थी. ये मजदूर गुलामी व लाचारी में भी अपनी भाषा व संस्कृति को लेकर स्वाभिमान से भरे हुए थे.

याद कीजिए, स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हिंदी ने कितनी कुशलता से देशवासियों का मार्गदर्शन किया था. उसी दौर के संघर्षों में तपकर उसने सबसे ज्यादा मंजिलें तय कीं. उन दिनों के उलट, क्षुद्रताओं के पैरोकार उस पर कब्जा करने की अपनी साजिशें सफल कर लें, उसे विज्ञापन, व्यापार व मनोरंजन के क्षेत्रों तक सीमित कर दें, वोट मांगने की भाषा ही बनाये रखें, सत्ता व शासन की भाषा न बनने दें, चिंतन-मनन, ज्ञान-विज्ञान व विचार-विमर्श के दायरों से बाहर बिठा दें, तो उसके होने का क्या अर्थ?

आज की तारीख में जो भी खुद को ‘हिंदी’ या ‘हिंदीसेवी’ कहते हैं, उन्हें इस सवाल का सामना करना और साथ ही समझना चाहिए कि कर्णधारों का हिंदी के प्रति दिखावे की भावुकता प्रदर्शित करने वाला चेहरा भी न सिर्फ हिंदी, बल्कि उसकी पहचान का कितना विरोधी और कितना वीभत्स है!

Share Via :
Published Date

संबंधित खबरें

अन्य खबरें