ePaper

संस्कृति, परंपरा और इतिहास की संवाहक होती है मातृभाषा

Updated at : 20 Feb 2026 12:09 PM (IST)
विज्ञापन
Mother language day

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

Mother Tongue : भारत को ही देखिए. वर्ष 1961 की जनगणना के आंकड़ों के लिहाज से भारत में 1,652 भाषाएं थीं, पर 1971 में यह संख्या घटकर 808 रह गयी. ऐसा परिवर्तन तब हुआ, जब तकनीक का बोलबाला नहीं था.

विज्ञापन

Mother Language : तकनीकी दौर में मातृभाषाएं सर्वाधिक संकट में हैं. क्योंकि मातृभाषाओं में बात करना भी तकनीक से प्रभावित हो रहा है और लेखन तो पूरी तरह उसी पर निर्भर हो गया है. तकनीक की विशेषता कहें या कमी, वह बाजार के लिहाज से खुद को विकसित करती है और अपने उत्पादों के लिए इसी नजरिये से शोध करती है. चूंकि मातृभाषाओं में कई ऐसी हैं, जिन्हें बोलने या जिनका इस्तेमाल करने वालों की संख्या बेहद कम है, इसलिए उनसे कमाई की संभावना कम है, इसी कारण तकनीक उनके सहज इस्तेमाल में दिलचस्पी नहीं दिखाती. इसलिए मातृभाषाएं बड़ी संख्या में लुप्त होने के कगार पर हैं.

भारत को ही देखिए. वर्ष 1961 की जनगणना के आंकड़ों के लिहाज से भारत में 1,652 भाषाएं थीं, पर 1971 में यह संख्या घटकर 808 रह गयी. ऐसा परिवर्तन तब हुआ, जब तकनीक का बोलबाला नहीं था. पर अब बात उससे भी आगे बढ़ चुकी है. वर्ष 2013 के भारतीय लोकभाषा सर्वेक्षण के अनुसार, विगत 50 वर्षों में जहां 220 भाषाएं लुप्त हो गयी हैं, वहीं 197 भाषाएं समाप्ति के कगार पर हैं.


मातृभाषाओं के लुप्त होने के कई अन्य कारण भी हैं. भाषा शास्त्रियों के अनुसार, व्यक्तिवादी दर्शन, उपभोक्तावाद, सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों में आ रहे परिवर्तन, और शहरीकरण के साथ ही पारंपरिक मूल्यों के प्रति घटती निष्ठा और रोजगार के साधनों के रूप में भाषाओं की घटती संख्या भी मातृभाषाओं की समाप्ति के कारण बने हैं. हालांकि, कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो मातृभाषाओं को लेकर कुछ क्षेत्रों में सम्मोहन अभी भी बरकरार है.

संभवत: यही कारण है कि इस बार के अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के लिए यूनेस्को ने जो थीम रखी है, वह बेहद अहम जान पड़ती है. यह थीम है, ‘भाषाओं का महत्व : रजत जयंती और सतत विकास.’ इस थीम का ध्येय वाक्य ‘अनेक भाषाएं, एक भविष्य’ है. पूर्वी बंगाल में 1952 में शहीद हुए भाषा आंदोलनकारियों की याद में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की शुरुआत की 2025 में रजत जयंती थी. तब यूनेस्को ने इस दिवस को भाषाई विविधता, डिजिटल सशक्तीकरण और समावेशी शिक्षा के माध्यम से सतत विकास पर जोर देने पर केंद्रित किया था. अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर हर वर्ष यूनेस्को किसी न किसी अहम विषय को ध्येय बनाता है और उस दृष्टिकोण से पूरे वर्ष भाषाई विविधता को विकसित करने और उन्हें लागू करने पर जोर देता है. इस बार के ध्येय वाक्य से साफ है कि यूनेस्को चाहता है कि विश्व के सतत विकास में मातृभाषाओं की महत्ता रेखांकित की जाये.


मातृभाषाएं एक तरह से भाषायी लोकतंत्र को रचती हैं. इस लोकतंत्र को बचाये बिना विविधरंगी संसार को नहीं बचाया जा सकता. सोचिए, यदि उपभोक्तावाद, व्यक्तिवाद और तकनीकी वर्चस्व के चलते एकरस और एक भाषायी संसार तैयार हो जाये, तो दुनिया कितनी नीरस होगी, ज्ञान के तमाम स्रोत तब या तो सूख चुके होंगे या फिर भुला दिये गये होंगे. इसलिए मातृभाषाओं को बचाना और उन्हें सांस्कृतिक लोकतंत्र के प्रतीक के रूप में जिंदा रखना जरूरी हो जाता है. यूनेस्को की ओर से घोषित ‘भाषाओं का महत्व : रजत जयंती और सतत विकास’ विषय, एक तरह से भाषाई विविधता, बहुभाषावाद और सतत विकास के बीच गहरे संबंधों को ही रेखांकित करता है.

चूंकि यूनेस्को मातृभाषाओं को संरक्षित करने, भाषाई विविधता को जिंदा रखने और उन पर रश्क करने के साथ ही शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए प्रयासरत है, इसलिए वह लगातार भाषाओं को बचाने का संदेश दे रहा है. चूंकि भाषाएं सिर्फ संवाद का साधन ही नहीं होतीं, सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने का महत्वपूर्ण औजार भी हैं, लिहाजा प्राथमिक शिक्षा में उन पर जोर दिया जा रहा है. दुनियाभर के शिक्षा शास्त्री मानते हैं कि मातृभाषा आधारित शिक्षा समावेशी होती है और बच्चों की समझ को बेहतर बनाने में मददगार होती है. इसी कारण सतत विकास के लक्ष्यों को अब मातृभाषा के जरिये मिलने वाली शिक्षा में गंभीरता से खोजा जा रहा है.


जैसे-जैसे अधिकाधिक भाषाएं विलुप्त होती जा रही हैं, भाषाई विविधता खतरे में पड़ती जा रही है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विश्व की 40 प्रतिशत जनसंख्या को उस भाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिल रहा है, जिन्हें वे बोलते या समझते हैं. मातृभाषाओं का संरक्षण इसलिए भी जरूरी है कि स्थानीय समाज उनके माध्यम से शिक्षा हासिल कर सकें. मातृभाषा व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, सांस्कृतिक पहचान और बौद्धिक नींव की आधारशिला है. यह सोचने, समझने और संवाद करने का सबसे सहज माध्यम है, जो बच्चे को उसकी विरासत से जोड़ती है. मातृभाषा में शिक्षा से आत्मविश्वास बढ़ता है और संज्ञानात्मक कौशल विकसित होते हैं. शिक्षा शास्त्रियों के अनुसार, जिन बच्चों की नींव मातृभाषा में मजबूत होती है, मातृभाषाओं से इतर भाषाओं में भी उनका प्रदर्शन बेहतर होता है. दुनिया की हर मातृभाषा अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास की संवाहक है. इसी कारण दुनियाभर के मानवशास्त्री मानते हैं कि सांस्कृतिक संरक्षण के लिए भाषाई विविधता का संरक्षण जरूरी है. स्थानीय भाषाएं ज्ञान का खजाना हैं, जिन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जाना आवश्यक है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

विज्ञापन
उमेश चतुर्वेदी

लेखक के बारे में

By उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola