संशोधन से मर गयी ट्रांसजेंडर कानून की आत्मा
Author : योगेन्द्र यादव Published by : Rajneesh Anand Updated At : 07 Apr 2026 11:39 AM
ट्रांसजेंडर कानून का विरोध कर रहे हैं किन्नर
Transgender Law : ट्रांसजेंडर शब्द भले ही नया हो, पर पश्चिमी संस्कृति से संपर्क से सैकड़ों वर्ष पहले हमारे यहां इस बात की कमोबेश सहज स्वीकारोक्ति थी कि कुछ लोग तन से और कुछ लोग मन से पुरुष बनाम स्त्री के दो डब्बों में कैद नहीं हो सकते.
Transgender Law : चलिए, ट्रांसजेंडर कानून में हुए संशोधन की बात ‘कामसूत्र’ से शुरू करते हैं. संस्कृत साहित्य के इस कालजयी ग्रंथ में स्त्री और पुरुष के अतिरिक्त एक तृतीया प्रकृति का जिक्र किया गया है. वात्स्यायन के अनुसार, यह मामला ‘प्रकृति’, यानी स्वभाव या मनोवृत्ति का है, शरीर की लैंगिक बनावट का नहीं. इस तीसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जिनका शरीर तो पुरुष जैसा है, पर मन और हाव-भाव या तो स्त्रीरूपिणी है, या कम से कम वह नहीं है जिसे समाज पुरुष के रूप में पहचानता है. या वह जो जन्म से लड़की मानी गयी, पर जिनका आचार-व्यवहार स्त्री के लिए बनाये खांचे में फिट नहीं बैठता. वात्स्यायन इस तीसरी प्रकृति को किसी विकार की तरह देखने की बजाय, बस एक अन्य श्रेणी की तरह दर्ज करते हैं.
ट्रांसजेंडर शब्द भले ही नया हो, पर पश्चिमी संस्कृति से संपर्क से सैकड़ों वर्ष पहले हमारे यहां इस बात की कमोबेश सहज स्वीकारोक्ति थी कि कुछ लोग तन से और कुछ लोग मन से पुरुष बनाम स्त्री के दो डब्बों में कैद नहीं हो सकते. हमारी भाषाओं और परंपराओं में अनगिनत कथाएं और मिसाल यह साबित करते हैं कि लैंगिक विविधता का विचार हमारे यहां कहीं बाहर से नहीं आया. दरअसल, औपनिवेशिक संस्कृति के वर्चस्व के चलते हमने इस लैंगिक विविधता के प्रति शर्म महसूस करनी शुरू की और अंग्रेजों की नकल करते हुए ऐसे सामाजिक आदर्श बनाये, जिनमें तीसरी प्रकृति के लिए जगह नहीं थी. यही नहीं, ब्रिटेन की तरह हमारे यहां भी ऐसे कानून बनाये गये, जो स्त्री-पुरुष के एकरूपी संबंध से हटकर हर संबंध और हर आचार-व्यवहार को गैरकानूनी बना देता था.
सामाजिक बंदिशों और कानूनी बेड़ियों की इस मिलावट ने न जाने कितने खूबसूरत रिश्तों को पाप में बदल दिया, न जाने कितने अरमानों का गला घोंट दिया. सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के एक निर्णय से इस ऐतिहासिक अन्याय पर रोक लगायी. ‘राष्ट्रीय विधि सेवा प्राधिकरण (नालसा) बनाम भारत सरकार’ नामक इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तीसरी प्रकृति को कानूनी मान्यता दे दी. इसमें केवल उभयलिंगी (जिनके शरीर में नर और मादा दोनों के लक्षण हों) और हिजड़ा, किन्नर, अरावनी, जोगता ही शामिल नहीं थे, बल्कि वे सब, जो इसमें शामिल होना चाहें. जो अपने आपको न पुरुष समझते हैं, न स्त्री. न्यायालय ने सरकार को हिदायत दी कि वह इस तीसरी प्रकृति को मान्यता दे, इनके विरुद्ध होने वाले भेदभाव पर पाबंदी लगाये और इस वर्ग की बेहतरी के लिए भी इंतजाम करे. अंततः, पांच वर्ष बाद संसद ने इस आशय का कानून बनाया. ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने उस परिभाषा को स्वीकार किया जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही निरूपित कर चुका था. मतलब, हर व्यक्ति अपनी लैंगिक प्रकृति का चुनाव स्वयं कर सकता है. आप सोचेंगे, ‘देर आयद दुरुस्त आयद.’
कौन अपने आपको पुरुष माने, कौन स्त्री माने और कौन इन दोनों से हटकर- इसमें किसी का क्या जाता है? वैसे भी, इस कानून के तहत अभी बहुत कुछ हुआ भी नहीं है. विशेषज्ञों के अनुसार, देश में पचास लाख से एक करोड़ के बीच ट्रांसजेंडर व्यक्ति हैं (उनमें से 2011 की जनगणना में कोई पांच लाख व्यक्तियों ने अपने आपको अन्य में दर्ज करवाया था), मगर अभी तक केवल 32 हजार को ही औपचारिक पहचान पत्र दिये गये हैं. पर पिछले सप्ताह संसद ने इस कानून में संशोधन कर दिया. इस कानून की आत्मा थी ट्रांसजेंडर की परिभाषा, यानी अपनी लैंगिक पहचान स्वयं चुनने की स्वतंत्रता. संशोधन के माध्यम से इसी मूल प्रावधान को हटा दिया गया है.
अब वही लोग ट्रांसजेंडर हो सकेंगे, जो शारीरिक रूप से उभयलिंगी हों, या जो हिजड़ा, किन्नर, अरावनी, जोगता हों. बाकी किसी को ट्रांसजेंडर होने के लिए मेडिकल आधार देना होगा, डॉक्टर के पैनल और प्रशासन से अनुमति लेनी होगी. यदि कोई लिंग परिवर्तन की सर्जरी करवाता है, तो उसकी सूचना प्रशासन को देनी होगी. यही नहीं, ट्रांसजेंडर के विरुद्ध होने वाले अपराधों की सूची में अब ऐसे प्रावधान जोड़ दिये गये हैं जिनका इस्तेमाल इसी समुदाय और इसके मित्रों के विरुद्ध किया जा सकता है. एक बार फिर ट्रांसजेंडर समुदाय के जीवन को आपराधिकता के कटघरे में खड़ा कर दिया गया है. और वह भी बिना किसी चर्चा के. इतनी लंबी प्रतीक्षा के बाद तीसरी प्रकृति के लिए खुली इस खिड़की को अचानक बंद कर दिया गया है.
मगर ऐसा क्यों? सरकारी बहाना यह है कि ऐसा इस कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए किया गया है. मगर कोई यह नहीं बता पा रहा कि जिस कानून का उपयोग ही नहीं हुआ, उसके दुरुपयोग का खतरा कहां से आ गया? अगर दुरुपयोग का खतरा है, तो कोई ट्रांसजेंडर व्यक्ति या समुदाय ने शिकायत क्यों नहीं की? अगर यह उनके हित में है, तो देशभर के ट्रांसजेंडर समूह एक स्वर में इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि खतरा बाहर नहीं भीतर से है? कहीं तीसरी प्रकृति का होना मर्द के भीतर छिपी औरत और औरत के भीतर बसे मर्द की याद तो नहीं दिलाता? कहीं यह अहसास कुर्सी पर बैठे लोगों को असहज तो नहीं कर देता? कितनी बेचारी और घबरायी होगी वह मर्दानगी, जिसे किसी और को मर्द बनाने के लिए कानूनी डंडे का सहारा लेना पड़ रहा है? (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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