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एक आदर्श और प्रतिबद्ध समाजवादी

Updated at : 01 May 2020 7:02 AM (IST)
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एक आदर्श और प्रतिबद्ध समाजवादी

दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में मधु लिमये ने युद्ध के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया और वे गिरफ्तार कर लिये गये. अगस्त 1942 में कांग्रेस के बंबई सम्मेलन में लिमये ने पहली बार महात्मा गांधी को करीब से देखा था. इसी आयोजन में गांधी ने 'भारत छोड़ो' का आह्वान किया था.

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कुरबान अली

वरिष्ठ पत्रकार

qurban100@gmail.com

देश के समाजवादी आंदोलन के सबसे अग्रणी नेताओं में शुमार मधु लिमये का जन्म एक मई, 1922 को महाराष्ट्र के पूना में हुआ था. वे 1937 में वहीं फर्ग्युसन कॉलेज में उच्च शिक्षा के के दौरान ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के सक्रिय सदस्य बन गये. वहां से उन्होंने मानवता को उपनिवेशवाद, गुलामी, अन्याय तथा वंचना और शोषण के बंधन से मुक्त कराने की यात्रा शुरू की. अपने 15वें जन्मदिन पर 1937 में वह पूना में मई दिवस के जुलूस में शामिल हुए, जिस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ताओं द्वारा हिंसक हमला किया गया था. दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में मधु लिमये ने युद्ध के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया और वे गिरफ्तार कर लिये गये. अगस्त 1942 में कांग्रेस के बंबई सम्मेलन में लिमये ने पहली बार महात्मा गांधी को करीब से देखा था. इसी आयोजन में गांधी ने ‘भारत छोड़ो’ का आह्वान किया था.

साल 1947 में महज 25 बरस की उम्र में उन्होंने भारतीय समाजवादी आंदोलन के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के एंटवर्प (बेल्जियम) सम्मेलन में भाग लिया था. वे 1948 में सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और 1949 में संयुक्त सचिव चुने गये. उनकी शादी 15 मई,1952 को प्रोफेसर चंपा गुप्ते से हुई, जो उनके व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में प्रेरणा और समर्थन का एक बड़ा स्रोत बनीं. लिमये ने 1950 के दशक में गोवा मुक्ति आंदोलन में भी भाग लिया था, जिसे उनके नेता डॉ राममनोहर लोहिया ने 1946 में शुरू किया था. उपनिवेशवाद के कट्टर आलोचक लिमये ने जुलाई, 1955 में एक बड़े सत्याग्रह का नेतृत्व करते हुए गोवा में प्रवेश किया, जहां पुलिस ने उन पर अत्याचार किया और पांच महीने तक हिरासत में रखा. उसी साल दिसंबर में पुर्तगाली सैन्य न्यायाधिकरण ने उन्हें 12 साल के कठोर कारावास की सजा सुनायी. लेकिन लिमये ने न तो कोई बचाव पेश किया और न ही भारी सजा के खिलाफ अपील की.

कांग्रेस, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में वर्षों सक्रिय रहने के बाद अप्रैल, 1958 में शेरघाटी (गया) में आयोजित सोशलिस्ट पार्टी (लोहिया गुट) के सम्मेलन में मधु लिमये को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया. उनकी अध्यक्षता में अगले साल हुए बनारस सम्मेलन में पार्टी ने समाज के पिछड़े वर्गों के लिए विशेष अवसर देने के लिए नारा दिया ‘सोशलिस्ट पार्टी ने बांधी गांठ, पिछड़े पावैं सौ मैं साठ.’ साल 1964 में दो समाजवादी घटकों के विलय के बाद नवगठित संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष और चौथी लोकसभा में 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी संसदीय दल के नेता चुने गये. वे 1964 से 1979 तक चार बार बिहार के मुंगेर और बांका से लोकसभा के लिए चुने गये थे. उन्हें संसदीय नियमों की प्रक्रिया और उनके उपयोग तथा विभिन्न विषयों की गहरी समझ थी. संवैधानिक मामलों पर संसद में उनके भाषण आज भी मील का पत्थर हैं. मधु लिमये जीवनभर नागरिक स्वतंत्रता के हिमायती रहे. उन्होंने कई बार न्यायपालिका का सामना किया और खुद अपने मामलों को निचली और ऊपरी अदालतों में लड़े और जीते. उन्हें स्वतंत्र भारत में जब-जब अवैध रूप से गिरफ्तार किया गया, उन्होंने हर बार अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी और उन्हें कामयाबी मिली.

अंतरर्राष्ट्रीय संबंधों और गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों में मधु लिमये का दृढ़ विश्वास था. उनके अनुसार, गुटनिरपेक्षता की अवधारणा स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही थी, जिसके आधार में उपनिवेशवाद का खात्मा कर सभी लोगों के लिए स्वतंत्रता, निरस्त्रीकरण, विकासशील देशों के आर्थिक हितों की सुरक्षा और विश्व शांति निहित थी. साल 1971 में बांग्लादेश युद्ध के समय मधु लिमये ने तत्कालीन सरकार को अपना समर्थन दिया, साथ ही उन्होंने जयप्रकाश नारायण को बांग्लादेश की मुक्ति के पक्ष में विश्व जनमत जुटाने का नेतृत्व करने के लिए राजी किया और स्वयं भी इस मुद्दे पर विभिन्न देशों का दौरा किया. अपने सार्वजनिक जीवन के चार दशकों में मधु लिमये ने कई देशों की यात्रा की. वे कई दौरों पर डॉ लोहिया के साथ भी गये. उन्होंने 1967 में मास्को में एसएम जोशी के साथ रूसी क्रांति की 50 वीं वर्षगांठ समारोह में भी भाग लिया.

मधु लिमये का वैचारिक धरातल धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद पर आधारित था. उनका मानना था कि भारत की सहिष्णुता, समग्र और बहुधर्मी संस्कृति उसकी एकता का सशक्त आधार है और यही विश्वास उसकी एकता का सार है. उन्होंने जेपी आंदोलन के दौरान और बाद में एकजुट विपक्षी पार्टी (जनता पार्टी) बनाने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. जनता सरकार में उन्होंने मंत्री पद लेने के प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया था. बाद में वे जनता पार्टी के महासचिव चुने गये.

मधु लिमये को मोरारजी सरकार के पतन का दोषी ठहराया जाता है. उन्होंने तब जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया था, जो जनसंघ के पूर्व सदस्यों पर हमला था. इसी मुद्दे पर विवाद के कारण 1979 में जनता सरकार का पतन और जनता पार्टी का विघटन हुआ. मधु लिमये एक प्रतिबद्ध समाजवादी के रूप में याद किये जायेंगे, जिन्होंने निस्वार्थ भावना के साथ देश की सेवा की. संक्षिप्त बीमारी के बाद 72 वर्ष की आयु में आठ जनवरी, 1995 को मधु लिमये का नयी दिल्ली में निधन हो गया था.(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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