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अजातशत्रु नैतिक समाजवादी आचार्य नरेंद्रदेव

Updated at : 01 Nov 2022 8:09 AM (IST)
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अजातशत्रु नैतिक समाजवादी आचार्य नरेंद्रदेव

क्या आप अब तक हुए चुनावों में किसी सीट से जुड़ी ऐसी कोई मिसाल दे सकते हैं, जहां दो प्रतिद्वंद्वियों में कांटे की टक्कर हो, लेकिन जब नतीजा आये, तो विजयी प्रत्याशी की जीत की खुशी पर प्रतिद्वंद्वी की हार का गम भारी पड़ जाये

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क्या आप अब तक हुए चुनावों में किसी सीट से जुड़ी ऐसी कोई मिसाल दे सकते हैं, जहां दो प्रतिद्वंद्वियों में कांटे की टक्कर हो, लेकिन जब नतीजा आये, तो विजयी प्रत्याशी की जीत की खुशी पर प्रतिद्वंद्वी की हार का गम भारी पड़ जाये! यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि आजादी के अगले ही बरस 1948 में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में ‘भारतीय समाजवाद के पितामह’ कहलाने वाले आचार्य नरेंद्रदेव द्वारा कांग्रेस के प्रतिपक्ष के निर्माण की सदिच्छा से उसे छोड़ने और नैतिकता के आधार पर साथियों के साथ विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद अयोध्या में हुए उपचुनाव में कुछ ऐसा ही हुआ था.

तब आचार्य ने 1934 में कांग्रेस के भीतर बनी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को उससे अलग कर लिया था और उसके प्रत्याशी के तौर पर अयोध्या विधानसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस के खिलाफ मैदान में उतरे थे. कांग्रेस ने उनके असीमित ज्ञान, गुण, गौरव, गरिमा और विचारों से सीधी टक्कर में उलझने के बजाय उनके खिलाफ देवरिया जिले के बरहज के प्रसिद्ध बाबा राघवदास को खड़ा किया था, जो हिंदूवादी छवि के लिए जाने जाते थे.

विकट वैचारिक मतभेदों के बावजूद चुनाव प्रचार के दौरान दोनों प्रत्याशी अपने प्रतिद्वंदियों की खुलकर प्रशंसा से परहेज नहीं करते थे. बाबा तो आचार्य को बार-बार खुद से योग्य बताया करते थे. लेकिन प्रचार के अंतिम दिनों में कांग्रेस की सारी टेक आचार्य की अनीश्वरवादी छवि पर रखकर उनके जीतने से अयोध्या में आमतौर पर ऊंची फहराती रहने वाली धर्मध्वजा के नीची हो जाने का भय दिखाने पर उतर आयी और बाबा राघवदास ने 1200 वोटों से बाजी मार ली. पर बाबा ने अपनी जीत का जश्न मनाने से यह कहकर इनकार कर दिया कि इस जीत के लिए आचार्य नरेंद्रदेव उनसे ज्यादा योग्य थे,

इसलिए उन्हें जीत की खुशी से ज्यादा आचार्य के हार जाने का गम है. इससे यह बखूबी पता चल जाता है कि आचार्य यूं ही भारतीय समाजवादी आंदोलन के पितामह नहीं कहे जाते. उनकी अनूठी राजनीतिक नैतिकताओं की वे नेता भी प्रशंसक थे, जो अपने दलीय स्वार्थों या सीमाओं के कारण उनसे सहमत नहीं हो पाते थे. उनके बीच कभी भी इस आधार पर विश्वास का संकट नहीं पैदा होता था कि वे अलग-अलग पार्टियों में हैं.

इसकी एक नजीर तब बनी, जब आचार्य ने प्रजा समाजवादी पार्टी बनायी. नयी पार्टी का घोषणा पत्र लिखने का प्रश्न उपस्थित हुआ, तो प्रायः सबको उम्मीद थी कि आचार्य उसे खुद लिखना पसंद करेंगे. सच्चाई यह थी कि पार्टी में और कोई ऐसा नेता था ही नहीं, जो घोषणा पत्र को वैसा समाजवादी स्वरूप दे पाता, जैसा आचार्य को अभीष्ट था. लेकिन उनकी मुश्किल यह थी कि उनका खराब स्वास्थ्य उन्हें उन दिनों गंभीरतापूर्वक लिखने-पढ़ने की कतई इजाजत ही नहीं दे रहा था.

इस कारण घोषणापत्र जारी करने में देर होने लगी, तो पार्टी के कुछ बेसब्र नेताओं ने उनसे पूछ लिया कि घोषणापत्र लिखने का काम कहां तक पहुंचा है? आचार्य ने छूटते ही उत्तर दिया, ‘मैंने उसे लिखने का काम डॉ संपूर्णानंद को सौंप दिया है. वही जानें कि इस काम में कितना समय लगायेंगे.’ इस जवाब से उन नेताओं पर बिजली-सी गिर गयी. कारण यह कि डॉ संपूर्णानंद कांग्रेस के नेता थे. तिस पर उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी वही थे. यह चिंता स्वाभाविक थी कि आचार्य जी को क्या सूझी कि जिस कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने पार्टी बनायी है, उसी के मुख्यमंत्री को उसका घोषणा पत्र लिखने को कह दिया है. लेकिन आचार्य उक्त एक वाक्य कहकर इस कदर निश्चिंत हो उठे थे कि किसी ने भी इस पर एतराज नहीं जताया.

डॉ संपूर्णानंद ने अन्य व्यस्तताओं के कारण घोषणा पत्र लिखने में तीन महीने लगा दिये. अंततः उनकी प्रतीक्षा की घड़ियां खत्म हुईं, तो उन्होंने घोषणापत्र के ड्राफ्ट को बिना पढे़ ही छपने भिजवा दिया. यह अपने साथियों की नैतिकता व ईमानदारी पर उनके विश्वास की पराकाष्ठा थी. गौरतलब यह भी कि घोषणा पत्र छपकर आया, तो पार्टी के नेता चकित होने लगे कि डॉ संपूर्णानंद ने उसे लिखने में कहीं भी बदनीयती से काम नहीं लिया था.

उसमें उन्होंने कांग्रेस और उसकी सरकार की नीतियों के खिलाफ कई कार्यक्रम लिखे थे. क्या आश्चर्य कि अपने अनेक समकालीनों की निगाह में आचार्य या तो अजातशत्रु थे या फिर महात्मा गांधी और कार्ल मार्क्स से प्रभावित ऐसे नैतिक समाजवादी, जिनका नैतिक मूल्यों की प्राथमिकता में विश्वास आखिर तक अगाध बना रहा. वे समाजवाद को राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक आंदोलन मानते थे और उनका मत था कि भारत अपनी आर्थिक विषमता, असामाजिक सामाजिक व्यवस्था, ऊंच-नीच की भावनाओं, कुरीतियों और रूढ़ियों से सिर्फ समाजवाद के रास्ते पर चलकर ही निजात पा सकता है.

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कृष्ण प्रताप

लेखक के बारे में

By कृष्ण प्रताप

कृष्ण प्रताप is a contributor at Prabhat Khabar.

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